अपना आसमान
दोपहर का समय था। खिड़की से आती हल्की धूप कमरे के फर्श पर बिखर रही थी। रेखा ने दरवाज़ा खोला तो सामने वाले फ्लैट का दरवाज़ा खुला हुआ देखा।
“अरे… शांता काकी वापस आ गईं क्या?” उसने मन ही मन सोचा।
रेखा जल्दी से उनके घर की ओर बढ़ी। अंदर देखा तो शांता काकी आराम से कुर्सी पर बैठी थीं, हाथ में चश्मा और सामने खुली हुई पुरानी किताब।
“अरे काकी! आप…? आप तो बेटे के पास पुणे गई थीं ना?” रेखा ने हैरानी से पूछा।
शांता काकी ने मुस्कुराकर चश्मा उतारा—
“आ गई बेटा… अपने घर।”
रेखा उनके पास बैठ गई—
“सब ठीक तो है ना? वहां कोई परेशानी तो नहीं हुई?”
काकी हल्का-सा हंस दीं—
“नहीं रे… सब बहुत अच्छे हैं। बेटा, बहू, पोते—सब बहुत प्यार करते हैं। कोई कमी नहीं थी वहां…”
“तो फिर वापस क्यों आ गईं?” रेखा ने उत्सुकता से पूछा।
काकी ने खिड़की से बाहर झांकते हुए धीरे-धीरे कहना शुरू किया—
“देख बेटा… प्यार और अपनापन अपनी जगह है, लेकिन अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीना एक अलग बात होती है।”
“वहां सब अपने-अपने कामों में व्यस्त रहते थे—बेटा सुबह जल्दी ऑफिस चला जाता, बहू अपने काम में लगी रहती, और बच्चे स्कूल व मोबाइल में खोए रहते…”
“ऐसे में मैं पूरे दिन क्या करती? ना पड़ोस में कोई जान-पहचान, ना ही कोई बात करने वाला…”
रेखा चुपचाप उनकी बातें ध्यान से सुन रही थी।
काकी ने थोड़ा रुककर गहरी सांस ली और फिर बोलीं—
“और सबसे बड़ी बात, बेटा… मुझे अपने ही घर में मेहमान जैसा महसूस होने लगा था।”
यहाँ… काकी ने चारों ओर नजर घुमाते हुए धीमे स्वर में कहा—
“यह घर सिर्फ ईंट और दीवारों का नहीं है बेटा… यह मेरी जिंदगी का हिस्सा है। ये दीवारें मेरी हंसी भी जानती हैं और मेरे आँसू भी… ये रसोई मेरे हाथों का स्वाद पहचानती है… और यह खिड़की, मेरे हर सुबह-शाम की साथी है।”
थोड़ा रुककर उन्होंने मुस्कुराते हुए आगे कहा—
“यहाँ मैं अपने मन की मालिक हूँ… जब चाहूँ उठती हूँ, जब चाहूँ चाय बनाती हूँ… कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। यही आज़ादी तो सुकून देती है।”
रेखा उनकी बात सुनकर हल्के से मुस्कुरा दी—
“और काकी… आपकी सुबह की तेज़ आवाज़ में बजता रेडियो… वो तो पूरी बिल्डिंग को अलार्म की तरह जगा देता है!”
यह सुनते ही काकी भी खिलखिलाकर हँस पड़ीं—
“अरे, किसी को तो जगाना पड़ेगा ना!”
“तुम लोग हो ना…” काकी ने स्नेह से कहा—
“नीचे वाले रमेश भैया, सामने वाली मीना… और ऊपर वाली हमारी प्यारी गुड़िया…”
थोड़ा मुस्कुराते हुए काकी बोलीं—
“कल ही तो गुड़िया आई थी और कहने लगी—
‘काकी, आपकी कहानी सुने बिना मुझे नींद ही नहीं आती।’”
रेखा भी भावुक होकर बोली—
“सच कहूं काकी, जब आप यहां नहीं थीं ना… तो पूरी बिल्डिंग सूनी-सूनी लग रही थी।”
काकी ने गंभीर होकर कहा—
“बेटा, उम्र के इस पड़ाव पर सबसे जरूरी होता है—अपना मन।”
“हम अगर खुद ही खुश नहीं रहेंगे, तो कोई हमें खुश नहीं रख सकता।”
“बच्चे अपनी जिंदगी जी रहे हैं… और उन्हें जीनी भी चाहिए।”
“लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि हम अपनी जिंदगी छोड़ दें।”
रेखा ने धीरे से पूछा—
“लेकिन काकी… अगर तबीयत खराब हो जाए तो?”
काकी मुस्कुराईं—
“तो तुम लोग हो ना…”
“और फिर…”
“एक दिन के डर से क्या मैं अपने बाकी के साल डर-डर कर जीऊं?”
“मैंने सोचा… जहां मुझे सुकून मिले, वहीं रहना चाहिए।”
“यहां मैं अकेली नहीं हूं… मेरा अपना संसार है।”
“यहां मुझे लगता है… मैं अभी भी अपनी जिंदगी की मालिक हूं।”
इतने में दरवाज़े पर आवाज आई—
“काकी… मैं आ गई!”
गुड़िया दौड़ती हुई अंदर आई।
“आज नई कहानी सुनाओ ना!”
काकी ने मुस्कुराकर उसे पास बैठा लिया—
“आज मैं तुम्हें ‘अपना आसमान’ की कहानी सुनाऊंगी…”
रेखा यह सब देख रही थी… और उसके चेहरे पर भी एक सुकून भरी मुस्कान थी।
संदेश:
हर बुजुर्ग जो अकेले रहता है… वह जरूरी नहीं कि अकेला हो।
कई बार वह अपने बनाए हुए छोटे-से संसार में ज्यादा खुश होता है।
उसे किसी सहारे की नहीं…
बस अपनेपन, सम्मान और आज़ादी की जरूरत होती है।

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