वो चुप क्यों हो गया?

 

Sad young boy sitting near a window holding a diary in a quiet room


क्लास खत्म होते ही बच्चे अपनी-अपनी कॉपियाँ बैग में ठूँसते हुए बाहर निकलने लगे। कोई हँस रहा था, कोई दोस्तों को पुकार रहा था, लेकिन कक्षा के कोने में बैठा विहान अब भी अपनी कॉपी के आखिरी पेज पर पेंसिल घुमा रहा था।


टीचर ने जाते-जाते पूछा भी—

“विहान, घर नहीं जाना क्या?”


वह हल्का सा मुस्कुराया—

“जी… जा रहा हूँ।”


लेकिन उसकी चाल में कोई जल्दी नहीं थी।


बस में भी वह सबसे पीछे जाकर बैठ गया। बाकी बच्चे आपस में हँस-खेल रहे थे, कोई सीट के लिए झगड़ रहा था, कोई खिड़की से बाहर हाथ निकालकर हवा महसूस कर रहा था, लेकिन विहान चुपचाप खिड़की के बाहर गुजरती सड़कों को देखता रहा।


उसे याद आया—कुछ महीने पहले तक यही रास्ता उसे कितना अच्छा लगता था। वह घर पहुँचते ही जोर से आवाज़ लगाता—

“मम्मा… मैं आ गया!”


और अंदर से तुरंत जवाब आता—

“हाथ धो लो, मैं खाना लगा रही हूँ।”


अब वह आवाज़ नहीं आती थी।


घर पहुँचकर उसने दरवाज़ा खुद ही खोला। अंदर सन्नाटा था। टेबल पर ढका हुआ खाना रखा था और एक चिट्ठी—

“मीटिंग है, देर हो जाएगी। खाना खा लेना। – मम्मा”


विहान ने चुपचाप खाना खोला, दो कौर खाए और वापस ढक दिया।


रात को जब मम्मी आईं, तो बहुत थकी हुई थीं। उन्होंने पूछा भी—

“खाना खा लिया?”


विहान ने सिर हिला दिया।


असल में घर अब घर जैसा नहीं रहा था। पापा कई महीनों से दूसरे शहर में थे। पहले तो कहते थे कि काम के लिए गए हैं, लेकिन अब कॉल भी कम आने लगे थे।


धीरे-धीरे मम्मी भी बदलने लगी थीं। पहले वो हर छोटी बात पर हँसती थीं, अब ज़्यादातर चुप रहती थीं।


एक दिन विहान ने हिम्मत करके पूछा—

“पापा कब आएँगे?”


मम्मी कुछ सेकंड चुप रहीं, फिर बोलीं—

“जल्दी…”


लेकिन उनकी आवाज़ में भरोसा नहीं था।


समय बीतता गया।


अब घर में एक और बदलाव आया—मम्मी के ऑफिस के एक “फ्रेंड” अक्सर घर आने लगे। वो विहान के लिए चॉकलेट लाते, उसके साथ बातें करते। मम्मी भी उनके साथ पहले से ज्यादा खुश दिखती थीं।


विहान समझ नहीं पा रहा था—

क्या ये अच्छा है या बुरा?


एक दिन उसने देखा—मम्मी हँस रही थीं… बहुत दिनों बाद।

लेकिन उस हँसी में वो शामिल नहीं था।


उस दिन उसने पहली बार महसूस किया कि शायद अब वो मम्मी की दुनिया का केंद्र नहीं रहा।


धीरे-धीरे उसने बातें करना कम कर दिया।


स्कूल में भी टीचर नोटिस करने लगीं—

“विहान पहले बहुत एक्टिव था, अब इतना चुप क्यों हो गया?”


एक दिन उसकी क्लास टीचर ने उसे रोक लिया—

“कुछ परेशानी है क्या?”


विहान ने सिर झुका लिया—

“नहीं मैम…”


लेकिन उसकी आँखें सब कह रही थीं।


कुछ दिनों बाद स्कूल में “फैमिली डे” रखा गया। सभी बच्चों को अपने मम्मी-पापा के साथ आना था।


उस दिन विहान सबसे पीछे खड़ा था।


बाकी बच्चों के मम्मी-पापा उनके साथ फोटो खिंचवा रहे थे, हँस रहे थे।

विहान के साथ सिर्फ उसकी मम्मी थीं।


टीचर ने पूछा—

“पापा नहीं आए?”


विहान ने धीरे से कहा—

“वो… बिज़ी हैं।”


कार्यक्रम खत्म होने के बाद वह एक कोने में खड़ा था। तभी उसने देखा—एक छोटा बच्चा गिर गया और उसके पापा तुरंत दौड़कर उसे उठाने लगे।


विहान कुछ सेकंड तक उन्हें देखता रहा…


फिर धीरे से नजरें झुका लीं।


उस रात उसने पहली बार डायरी में लिखा—


“सब कहते हैं मैं बड़ा हो गया हूँ…

लेकिन मैं बड़ा नहीं होना चाहता…

मुझे फिर से वही छोटा बच्चा बनना है…

जिसके पास पूरा घर था…”


अगले दिन जब मम्मी ने उससे पूछा—

“तुम इतने चुप क्यों हो गए हो?”


विहान ने पहली बार सीधा जवाब दिया—


“अब कुछ कहने से कोई फर्क नहीं पड़ता… इसलिए मैंने कहना ही छोड़ दिया है।”


मम्मी उसके शब्द सुनकर सन्न रह गईं।


उन्हें पहली बार एहसास हुआ कि उनका बेटा अब शिकायत भी नहीं करता…

और शायद यही सबसे बड़ी शिकायत थी।


मम्मी ने उस रात बहुत देर तक सोचा।

उन्हें एहसास हुआ कि वो अपने दुख में इतनी उलझ गई थीं कि विहान का दर्द देख ही नहीं पाईं।


अगले दिन उन्होंने ऑफिस से छुट्टी ली।

जब विहान स्कूल से लौटा, तो दरवाज़ा मम्मी ने खुद खोला।


“आज जल्दी आ गई?” विहान ने हैरानी से पूछा।


मम्मी ने मुस्कुराते हुए कहा—

“आज हम दोनों कहीं चलें?”


विहान चुप रहा, लेकिन उसके चेहरे पर हल्की सी चमक आ गई।


उस दिन मम्मी ने पहली बार बिना मोबाइल, बिना किसी जल्दी के पूरा दिन उसके साथ बिताया।

पार्क गए, आइसक्रीम खाई… और सबसे ज़रूरी—बातें कीं।


रात को सोते समय मम्मी ने उसका हाथ पकड़कर कहा—

“सब कुछ पहले जैसा नहीं हो सकता बेटा… लेकिन मैं कोशिश करूँगी कि तुम्हें कभी अकेला महसूस न हो।”


विहान ने कुछ नहीं कहा…

बस धीरे से मम्मी के कंधे पर सिर रख दिया।


काफी समय बाद उसे नींद आई—

थोड़ी सी सुकून वाली।



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