बंधन जो टूटकर भी जुड़ गया
सीमा चुपचाप रसोई में खड़ी थी। गैस पर रखी चाय कब की उबलकर आधी रह गई थी, पर उसका ध्यान कहीं और था। आज फिर वही बात हुई थी—सास, शारदा देवी, ने उसे सबके सामने ताने दिए थे।
“बहू होकर घर संभालना नहीं आता, और सलाह देने चली आती है…”
सीमा ने कुछ नहीं कहा था। उसने चुप रहना ही बेहतर समझा।
उसी घर में उसका पति, अमित, भी था—पर अब जैसे केवल नाम का। पहले जो हर छोटी बात पर उसका साथ देता था, अब माँ और पत्नी के बीच चुप रहने लगा था।
सीमा को सबसे ज्यादा दर्द उसी बात का था।
तीन साल पहले जब सीमा इस घर में आई थी, तो सब कुछ कितना अलग था।
शारदा देवी उसे बेटी की तरह रखती थीं। अमित हर शाम उसे चाय बनाकर देता था। घर में हंसी गूंजती रहती थी।
फिर धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं।
कारण छोटा था, पर असर गहरा—पैसों का।
अमित का छोटा भाई, रोहन, विदेश चला गया था। उसने अपनी कमाई माँ के खाते में भेजनी शुरू की। शारदा देवी को लगने लगा कि अब घर की आर्थिक जिम्मेदारी रोहन उठा रहा है।
और यहीं से तुलना शुरू हुई—
“देखो रोहन को… कितना समझदार है…”
“तुम दोनों बस खर्च करना जानते हो…”
सीमा को हर बार यह चुभता, पर वह चुप रहती।
एक दिन बात बढ़ गई।
सीमा ने हिम्मत करके कहा—
“माँजी, हम भी अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं… आप ऐसा मत कहा कीजिए…”
बस, वही दिन था जब रिश्तों में दरार आ गई।
शारदा देवी को लगा बहू जवाब दे रही है। अमित को लगा सीमा ने माँ की इज्जत नहीं रखी। और सीमा को लगा कि उसकी कोई कीमत ही नहीं।
उस दिन के बाद घर में तीन लोग थे… पर तीनों अलग-अलग।
समय धीरे-धीरे आगे बढ़ता रहा।
एक ही छत के नीचे रहते हुए भी जैसे तीनों के बीच अनकही दूरियाँ दीवार बनकर खड़ी हो गई थीं।
सीमा अब कम बोलने लगी थी, जैसे उसने अपने शब्दों को खुद में कैद कर लिया हो।
अमित ने भी हाल-चाल पूछना छोड़ दिया था, मानो रिश्ते निभाना अब उसकी प्राथमिकता ही न रही हो।
और शारदा देवी… उन्होंने समझने की कोशिश करना ही बंद कर दिया था।
फिर एक दिन अचानक रोहन का फोन आया।
“माँ, मैं अगले महीने इंडिया आ रहा हूँ… और इस बार हमेशा के लिए।”
यह सुनते ही शारदा देवी के चेहरे पर खुशी फैल गई।
“अब सब ठीक हो जाएगा…” उन्होंने मन ही मन सोचा।
उन्हें लगा रोहन आएगा, घर फिर से खुशियों से भर जाएगा।
रोहन आया।
घर में चहल-पहल हुई।
लेकिन उसने आते ही जो कहा, उससे सब चौंक गए—
“माँ, मैं अब अलग रहना चाहता हूँ।”
शारदा देवी के चेहरे का रंग उड़ गया।
“क्या मतलब?”
रोहन शांत स्वर में बोला—
“मैंने बहुत सोचा है। मैं अपना परिवार अलग बसाना चाहता हूँ। और… मैं अब पैसे भी सीधे अपने काम में लगाऊंगा।”
यह वही रोहन था, जिस पर उन्हें सबसे ज्यादा गर्व था।
आज वही दूर जाने की बात कर रहा था।
उस रात शारदा देवी सो नहीं पाईं।
उन्होंने पहली बार सोचा—
“क्या मैंने कुछ गलत किया?”
उनके दिमाग में पिछले कुछ साल घूम गए।
सीमा का चुप रहना…
अमित का बदलना…
घर की शांति का खत्म होना…
और फिर उन्हें अपनी ही आवाज़ सुनाई दी—
“देखो रोहन को…”
“तुम लोग कुछ नहीं करते…”
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
उन्हें समझ आ गया—
उन्होंने अपने ही घर को तुलना की आग में जला दिया था।
अगली सुबह, उन्होंने सीमा को रसोई में देखा।
वह चुपचाप आटा गूंथ रही थी।
शारदा देवी धीरे-धीरे उसके पास गईं।
कुछ पल तक कुछ बोली नहीं।
फिर अचानक बोलीं—
“सीमा…”
सीमा ने चौंककर देखा।
इतने दिनों बाद उन्होंने उसे नाम से बुलाया था।
“मुझे माफ कर दे बेटा…”
सीमा के हाथ रुक गए।
उसे यकीन ही नहीं हुआ।
“मैंने बहुत गलत किया। मैंने तुम्हारी कदर नहीं की। तुम्हें हमेशा कम समझा…”
सीमा की आँखें भर आईं।
“माँजी…”
“नहीं,” शारदा देवी ने उसका हाथ पकड़ लिया,
“आज मुझे बोलने दे… अगर आज नहीं कहा, तो शायद कभी नहीं कह पाऊँगी।”
अमित भी दरवाजे पर खड़ा सब सुन रहा था।
“मैंने घर को जोड़ने की बजाय तोड़ दिया… और मुझे लगा मैं सही हूँ…”
शारदा देवी रो पड़ीं।
सीमा ने तुरंत उनका हाथ थाम लिया।
“माँजी, ऐसा मत कहिए…”
अमित आगे आया।
उसने पहली बार मजबूती से कहा—
“गलती हम सबकी थी… मैंने भी कभी बीच में आकर बात नहीं संभाली।”
तीनों एक-दूसरे के सामने खड़े थे।
सालों की दूरी… कुछ पलों में पिघलने लगी।
शाम को रोहन फिर बैठा था अपना सामान पैक करने।
तभी अमित उसके पास आया—
“कहीं जाने की जरूरत नहीं है।”
रोहन ने हैरानी से देखा।
सीमा भी मुस्कुरा रही थी।
और पीछे खड़ी शारदा देवी बोलीं—
“घर छोड़कर मत जा बेटा… गलती मेरी थी… अब मैं सब ठीक करूँगी।”
रोहन की आँखें भर आईं।
उसने बैग बंद कर दिया।
उस रात घर में फिर से रौनक लौट आई थी।
डाइनिंग टेबल पर पूरा परिवार एक साथ बैठा था।
हँसी की आवाजें गूंज रही थीं, बातें हो रही थीं, और बीच-बीच में हल्की-फुल्की नोकझोंक भी चल रही थी।
सब कुछ फिर से पहले जैसा लगने लगा था—अपनापन भरा, सुकून से भरपूर और पूरी तरह से मुकम्मल।
रात को सीमा छत पर खड़ी थी।
अमित उसके पास आया।
“धन्यवाद…”
सीमा मुस्कुराई—
“किस बात का?”
“घर को बचाने के लिए…”
सीमा ने आसमान की तरफ देखा और धीरे से कहा—
“घर तब नहीं टूटता जब लोग लड़ते हैं…
घर तब टूटता है जब लोग बात करना छोड़ देते हैं…”
अमित ने उसका हाथ पकड़ लिया।
नीचे आँगन में शारदा देवी खामोश खड़ी आसमान की तरफ देख रही थीं।
उनके चेहरे पर अब एक गहरा सुकून था।
उन्हें अब यह समझ आ गया था—
रिश्ते जीतने से नहीं, समझने से चलते हैं।

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