अब और नहीं
दरवाज़े के बाहर रखी नई चप्पलों की कतार देखकर ही रमा समझ गई कि घर में फिर कोई मेहमान आया है।
वह धीरे-धीरे अंदर आई। हाथ में सब्ज़ियों का थैला था और चेहरे पर दिनभर की थकान साफ झलक रही थी। जैसे ही उसने आँगन में कदम रखा, अंदर से हँसी की आवाज़ें आने लगीं।
ड्राइंग रूम में उसकी ननद पूजा बैठी थी, सास ललिता देवी के साथ चाय पीते हुए।
“अरे आ गई बहू?” ललिता देवी ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, लेकिन उस मुस्कान में अपनापन कम और औपचारिकता ज़्यादा थी।
रमा ने नमस्ते की और चुपचाप किचन की तरफ बढ़ गई।
किचन में घुसते ही उसने गहरी सांस ली। वह जानती थी—अब अगले कुछ दिनों तक घर का सारा काम, मेहमाननवाज़ी और ताने—सब उसे ही झेलना है।
पीछे-पीछे पूजा भी किचन में आ गई।
“भाभी, आज क्या बना रही हो?” उसने चुलबुले अंदाज़ में पूछा।
रमा ने धीमे स्वर में कहा, “सोचा था दाल-चावल बना लूँ… तुम आ गई हो तो कुछ अच्छा बना देती हूँ।”
पूजा हँसते हुए बोली, “अरे हाँ, मेरे लिए पनीर बना देना… और वो मीठा भी, जो तुम अच्छा बनाती हो।”
रमा ने सिर हिलाया, “ठीक है।”
उसने बिना कुछ कहे काम शुरू कर दिया।
यह सिलसिला नया नहीं था।
पूजा जब भी आती, घर में जैसे उसका ही राज चलता। उसकी पसंद का खाना, उसकी पसंद की चीज़ें, और सबसे ज़रूरी—जो चीज़ उसे पसंद आ जाए, वह उसी की हो जाती।
पहले-पहले रमा को अजीब लगता था, लेकिन धीरे-धीरे उसने चुप रहना सीख लिया था।
उसे लगता था—“चलो, रिश्ते हैं… निभाने पड़ते हैं।”
लेकिन हर बार कुछ न कुछ ऐसा हो जाता, जो उसके मन में एक और खरोंच छोड़ जाता।
खाना बनकर तैयार हुआ। सब लोग साथ बैठकर खाने लगे।
पूजा खाते-खाते अचानक बोली, “भाभी, ये कुर्ती बहुत सुंदर है… नई ली क्या?”
रमा ने हल्की मुस्कान के साथ कहा, “नहीं, मम्मी ने दी थी… पिछले महीने।”
पूजा ने तुरंत कहा, “तो मुझे दे दो ना… मेरे ऊपर बहुत अच्छी लगेगी।”
रमा के हाथ रुक गए।
ललिता देवी ने तुरंत कहा, “अरे दे दे बहू, बहन ही तो है… क्या फर्क पड़ता है?”
रमा ने चुपचाप खाना खत्म किया और बिना कुछ बोले अपनी कुर्ती निकालकर पूजा को दे दी।
उस रात वह देर तक जागती रही।
उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह हर बार क्यों चुप रह जाती है।
क्या रिश्ते निभाने का मतलब खुद को खो देना होता है?
कुछ दिन बीते।
एक दिन रमा ने अपने लिए बड़ी मुश्किल से एक चांदी की पायल खरीदी। उसने महीनों पैसे बचाए थे।
वह पायल पहनकर आईने के सामने खड़ी थी—चेहरे पर हल्की-सी खुशी थी।
तभी पूजा फिर आ गई।
“अरे भाभी! ये पायल तो बहुत सुंदर है!” उसने झुककर ध्यान से देखा।
रमा का दिल धड़कने लगा।
उसे अंदाज़ा हो गया था कि अब क्या होने वाला है।
पूजा ने बिना समय गंवाए कहा, “ये मुझे दे दो ना… मेरे पास ऐसी नहीं है।”
रमा ने इस बार धीरे से कहा, “दीदी… ये मैंने अपने लिए ली है…”
पूजा का चेहरा थोड़ा बदल गया।
“तो क्या हुआ? मैं कोई बाहर वाली हूँ क्या?”
ललिता देवी ने भी वही बात दोहराई, “बहू, इतनी छोटी-सी चीज़ के लिए मना कर रही है?”
रमा की आँखों में आँसू आ गए, लेकिन इस बार उसने पायल नहीं उतारी।
उसने धीमे मगर साफ शब्दों में कहा—
“मम्मी जी, छोटी चीज़ है इसलिए ही तो अपने लिए ली है… हर बार मैं सब दे देती हूँ… लेकिन क्या कभी किसी ने सोचा कि मुझे भी कुछ रखने का हक है?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
पूजा ने तुनककर कहा, “वाह भाभी! आज तो बहुत बोलने लगी हो।”
रमा ने पहली बार उसकी आँखों में आँखें डालकर कहा—
“हाँ दीदी… क्योंकि अब समझ आ गया है कि चुप रहने से सामने वाले की आदत बिगड़ जाती है।”
ललिता देवी गुस्से से बोलीं, “बहू, ये क्या तरीका है?”
रमा की आवाज़ काँप रही थी, लेकिन वह रुकी नहीं—
“मम्मी जी, मैंने हमेशा आपकी हर बात मानी… लेकिन क्या कभी आपने मेरी बात समझने की कोशिश की?”
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैं भी इस घर की बहू हूँ… मेरा भी हक है अपनी चीज़ों पर… अपने फैसलों पर…”
पूजा कुछ बोल नहीं पाई।
पहली बार उसे एहसास हुआ कि रमा अब वही चुप रहने वाली लड़की नहीं रही।
कुछ देर बाद पूजा गुस्से में उठी और बोली, “ठीक है… अब कुछ नहीं माँगूँगी।”
रमा ने शांत स्वर में कहा, “माँगना गलत नहीं है दीदी… लेकिन बिना पूछे लेना गलत है।”
उस दिन के बाद घर में बहुत कुछ बदल गया।
ललिता देवी अब पहले जैसी नहीं रहीं। उन्होंने धीरे-धीरे रमा की बातों को समझना शुरू किया।
और पूजा…
वह अब जब भी आती, पहले पूछती—“भाभी, ये ले सकती हूँ?”
रमा अब भी वही थी—संस्कारों वाली, सबका ध्यान रखने वाली…
लेकिन अब वह खुद का भी ख्याल रखना सीख गई थी।
क्योंकि उसने समझ लिया था—
रिश्ते निभाने के लिए खुद को खो देना ज़रूरी नहीं होता…
कभी-कभी खुद के लिए खड़ा होना ही सबसे बड़ा रिश्ता निभाना होता है।

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