जब माँ बोझ बन गई

 

Elderly Indian mother sitting alone in a quiet home, expressing loneliness and emotional pain


आँगन में तुलसी के पास रखा दिया बुझ चुका था, लेकिन घर के अंदर रिश्तों की रोशनी उससे भी पहले बुझ चुकी थी…


सावित्री देवी दरवाज़े के पास रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सी पर बैठी थीं। उनकी आँखें गली के उस मोड़ पर टिकी थीं, जहाँ से उनका बेटा रोहित हर शाम ऑफिस से लौटता था।


लेकिन आज तीन दिन हो चुके थे…

रोहित न तो उनके पास बैठा था, न ही उसने ढंग से बात की थी।


घर में सब कुछ था—बड़ा सा मकान, गाड़ी, नौकर, आराम…

बस एक चीज़ नहीं थी—माँ की जगह।



“माँ, आप बार-बार बाहर मत बैठा कीजिए… लोग क्या सोचेंगे?”

बहू ने अंदर से थोड़े खीझे हुए स्वर में कहा।


सावित्री देवी ने हल्की-सी मुस्कान के साथ सिर उठाया। उनकी आँखों में थकान भी थी और गहराई भी।


“लोग क्या सोचेंगे…?” उन्होंने धीमे लेकिन साफ़ शब्दों में कहा,

“यही सोचते-सोचते हम अपने ही लोगों को खो देते हैं, बेटा…”


उनकी आवाज़ में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सच्चाई थी।

लेकिन उस सच्चाई को सुनने और समझने वाला वहाँ कोई नहीं था।



कुछ साल पहले यही घर कितना जीवंत था…


पति के गुजर जाने के बाद सावित्री देवी ने ही अकेले रोहित को पाला था।

दूसरों के घरों में सिलाई का काम करके, अपनी जरूरतें काटकर…

उन्होंने रोहित को पढ़ाया, बड़ा किया।


रोहित जब नौकरी पर लगा था, उस दिन उसने माँ के पैर पकड़कर कहा था—

“माँ, अब आपकी हर खुशी मेरी जिम्मेदारी है…”


और आज… वही माँ इस घर में बोझ बन चुकी थी।



एक दिन दोपहर में…


सावित्री देवी धीरे-धीरे किचन में गईं।

उन्हें थोड़ी भूख लगी थी।


उन्होंने डिब्बा खोला—

अंदर सिर्फ दो सूखी रोटियां थीं।


उन्होंने पानी के साथ रोटी खाने की कोशिश की, लेकिन गला भर आया।


तभी उन्होंने ड्राइंग रूम से आवाज़ सुनी—


“रोहित, मैं साफ कह रही हूँ… अब मैं आपकी माँ के साथ नहीं रह सकती।

हर समय उनका ध्यान रखना, उनकी बातें सुनना… ये सब मुझसे नहीं होता।”


रोहित चुप था।


कुछ सेकंड बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा—

“तो तुम क्या चाहती हो?”


“या तो हम अलग रहेंगे… या फिर इन्हें कहीं और रखना होगा।”


ये शब्द सुनते ही सावित्री देवी के हाथ से रोटी गिर गई।


उनका दिल जैसे किसी ने मसल दिया हो…



उस रात…


किसी ने उनसे खाना खाने के लिए भी नहीं पूछा।


सावित्री देवी अपने कमरे में बैठी रहीं।

उन्होंने अलमारी खोली…

पुरानी साड़ी, कुछ पैसे और अपने पति की फोटो निकाली।


फोटो को देखते हुए बोलीं—

“देखिए जी… आपका बेटा बड़ा हो गया है…

अब उसे माँ की जरूरत नहीं रही…”


उनकी आँखों से आँसू चुपचाप गिरते रहे।



अगली सुबह…


रोहित उनके कमरे में आया।


“माँ… हम सोच रहे थे कि आपको एक अच्छे आश्रम में रख दें।

वहाँ आपकी उम्र के लोग होंगे… आपको अच्छा लगेगा।”


सावित्री देवी ने उसकी तरफ देखा…

उनकी आँखों में दर्द नहीं था, सिर्फ एक अजीब सा सन्नाटा था।


“अच्छा लगेगा…?”

उन्होंने धीरे से पूछा।


रोहित ने नजरें झुका लीं।



कुछ देर बाद…


सावित्री देवी ने खुद ही अपना छोटा सा बैग पैक किया।


जब वो बाहर आईं, तो बहू को राहत महसूस हुई…

और रोहित को हल्का सा बोझ।


लेकिन सावित्री देवी के कदम भारी नहीं थे।


इस बार… वो टूटकर नहीं, समझकर चल रही थीं।



घर से निकलते समय उन्होंने एक बार भी पीछे मुड़कर नहीं देखा।


गली के बाहर खड़े ऑटो में बैठते हुए उन्होंने धीमे लेकिन दृढ़ स्वर में कहा—

“बेटा, मुझे किसी अच्छे वृद्धाश्रम ले चलो…”



दो महीने बाद…


रोहित ऑफिस से लौटा तो घर में अजीब सा सन्नाटा था।


सब कुछ वैसा ही था…

लेकिन फिर भी कुछ बहुत बड़ा गायब था।


अब कोई दरवाज़े पर इंतज़ार नहीं करता था।

कोई पूछता नहीं था—

“खाना खा लिया बेटा?”



एक दिन…


उसे माँ की पुरानी अलमारी में एक डायरी मिली।


उसने खोली…


पहले पन्ने पर लिखा था—


“मैंने अपने बेटे को कभी अकेला महसूस नहीं होने दिया…

लेकिन आज मैं खुद बहुत अकेली हूँ।”


रोहित की आँखें भर आईं।




वो भागते हुए वृद्धाश्रम पहुँचा…


लेकिन वहाँ पहुँचकर उसे पता चला—


“सावित्री देवी यहाँ से एक हफ्ते पहले चली गईं…”


“कहाँ गईं?” रोहित ने घबराकर पूछा।


मैनेजर ने गहरी साँस लेकर धीरे से कहा—


“उन्होंने जाते समय बस इतना कहा था…

अब उन्हें कहीं और नहीं रुकना…

क्योंकि जहाँ सम्मान नहीं होता, वहाँ ठहरना भी बेकार है।”



रोहित वहीं जमीन पर बैठ गया।


आज पहली बार उसे समझ आया—


माँ कभी बोझ नहीं होती…

हम ही उनके प्यार के काबिल नहीं रह जाते।



उस दिन के बाद…


रोहित के पास सब कुछ था—

पैसा, घर, आराम…


बस एक चीज़ नहीं थी—

वो आवाज़… जो हर शाम कहती थी—


“आ गए बेटा…?”



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