जिसे सहारा समझा, वही सहारा बनना भूल गया
दोपहर का समय था। घर के बाहर नीम के पेड़ से छनकर आती धूप ज़मीन पर बिखर रही थी। आँगन में हल्की हवा चल रही थी और अंदर कमरे में पुराने रेडियो पर धीमी आवाज़ में गाना बज रहा था।
रामकिशोर वर्मा अलमारी के सामने खड़े कपड़े निकाल रहे थे। कभी एक शर्ट देखते, फिर दूसरी… और फिर मुस्कुराकर पहली ही वापस रख देते।
“सुमन, ये नीली शर्ट ठीक रहेगी क्या…?” उन्होंने ज़रा ऊँची आवाज़ में पूछा।
रसोई से सुमन ने जवाब दिया—
“आपको जो अच्छा लगे वही पहन लीजिए… वैसे भी आज आप बहुत सोच-विचार कर रहे हैं।”
रामकिशोर जी हल्का सा हँसे—
“अरे, कई साल बाद शहर जा रहे हैं… थोड़ा तो बनना-संवरना बनता है ना।”
सुमन रसोई से बाहर आई। उसके हाथों में अब भी आटा लगा हुआ था, जैसे काम अधूरा छोड़कर ही चली आई हो। चेहरे पर वही सादगी, वही अपनापन था, जो सालों बाद भी ज़रा भी नहीं बदला था।
वह रामकिशोर जी को ऊपर से नीचे तक देखती हुई हल्के से मुस्कुराई और बोली—
“इतनी तैयारी तो आपने हमारी शादी में भी नहीं की थी…”
रामकिशोर जी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में शरारत सी चमक आई—
“तब तुम्हें देखने की जल्दी थी… और अब बेटे को।”
एक पल के लिए दोनों की नज़रें मिलीं। जैसे पुराने दिनों की कोई याद अचानक सामने आ गई हो। फिर बिना कुछ कहे ही दोनों हल्के से हँस पड़े।
“सुमन, वो लड्डू बन गए क्या?”
रामकिशोर जी ने बैग में कपड़े रखते हुए पूछा।
सुमन रसोई से बाहर आई, हाथ पोंछते हुए हल्की मुस्कान के साथ बोली—
“हाँ, सुबह ही बना लिए… तुम्हारे अमन को आज भी उतने ही पसंद हैं जितने बचपन में थे।”
रामकिशोर जी मुस्कुरा दिए—
“और आरव के लिए कुछ लिया ना?”
सुमन की आँखों में चमक आ गई—
“हाँ, उसके लिए एक छोटा सा खिलौना भी रखा है… पता नहीं अब कितना बड़ा हो गया होगा… पिछली बार तो बस गोद में ही था।”
यह कहते-कहते उसकी आवाज़ धीमी पड़ गई, लेकिन चेहरे पर वही ममता और मिलने की बेचैनी साफ झलक रही थी।
कई सालों बाद दोनों एक साथ घर से बाहर निकल रहे थे। जिम्मेदारियों में ऐसा उलझे कि कभी खुद के लिए समय ही नहीं मिला।
बस में बैठते ही सुमन खिड़की से बाहर देखने लगी—
“देखो जी… सब कितना बदल गया है…”
रामकिशोर जी ने मुस्कुराते हुए कहा—
“हाँ… लेकिन हम अभी भी वैसे ही हैं…”
“नहीं… अब हम दादा-दादी बन गए हैं…” सुमन हँसते हुए बोली।
शहर पहुँचते ही दोनों कुछ पल के लिए रुक गए। चारों तरफ भीड़, गाड़ियों का शोर और ऊँची-ऊँची इमारतें—सब कुछ उनके लिए नया था। हल्की-सी घबराहट जरूर थी, लेकिन उससे कहीं ज़्यादा दिल में अपने बेटे से मिलने की खुशी थी।
लोगों से रास्ता पूछते-पाछते वे आखिरकार एक बड़ी, चमचमाती बहुमंज़िला इमारत के सामने आकर रुक गए।
रामकिशोर जी ने पर्ची पर लिखा पता देखा, फिर इमारत की ओर नज़र उठाई—
“लगता है… यही है…”
सुमन ने गर्दन ऊपर उठाकर पूरी इमारत को देखा, आँखों में हैरानी साफ झलक रही थी—
“अरे… कितनी ऊँची है ये! जैसे आसमान को छू रही हो…”
कुछ देर बाद दोनों फ्लैट के दरवाज़े तक पहुँच गए।
दरवाज़ा पूरी तरह बंद नहीं था… अंदर से आवाज़ें साफ आ रही थीं।
“अमन, मैं साफ कह रही हूँ… मैं तुम्हारे मम्मी-पापा के साथ एडजस्ट नहीं कर पाऊँगी…”
रामकिशोर और सुमन वहीं रुक गए।
अमन की आवाज़ आई—
“नेहा, बात समझो… वो सिर्फ कुछ दिन के लिए आ रहे हैं…”
“कुछ दिन? तुम चाहते हो कि वो यहाँ रहकर बच्चे को संभालें… और मैं अपनी लाइफ भूल जाऊँ?”
“वो अपने हैं…”
“अपने हैं, लेकिन उनकी सोच अलग है… मुझे हर बात पर रोक-टोक पसंद नहीं है… और मैं रोज़ चार लोगों का खाना भी नहीं बना सकती…”
बाहर खड़े दोनों के हाथ धीरे-धीरे ढीले पड़ गए।
सुमन की आँखें भर आईं, लेकिन उसने आवाज़ नहीं की।
रामकिशोर जी ने एक गहरी साँस ली और धीरे से बोले—
“चलो सुमन…”
सुमन ने धीमे से पूछा—
“अंदर नहीं जायेंगे…?”
रामकिशोर जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“पहले थोड़ा शहर देख लेते हैं…”
और दोनों धीरे-धीरे वापस मुड़ गए…
हाथ में मिठाई का डिब्बा था…
और दिल में ढेर सारी उम्मीदें… जो अब चुपचाप टूट चुकी थीं।

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