सबक जो घर से शुरू होता है

 

Emotional Indian family moment where a woman is crying on a sofa while her husband realizes his mistake, with a grandmother in the background and a child observing silently


सोनाली सोफे के कोने में चुपचाप बैठी थी। उसकी आँखें लाल थीं और चेहरा बुझा हुआ। सामने टेबल पर रखा फोन बार-बार बज रहा था, लेकिन उसने उठाने की ज़रूरत नहीं समझी।


तभी दरवाज़ा खुला।


अमित ऑफिस से घर लौटा था। जैसे ही अंदर आया, बैग सोफे पर फेंकते हुए बोला—


“आज तो बहुत थक गया यार… जरा जल्दी से चाय बना दो, सिर दर्द से फट रहा है।”


सोनाली चुप रही।


अमित ने जूते उतारते हुए फिर कहा—


“अरे सुन रही हो ना? क्या हुआ, आज इतना सन्नाटा क्यों है?”


जब कोई जवाब नहीं मिला, तो उसने मुड़कर देखा।


“अरे… तुम रो रही हो?”


सोनाली की आँखों से आँसू फिर बहने लगे।


अमित थोड़ा झुंझलाया—


“अब क्या हुआ? फिर मम्मी से कुछ कहासुनी हो गई क्या? सच में, मैं तुम दोनों की रोज़-रोज़ की बहस से तंग आ गया हूँ।”


वो गुस्से में उठने लगा—


“आज मम्मी से साफ-साफ बात कर ही लेता हूँ।”


तभी सोनाली ने उसका हाथ पकड़ लिया।


“रुकिए।”


उसकी आवाज़ धीमी थी… लेकिन आज उसमें एक अजीब-सी दृढ़ता थी।


अमित ने हैरानी से पूछा—


“अब क्या हुआ?”


सोनाली ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा—


“हर बार मम्मी को ही क्यों समझाते हो? कभी खुद को भी समझाने की कोशिश की है?”


अमित चौंक गया—


“मतलब? तुम कहना क्या चाहती हो?”


सोनाली ने गहरी सांस ली—


“आज जो मेरे साथ हुआ… वो आपकी वजह से हुआ है।”


“मेरी वजह से?” अमित का स्वर ऊँचा हो गया।


“हाँ, आपकी वजह से।”


कुछ पल के लिए दोनों के बीच सन्नाटा छा गया।


फिर सोनाली बोली—


“आज मैं आरव को होमवर्क के लिए बोल रही थी। वो मोबाइल में गेम खेल रहा था। मैंने बस इतना कहा—‘पहले पढ़ाई कर लो, फिर खेलना।’”


अमित ध्यान से सुनने लगा।


“तो उसने क्या किया पता है?” सोनाली की आवाज़ भर्रा गई—


“उसने मोबाइल नीचे रखा… और आपकी ही आवाज़ में बोला—

‘मम्मी, आप तो बस चुप ही रहा करो… हर बात में बोलना जरूरी है क्या?’”


अमित के चेहरे का रंग उड़ गया।


उसके हाथ खुद-ब-खुद ढीले पड़ गए।


सोनाली की आँखों से आँसू लगातार बह रहे थे—


“आज मुझे पहली बार समझ आया कि मम्मी कैसा महसूस करती होंगी… जब आप उन्हें सबके सामने चुप रहने को कहते हो।”


अमित की नज़रें झुक गईं।


उसे सुबह की बात याद आ गई…


माँ कुछ कह रही थीं, और उसने झल्लाकर कहा था—

“मम्मी, आप हर बात में मत बोला करो… बस चुप रहा करो।”


वो पल जैसे उसके सामने फिर से जीवित हो गया।


अमित धीरे से सोफे पर बैठ गया।


कमरे में फिर सन्नाटा था… लेकिन इस बार सन्नाटा भारी था।


थोड़ी देर बाद उसने धीमी आवाज़ में कहा—


“मैंने कभी सोचा ही नहीं… कि मेरे बोलने का असर इतना गहरा हो सकता है।”


सोनाली ने उसकी तरफ देखा—


“बच्चे वही सीखते हैं जो हम करते हैं… जो हम बोलते हैं… वही उनके शब्द बन जाते हैं।”


अमित की आँखें नम हो गईं।


“मैं हमेशा सोचता था कि मैं सबको संभाल रहा हूँ… लेकिन असल में मैं ही सबको तोड़ रहा था।”


इतना कहकर वो उठा… और सीधे अपनी माँ के कमरे की ओर चला गया।


दरवाज़ा हल्का-सा खुला था।


अंदर माँ चुपचाप बैठी थीं, हाथ में माला थी… लेकिन उनकी उंगलियाँ रुकी हुई थीं।


अमित धीरे से अंदर गया।


“माँ…”


माँ ने सिर उठाया। उनके चेहरे पर वही पुरानी ममता थी… लेकिन कहीं हल्की-सी दूरी भी।


अमित उनके पास बैठ गया और उनका हाथ पकड़ लिया।


“माँ… मुझसे गलती हो गई।”


माँ कुछ नहीं बोलीं।


अमित की आवाज़ भर्रा गई—


“मैं आपको बार-बार चुप रहने को कहता रहा… बिना ये सोचे कि आपको कितना बुरा लगता होगा। मुझे माफ कर दीजिए।”


माँ की आँखों में आँसू आ गए।


उन्होंने धीरे से कहा—


“बेटा, मैं तो बस तुम्हारी भलाई के लिए बोलती थी… लेकिन जब तुमने चुप कराया, तो लगा शायद अब मेरी जरूरत नहीं रही।”


अमित ने तुरंत उनका हाथ कसकर पकड़ लिया—


“ऐसा मत कहो माँ… आपकी जरूरत हमेशा रहेगी।”


कुछ पल बाद माँ ने उसके सिर पर हाथ रख दिया।


उसी समय दरवाज़े पर छोटा आरव खड़ा था… सब कुछ देख रहा था।


अमित ने उसे पास बुलाया।


“आरव, इधर आओ।”


वो धीरे-धीरे आया।


अमित ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा—


“बेटा, आज से हम घर में किसी से भी ‘चुप रहो’ नहीं कहेंगे… ना मम्मी से, ना दादी से… और ना किसी और से। समझे?”


आरव ने सिर हिला दिया।


फिर उसने धीरे से कहा—


“सॉरी मम्मी…”


सोनाली की आँखों में फिर आँसू आ गए… लेकिन इस बार ये आँसू दर्द के नहीं, सुकून के थे।


आज इस घर में एक बड़ा सबक सीखा गया था—


“संस्कार सिखाए नहीं जाते… जीए जाते हैं।”



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