अच्छाई की सीमा
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। रमा चुपचाप कुर्सी पर बैठी बाहर सड़क को देख रही थी। घर में सन्नाटा था। पति ऑफिस जा चुके थे और बेटा-बेटी अपने-अपने काम में बाहर थे।
दिन भर का समय जैसे काटे नहीं कटता था।
तभी सामने वाले खाली मकान में हलचल दिखी। कुछ लोग सामान उतार रहे थे। रमा के चेहरे पर हल्की मुस्कान आ गई—
“चलो… अब शायद अकेलापन थोड़ा कम होगा।”
शाम तक पता चला कि वहां एक छोटा-सा परिवार रहने आया है—नेहा, उसका पति और उनकी चार साल की बेटी परी।
अगले ही दिन नेहा खुद रमा से मिलने आई।
“नमस्ते दीदी… हम अभी नए आए हैं, सोचा आपसे मिल लूं।”
रमा ने मुस्कुराते हुए उसे अंदर बुलाया। धीरे-धीरे दोनों में बात होने लगी। नेहा मिलनसार थी, और रमा को भी उसका साथ अच्छा लगने लगा।
कुछ दिनों बाद नेहा ने झिझकते हुए कहा—
“दीदी… अगर आपको कोई परेशानी न हो तो… कभी-कभी परी को आपके पास छोड़ दिया करूं? मुझे थोड़ा काम निपटाने में आसानी हो जाएगी।”
रमा तो जैसे इसी का इंतज़ार कर रही थी।
“अरे क्यों नहीं! मुझे भी अच्छा लगेगा… बच्चे के साथ समय कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता।”
बस फिर क्या था…
अब रोज़ परी रमा के घर आने लगी। रमा उसे कहानियां सुनाती, खिलाती-पिलाती और उसके साथ खेलती। घर में फिर से चहल-पहल हो गई।
लेकिन धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं।
अब नेहा अक्सर बहाने बनाने लगी—
“दीदी, आज थोड़ा मार्केट जाना है…”
“आज किटी पार्टी है…”
“आज फ्रेंड्स के साथ बाहर जा रही हूं…”
और परी घंटों रमा के पास रहती।
रमा कभी मना नहीं कर पाती, लेकिन अब उसे थकान होने लगी थी।
एक दिन तो हद ही हो गई…
रमा की तबीयत ठीक नहीं थी। हल्का बुखार और सिर दर्द था। वह बिस्तर पर लेटी हुई थी।
तभी डोरबेल बजी।
दरवाज़ा खोला तो सामने नेहा खड़ी थी।
“दीदी, आज मुझे शादी में जाना है… आप परी को रख लीजिए ना, देर हो जाएगी।”
रमा ने धीरे से कहा—
“नेहा… आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है… मैं शायद संभाल नहीं पाऊंगी।”
नेहा का चेहरा अचानक बदल गया।
“दीदी, आप भी ना… जब आपका मन होता है तब तो आप खुद बुला लेती हैं, और आज मना कर रही हैं? मुझे कितना जरूरी काम है, आपको पता भी है?”
रमा यह सुनकर एकदम चुप रह गई।
उसे यकीन ही नहीं हुआ कि नेहा ऐसा भी बोल सकती है।
तभी अंदर से रमा की बेटी सिया बाहर आई, जो आज घर पर ही थी।
उसने साफ शब्दों में कहा—
“आंटी, मम्मी ने आपकी मदद की थी, आपकी जिम्मेदारी नहीं उठाई थी। आपने उनकी अच्छाई को आदत बना लिया है।”
नेहा चुप हो गई।
सिया ने आगे कहा—
“आज मम्मी बीमार हैं, और आपको उनकी चिंता करने की बजाय अपनी पार्टी की पड़ी है… अगर इतना ही जरूरी है तो आप अपनी बेटी को साथ ले जा सकती हैं।”
रमा का बेटा भी बोल पड़ा—
“हर चीज की एक सीमा होती है आंटी… और आपने वो सीमा पार कर दी है।”
अब नेहा की आंखें झुक चुकी थीं।
उसे एहसास हो गया था कि उसने सच में रमा की भलाई का गलत फायदा उठाया।
धीरे से उसने कहा—
“दीदी… मुझे माफ कर दीजिए… मैंने सच में गलती की है।”
रमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“गलती तब तक ही होती है जब तक हम उसे समझ न लें… अब समझ आ गई है, तो ठीक है।”
उस दिन के बाद नेहा ने कभी भी रमा की मजबूरी का फायदा नहीं उठाया।
और रमा ने भी एक बात सीख ली—
“अच्छा होना अच्छी बात है…
लेकिन अपनी अच्छाई की एक सीमा तय करना उससे भी ज्यादा जरूरी है।”

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