बराबरी का सम्मान
दोपहर ढल चुकी थी…
घर के आँगन में हल्की धूप बिखरी हुई थी, लेकिन घर के अंदर माहौल बिल्कुल शांत नहीं था।
“अब इस घर में मेरी कोई सुनता ही नहीं!”
रामप्रसाद जी की तेज आवाज पूरे घर में गूंज रही थी।
उनके चेहरे पर गुस्सा साफ दिखाई दे रहा था। उम्र ढल चुकी थी, लेकिन स्वभाव में अभी भी वही सख्ती और अधिकार झलकता था।
कमरे के अंदर बैठे उनके बेटे अजय ने जैसे ही ये आवाज सुनी, वो जल्दी से बाहर आया।
“क्या हुआ पिताजी? फिर किस बात पर नाराज़ हो गए?”
रामप्रसाद जी ने गुस्से में कहा—
“तुम्हें याद है ना, आज तुम्हारी बहन सीमा आने वाली है? और तुम अभी तक उसे लेने नहीं गए!”
अजय थोड़ा थका हुआ था। ऑफिस का काम, घर की जिम्मेदारियाँ—सब मिलकर उसे परेशान कर रहे थे।
“पिताजी… मैंने आपको बताया था ना, आज मेरी मीटिंग है… और गाड़ी भी सर्विस में है…”
रामप्रसाद जी ने बात काट दी—
“तो क्या हुआ? टैक्सी कर लो! बहन को लेने जाना इतना मुश्किल है क्या?”
अजय अब थोड़ा चिढ़ गया—
“पिताजी, सीमा अब बच्ची नहीं है। वो खुद आ सकती है। इसमें इतना बड़ा मुद्दा बनाने की क्या ज़रूरत है?”
बस… यही बात रामप्रसाद जी को चुभ गई।
“वाह! यही संस्कार दिए हैं हमने तुम्हें? जिस बहन ने तुम्हारा बचपन संभाला, आज उसके लिए ये सोच?”
तभी अंदर से अजय की पत्नी सुनीता और उसकी माँ शारदा जी बाहर आईं।
सुनीता ने धीरे से कहा—
“आप लोग शांत हो जाइए… बात समझकर कीजिए…”
लेकिन अब बात भावनाओं तक पहुँच चुकी थी।
अजय ने गहरी सांस ली और कहा—
“पिताजी, मैं बस एक बात पूछना चाहता हूँ…”
“पूछो!” रामप्रसाद जी बोले।
“जब बुआ जी आती हैं… तब आप उन्हें लेने क्यों नहीं जाते? वो भी तो आपकी बहन हैं… क्या उन्हें इज़्ज़त नहीं मिलनी चाहिए?”
ये सवाल जैसे सीधे दिल पर लगा।
रामप्रसाद जी कुछ पल के लिए बिल्कुल चुप हो गए।
उनकी आँखों के सामने पुराने दिन घूम गए—
कैसे उनकी छोटी बहन कुसुम उनके हर सुख-दुख में साथ खड़ी रहती थी…
कैसे शादी के बाद धीरे-धीरे उसका आना-जाना कम हो गया…
और कैसे उन्होंने भी कभी उसे रोकने या सम्मान देने की कोशिश नहीं की…
शारदा जी ने धीमे स्वर में कहा—
“मैं भी कई बार कहना चाहती थी… लेकिन आपकी आदत जानती थी…”
रामप्रसाद जी अब कुर्सी पर बैठ गए।
उनके चेहरे पर पहली बार पछतावा साफ दिख रहा था।
“शायद… मैं गलत था…” उन्होंने धीरे से कहा।
तभी दरवाज़े की घंटी बजी।
अजय ने दरवाज़ा खोला।
“भैया!”
सीमा अंदर आई और सीधा अपने पिताजी के गले लग गई।
“कैसे हैं आप?”
रामप्रसाद जी ने उसे देखा… और उनकी आँखें नम हो गईं।
“ठीक हूँ बेटा…”
सीमा ने ध्यान से देखा—
“आप रो क्यों रहे हैं?”
रामप्रसाद जी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“आज एक बहुत बड़ी बात समझ में आई है…”
“क्या?” सीमा ने पूछा।
“ये कि बेटी और बहन… दोनों एक ही होती हैं… लेकिन मैंने हमेशा फर्क किया…”
इतने में पीछे से आवाज आई—
“भइया…”
सबने मुड़कर देखा—
कुसुम बुआ दरवाज़े पर खड़ी थीं।
उनके हाथ में छोटा सा बैग था और चेहरे पर झिझक।
रामप्रसाद जी जैसे खुद को रोक नहीं पाए।
वो तेजी से उनके पास गए और उन्हें गले लगा लिया।
“मुझे माफ कर दो कुसुम…”
कुसुम बुआ की आँखों से आँसू बहने लगे—
“भइया… आप ऐसा क्यों कह रहे हैं…”
“क्योंकि मैंने कभी तुम्हें वो सम्मान नहीं दिया… जो देना चाहिए था…”
घर का माहौल भावुक हो गया।
अजय ये सब देख रहा था।
उसने आगे बढ़कर कहा—
“पिताजी… अभी भी देर नहीं हुई है…”
सुनीता मुस्कुराते हुए बोली—
“रिश्ते तो वही हैं… बस उन्हें महसूस करने की जरूरत होती है…”
सीमा ने हँसते हुए कहा—
“और हाँ… मैं खुद गाड़ी चलाकर आई हूँ!”
सब हैरान हो गए—
“क्या?”
अजय मुस्कुराया—
“हाँ पिताजी… वो गाड़ी मैंने दीदी और बुआ दोनों के लिए ली है… ताकि उन्हें कभी किसी का इंतजार ना करना पड़े…”
रामप्रसाद जी ने गर्व से बेटे की तरफ देखा।
“आज तुमने मुझे सिखाया है… कि रिश्ते निभाने के लिए सिर्फ हक जताना नहीं… बराबरी से सम्मान देना जरूरी है…”
शारदा जी बोलीं—
“जिस घर में बहन और बेटी दोनों को बराबर मान मिले… वही घर स्वर्ग बन जाता है…”
उस दिन के बाद घर बदल गया।
अब वहाँ कोई भेदभाव नहीं था…
ना बेटी अलग थी… ना बहन…
सबके लिए दरवाज़ा… और दिल… दोनों बराबर खुले थे।
सीख:
रिश्ते तभी मजबूत होते हैं जब उनमें बराबरी, सम्मान और सच्चा अपनापन हो—वरना वो सिर्फ नाम के रह जाते हैं।

Post a Comment