खाली घर की आवाज़
दरवाज़े की घंटी लगातार तीसरी बार बजी तो मैंने झुंझलाकर घड़ी की ओर देखा। इस समय कौन आ सकता है?
दरवाज़ा खोला तो सामने खड़ी लड़की को देखकर मैं कुछ पल के लिए रुक गई। साधारण सलवार-सूट, हाथ में फाइल, और चेहरे पर घबराहट साफ झलक रही थी।
“मैम… मैं नेहा… नई काउंसलर,” उसने धीमे स्वर में कहा।
“ओह!” मैंने दरवाज़ा थोड़ा और खोलते हुए कहा, “अंदर आइए।”
वह धीरे-धीरे अंदर आई, जैसे हर कदम सोच-समझकर रख रही हो। मैं उसे ड्रॉइंग रूम में बैठाकर सामने कुर्सी पर बैठ गई।
“कहिए, कैसे आना हुआ?”
“मैम… स्कूल में जॉइन तो कर लिया है, लेकिन रहने की बहुत समस्या हो रही है। सुना है आपके पास एक खाली फ्लैट है…”
मैं कुछ पल चुप रही। सच तो यह था कि वह फ्लैट महीनों से खाली पड़ा था, लेकिन किसी को किराए पर देने का मन नहीं करता था। लोगों से दूरी बनाए रखना अब मेरी आदत बन चुकी थी।
“नियम बहुत सख्त हैं मेरे,” मैंने ठंडे स्वर में कहा, “समय पर किराया, साफ-सफाई, और कोई निजी झंझट नहीं।”
नेहा ने तुरंत सिर हिला दिया—
“मैम, मैं बस शांत जगह चाहती हूं… बाकी सब मैं संभाल लूंगी।”
उसकी आंखों में एक अजीब-सी थकान थी, जो उसकी उम्र से मेल नहीं खाती थी।
मैंने कुछ सोचा, फिर अलमारी से चाबी निकालकर उसकी ओर बढ़ा दी—
“देख लीजिए। पसंद आए तो शिफ्ट हो जाइए।”
उसके चेहरे पर पहली बार हल्की मुस्कान आई—
“थैंक यू, मैम!”
कुछ ही दिनों में नेहा फ्लैट में शिफ्ट हो गई।
मैंने अपनी आदत के अनुसार दूरी बनाए रखी। स्कूल में भी सिर्फ काम की बातें होतीं, और घर पर तो मैं जाती ही नहीं थी।
लेकिन धीरे-धीरे मुझे उसमें कुछ अजीब लगने लगा।
वह अक्सर थकी हुई दिखती, कभी-कभी क्लास के बीच में ही पानी पीने के लिए रुक जाती। और सबसे खास बात—वह बच्चों के साथ असामान्य रूप से भावुक हो जाती थी।
एक दिन मैंने देखा, एक बच्चा रो रहा था और नेहा उसे चुप करा रही थी। वह उसे ऐसे सीने से लगाए हुए थी जैसे कोई मां अपने बच्चे को संभालती है।
मैंने पहली बार उससे पूछा—
“आप ठीक हैं?”
वह चौंक गई—
“जी मैम… बिल्कुल।”
लेकिन उसकी आंखें कुछ और ही कह रही थीं।
कुछ महीनों बाद उसने अचानक लंबी छुट्टी ले ली।
कारण सिर्फ इतना बताया—“तबीयत ठीक नहीं है।”
मैंने अपने स्वभाव के अनुसार ज़्यादा पूछताछ नहीं की।
लेकिन जब वह वापस लौटी, तो उसमें एक बदलाव साफ दिखाई दे रहा था। चेहरा पहले से शांत था… जैसे भीतर कोई बड़ा फैसला लेकर आई हो, या फिर किसी गहरी यात्रा से गुज़री हो।
मैंने महसूस तो किया, पर कुछ कहा नहीं।
कुछ समय बीता… और फिर वही सिलसिला दोहराया गया।
एक बार फिर छुट्टी… फिर कुछ महीनों बाद वापसी।
अब मेरे मन में सवाल उठने लगे थे। उसकी हर हरकत मुझे सोचने पर मजबूर कर रही थी।
लेकिन मैंने खुद ही अपने चारों ओर जो नियमों की दीवार खड़ी कर रखी थी… वही मुझे उससे कुछ पूछने से रोक रही थी।
एक दिन अचानक मुझे फ्लैट में जाना पड़ा। कुछ मरम्मत का काम था।
मैंने सोचा—चलो, आज देख ही लेते हैं।
दरवाज़ा नेहा ने ही खोला।
घर साफ-सुथरा था… लेकिन अजीब तरह से खाली।
न कोई फोटो, न कोई निजी सामान… जैसे कोई वहां रहता ही न हो, बस ठहरता हो।
“मैम, चाय लेंगी?” उसने औपचारिकता में पूछा।
“नहीं,” मैंने कमरे पर नजर दौड़ाते हुए कहा, “आप यहां अकेली ही रहती हैं?”
“जी।”
बस एक शब्द।
मैंने आगे कुछ नहीं पूछा।
कुछ हफ्तों बाद वह मेरे पास आई—
“मैम, मैं अगले महीने फ्लैट खाली कर दूंगी।”
मैं चौंक गई—
“क्यों?”
उसने हल्की मुस्कान के साथ एक कार्ड मेरी ओर बढ़ाया—
“मेरी शादी है।”
मैं अवाक रह गई।
“शादी?”
“जी।”
मैंने कार्ड लिया, लेकिन मेरे मन में सवालों का तूफान उठ चुका था।
शादी में मैं गई।
नेहा दुल्हन बनी बेहद खूबसूरत लग रही थी। उसके चेहरे पर आत्मविश्वास था, किसी तरह की झिझक नहीं।
उसके पास खड़ा लड़का—अमन—शांत और समझदार दिख रहा था।
सब कुछ सामान्य था… फिर भी मेरे मन में वही सवाल घूम रहा था।
तभी एक महिला मेरे पास आईं—
“आप प्रिंसिपल मैम हैं ना? मैं नेहा की मां हूं।”
यही मौका था।
मैंने मुस्कुराकर कहा—
“नेहा बहुत अच्छी है… बस थोड़ा समझना बाकी है।”
उन्होंने मेरी आंखों में देखा… और शायद सब समझ गईं।
“आप जानना चाहती हैं ना…?”
मैं चुप रही।
उन्होंने खुद ही कहना शुरू किया—
“नेहा ने जो किया… वह हर कोई नहीं कर सकता।”
मैं ध्यान से सुनने लगी।
“हमारी हालत बहुत खराब हो गई थी। घर गिरवी रखने की नौबत आ गई थी। उसी समय नेहा ने सरोगेसी का रास्ता चुना।”
मैं सन्न रह गई।
“एक बार नहीं… दो बार,” उन्होंने धीमे स्वर में कहा।
“लेकिन… उसने ये सब क्यों…?”
“अपने परिवार को बचाने के लिए,” उनकी आंखें भर आईं, “और उन लोगों के लिए… जो कभी माता-पिता नहीं बन सकते थे।”
मैंने धीरे से पूछा—
“क्या उसके पति को ये सब पता है?”
वह मुस्कुराईं—
“सब कुछ।”
तभी पीछे से आवाज आई—
“और मुझे उस पर गर्व है।”
मैंने मुड़कर देखा—अमन खड़ा था।
“किसी को जीवन देना… उससे बड़ा काम क्या हो सकता है?” उसने सहजता से कहा।
मेरे पास कोई जवाब नहीं था।
वापस लौटते समय मेरे कदम भारी थे… लेकिन दिल हल्का।
पहली बार मुझे लगा—
शायद मैं गलत थी।
मैंने अपने चारों ओर जो दीवारें खड़ी कर ली थीं… वे मुझे सुरक्षित तो रख रही थीं, लेकिन जीने नहीं दे रही थीं।
उस रात मैं देर तक जागती रही।
और फिर… अगले दिन मैंने एक निर्णय लिया।
मैंने फोन उठाया… और एक नंबर डायल किया—
“हेलो… मुझे सरोगेसी के बारे में जानकारी चाहिए…”
फोन के उस पार कुछ कहा गया।
मैंने आंखें बंद कीं… और लंबे समय बाद मुस्कुरा दी।
अब मेरा घर शायद सच में खाली नहीं रहेगा।

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