माँ ने छोड़ा नहीं… मुझे जीना सिखाया
घर में आज अजीब-सी खामोशी थी…
रसोई से बर्तनों की हल्की आवाज़ आ रही थी, लेकिन उस आवाज़ में भी जैसे कोई अपनापन नहीं था। दीवार पर टंगी घड़ी की टिक-टिक पूरे घर में गूंज रही थी, और हर टिक के साथ आरव के दिल की बेचैनी बढ़ती जा रही थी।
“माँ, आप ये सब क्यों कर रही हैं?”
आरव ने गुस्से में कहा।
सामने खड़ी उसकी माँ, राधा जी, चुपचाप अपना बैग पैक कर रही थीं।
“क्योंकि अब यही सही है, बेटा…” उन्होंने धीमी आवाज़ में जवाब दिया।
“सही?” आरव की आवाज़ ऊँची हो गई, “पापा के जाने के बाद आप ही तो कहती थीं कि हम दोनों ही एक-दूसरे का सहारा हैं। फिर अब अचानक आप मुझे छोड़कर क्यों जा रही हैं?”
राधा जी ने उसकी तरफ देखा, आँखों में दर्द साफ झलक रहा था।
“मैं तुझे छोड़कर नहीं जा रही, आरव… मैं तुझे बचाने जा रही हूँ।”
यह सुनकर आरव रुक गया।
“मुझे बचाने? किससे?”
“तेरी अपनी ज़िंदगी से…” राधा जी ने गहरी सांस लेते हुए कहा।
आरव कुछ समझ नहीं पा रहा था।
पिछले एक साल में बहुत कुछ बदल गया था। उसके पिता का अचानक देहांत हो गया था। घर की सारी ज़िम्मेदारी राधा जी पर आ गई थी। आरव अपनी नौकरी में व्यस्त रहने लगा था, लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने दोस्तों, अपनी खुशियों और अपने सपनों से दूरी बना ली थी।
हर वक्त बस एक ही चिंता—“माँ अकेली हैं… उन्हें मेरी ज़रूरत है…”
वो हर छोटी-बड़ी बात में अपनी ज़िंदगी रोक देता था।
दोस्तों के साथ बाहर जाना बंद…
नौकरी के बेहतर मौके छोड़ देना…
यहाँ तक कि शादी की बात आते ही मना कर देना…
राधा जी सब देख रही थीं।
“आरव,” उन्होंने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “मैंने तुझे इसलिए नहीं पाला कि तू अपनी ज़िंदगी मेरे लिए रोक दे। मैं चाहती हूँ तू आगे बढ़े… खुश रहे… अपनी दुनिया बनाए…”
“लेकिन मेरी दुनिया आप ही तो हैं!” आरव की आँखों में आँसू आ गए।
राधा जी मुस्कुराईं, लेकिन वो मुस्कान दर्द से भरी थी।
“और मेरी दुनिया तू है… इसलिए तो जा रही हूँ।”
कुछ पल के लिए दोनों के बीच सन्नाटा छा गया।
“मैं तेरे मामा के घर जा रही हूँ,” उन्होंने आगे कहा, “वहाँ लोग हैं… बातचीत है… और सबसे बड़ी बात, वहाँ तू हर वक्त मेरी चिंता नहीं करेगा।”
आरव ने सिर झुका लिया।
उसके अंदर एक अजीब-सी लड़ाई चल रही थी—
एक तरफ माँ को रोकने का मन,
और दूसरी तरफ उनकी बातों की सच्चाई।
उसी रात आरव अपने कमरे में बैठा पुरानी तस्वीरें देख रहा था।
एक तस्वीर में उसके पापा मुस्कुरा रहे थे…
दूसरी में माँ उसे स्कूल के लिए तैयार कर रही थीं…
तीसरी में तीनों साथ में हंस रहे थे…
अचानक उसे पापा की एक बात याद आई—
“बेटा, असली जिम्मेदारी वही होती है जो किसी को आगे बढ़ने दे, न कि रोक दे…”
आरव की आँखें नम हो गईं।
अगली सुबह उसने चुपचाप माँ का बैग उठाया और दरवाज़े तक छोड़ने आया।
“माँ…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
राधा जी मुड़ीं।
“आप जा रही हैं… लेकिन एक वादा कीजिए…”
“क्या?”
“आप खुश रहेंगी… अपने लिए भी जिएंगी…”
राधा जी की आँखों से आँसू बह निकले।
“और तू?” उन्होंने पूछा।
आरव हल्का सा मुस्कुराया।
“मैं भी अब सिर्फ आपका बेटा नहीं… बल्कि अपने पापा का सपना बनकर जीऊँगा।”
राधा जी ने उसे गले से लगा लिया।
उस दिन घर खाली ज़रूर हो गया…
लेकिन पहली बार आरव का दिल हल्का था।
कुछ महीनों बाद…
आरव की ज़िंदगी बदल चुकी थी।
नई नौकरी, नए दोस्त, और अब शादी की बात भी आगे बढ़ चुकी थी।
एक दिन उसने माँ को वीडियो कॉल किया।
“माँ, किसी से मिलवाना है…”
स्क्रीन पर एक लड़की आई।
“नमस्ते आंटी,” उसने मुस्कुराते हुए कहा।
राधा जी की आँखों में चमक आ गई।
“लगता है मेरा बेटा अब सच में बड़ा हो गया है…”
आरव मुस्कुराया।
“नहीं माँ… मैं आज भी वही हूँ… बस अब मैंने जीना सीख लिया है।”
राधा जी ने धीरे से कहा—
“और मैंने छोड़ना…”
दोनों हंस पड़े।
उस दिन उन्हें समझ में आया—
प्यार कभी बांधता नहीं…
सही मायनों में प्यार वही होता है जो आज़ाद करता है।

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