इल्ज़ाम किसका?
दरवाज़े की घंटी बार-बार बज रही थी, लेकिन घर के अंदर किसी के कदमों की आहट नहीं थी। बाहर खड़ी माया जी ने हल्का सा माथा सिकोड़ते हुए फिर से बेल दबाई।
कुछ देर बाद दरवाज़ा खुला।
“अरे माया दीदी! आप?” सामने खड़ी सीमा ने हैरानी से कहा।
“हाँ भाभी, सोचा आज अचानक आ जाऊँ… लेकिन ये घर इतना शांत क्यों है? बहू कहाँ है तुम्हारी?” माया जी अंदर आते हुए बोलीं।
सीमा ने हल्की सी मुस्कान बनाई, “वो… ऑफिस गई है।”
“ऑफिस? इस वक्त?” माया जी ने घड़ी की तरफ देखा, “और बच्चा?”
“आरव… वो अपनी नानी के घर गया है।”
माया जी ने एक लंबी सांस ली और सोफे पर बैठ गईं, “भाभी, सच बताओ… ये रोज-रोज का नानी घर जाना कुछ ज्यादा नहीं हो गया? बहू घर संभालती भी है या नहीं?”
सीमा का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया, “क्या बताऊँ दीदी… मैंने तो सोचा था कि बहू आएगी तो घर में रौनक होगी, पोता हमारे पास रहेगा… लेकिन यहाँ तो सब उल्टा ही हो रहा है।”
“मतलब?” माया जी उत्सुक हो गईं।
“मतलब ये कि बहू को बस अपने मायके की ही पड़ी रहती है। बच्चा भी वहीं रहता है, और वो खुद भी मौका मिलते ही चली जाती है।”
“अरे ये तो ठीक नहीं है,” माया जी ने हामी भरी, “इतनी छोटी उम्र में बच्चा दादी से दूर रहेगा तो रिश्ता कैसे बनेगा?”
सीमा ने सिर हिलाया, “बस यही तो दुख है।”
इतने में दरवाज़ा फिर खुला।
अंदर आई नेहा, गोद में छोटा सा आरव था, और पीछे-पीछे उसका पति रोहित बैग लेकर आ रहा था।
“मम्मी, नमस्ते… अरे माया बुआजी आप?” रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा।
नेहा ने तुरंत झुककर पैर छुए, “नमस्ते बुआजी।”
“खुश रहो,” माया जी ने आशीर्वाद दिया, लेकिन उनकी नजरें सीधे आरव पर थीं।
“आओ बेटा, मेरे पास आओ,” उन्होंने हाथ बढ़ाया।
लेकिन आरव ने नेहा की गर्दन कसकर पकड़ ली और माया जी की तरफ देखने भी नहीं लगा।
“अरे… ये तो मेरे पास आ ही नहीं रहा,” माया जी ने हल्की नाराज़गी से कहा।
नेहा ने धीरे से कहा, “बच्चा है बुआजी… थोड़ा समय लगेगा।”
सीमा तुरंत बोल पड़ी, “समय कैसे लगेगा? जब रहेगा ही नहीं हमारे पास तो पहचानेगा कैसे?”
नेहा चुप हो गई और रसोई की तरफ बढ़ गई।
कुछ देर बाद जब चाय आई, तो माहौल थोड़ा सामान्य हुआ। लेकिन आरव पूरे समय नेहा के पास ही चिपका रहा।
थोड़ी देर बाद नेहा किचन में गई तो आरव भी उसके पीछे-पीछे चला गया।
माया जी ने देखा और सीमा से कहा, “भाभी, सच में ये बच्चा तो किसी के पास नहीं जा रहा।”
सीमा ने मौका पाकर कहा, “मैं तो कब से यही कह रही हूँ।”
इतने में माया जी खुद उठकर किचन में चली गईं।
वहाँ देखा—नेहा एक हाथ से खाना बना रही थी और दूसरे हाथ से आरव को संभाल रही थी।
“अरे बहू, ऐसे कैसे काम कर रही हो? इसे नीचे बैठा दो,” माया जी ने कहा।
नेहा हल्का सा मुस्कुराई, “बैठता ही नहीं है बुआजी… और कोई संभालता भी नहीं है।”
“क्या मतलब?” माया जी चौंकीं।
नेहा ने कुछ पल चुप रहकर कहा, “आप खुद देख लीजिए।”
वो आरव को लेकर बाहर आई और सीमा के पास जाकर बोली—
“मम्मी जी, ज़रा आरव को पकड़ लीजिए, मैं रोटी बेल लूँ।”
सीमा ने तुरंत हाथ पीछे कर लिए, “अरे नहीं-नहीं, मुझे बच्चों को संभालने की आदत नहीं है अब… तुम ही संभालो।”
माया जी सब देख रही थीं।
फिर नेहा रोहित की बहन पूजा के कमरे में गई।
“दीदी, ज़रा आरव को देख लीजिए, मैं काम पूरा कर लूँ,” नेहा ने कहा।
पूजा मोबाइल में व्यस्त थी, बिना ऊपर देखे बोली, “भाभी, मैं अभी बहुत बिजी हूँ… आप ही संभालिए।”
दरवाज़ा बंद हो गया।
अब नेहा वापस आई और चुपचाप किचन में लग गई।
माया जी धीरे-धीरे उसके पीछे गईं और बोलीं—
“तो ये वजह है…”
नेहा ने हल्के स्वर में कहा, “मैं चाहती हूँ कि आरव सबके साथ रहे… लेकिन जब कोई उसे अपने पास रखना ही नहीं चाहता, तो मैं क्या करूँ? ऑफिस जाना होता है, इसलिए मम्मी के पास छोड़ना पड़ता है।”
माया जी कुछ पल के लिए चुप हो गईं।
फिर बाहर आकर सीमा से बोलीं—
“भाभी, गलती बहू की नहीं है… गलती तुम्हारी है।”
सीमा चौंक गई, “मेरी?”
“हाँ,” माया जी ने सख्ती से कहा, “जब तुम खुद अपने पोते को संभालना नहीं चाहती, तो बहू क्या करे? उसे काम भी करना है और बच्चा भी संभालना है।”
घर में सन्नाटा छा गया।
सीमा के पास कोई जवाब नहीं था।
उस दिन के बाद सीमा ने कम से कम दूसरों के सामने बहू की शिकायत करना बंद कर दिया।
हालाँकि… आरव को गोद में लेने की हिम्मत उसने फिर भी बहुत देर से जुटाई।

Post a Comment