वक़्त का आईना

 

Elderly man standing alone outside an old age home with emotional expression


आँगन में रखी पुरानी चारपाई आज फिर धूप में डाली गई थी, लेकिन उस पर बैठने वाला कोई नहीं था।


गांव के लोग कहते थे—“रामदीन काका पहले कितने खुशमिजाज़ थे…”

लेकिन अब उनकी मुस्कान जैसे कहीं खो गई थी।


रामदीन काका और उनकी पत्नी लाजो देवी का एक ही बेटा था—संदीप।

उसी के लिए उन्होंने पूरी ज़िंदगी खपा दी थी।



संदीप बचपन से ही होशियार था।

काका खेत बेचकर, कर्ज लेकर उसे शहर पढ़ने भेजे।


लाजो देवी अक्सर कहतीं—

“हमारा बेटा बड़ा आदमी बनेगा, बस यही सपना है हमारा।”


सालों की मेहनत रंग लाई…

संदीप को शहर में बड़ी नौकरी मिल गई।


धीरे-धीरे उसकी ज़िंदगी बदलने लगी।


अब उसके फोन पहले जैसे नहीं आते थे,

कभी-कभी तो कई दिनों तक कोई खबर ही नहीं मिलती थी।


घर आना भी जैसे उसकी यादों से दूर होता जा रहा था,

जैसे वह उस घर से नहीं, सिर्फ अपनी नई दुनिया से जुड़ गया हो।



एक दिन अचानक फोन आया—

“बाबा, मैंने शादी कर ली है… आपको बताने का मौका नहीं मिला।”


रामदीन काका चुप रह गए…

लाजो देवी की आँखें भर आईं, लेकिन उन्होंने खुद को संभाल लिया।


“कोई बात नहीं बेटा… खुश रहो बस।”



कुछ महीनों बाद संदीप अपनी पत्नी प्रिया के साथ गाँव आया।


लाजो देवी ने उनके स्वागत में पूरे घर को बड़े प्यार से सजा दिया। रसोई में तरह-तरह के पकवान बन रहे थे, मानो घर में कोई त्योहार हो। उनके मन में बस एक ही उम्मीद थी—अब घर फिर से हँसी-खुशी से भर जाएगा।


लेकिन प्रिया को गाँव का माहौल बिल्कुल रास नहीं आया।


वह इधर-उधर देखते हुए हल्की नाराज़गी के साथ बोली—

“यहाँ तो ठीक से नेटवर्क भी नहीं आता… ऐसे में रहना तो मुश्किल ही है।”


उसकी बात सुनकर संदीप कुछ पल चुप रहा, और लाजो देवी की मुस्कान धीरे-धीरे फीकी पड़ गई।



रात को खाना खाते समय संदीप बोला—

“बाबा, आप दोनों हमारे साथ शहर चलो… वहाँ आराम से रहोगे।”


लाजो देवी खुश हो गईं—

“देखा, हमारा बेटा हमें अपने साथ रखना चाहता है।”


रामदीन काका कुछ समझ रहे थे…

लेकिन पत्नी की खुशी के आगे चुप रहे।



कुछ ही दिनों में घर और ज़मीन बेच दी गई।

सारी रकम और कागज़ात संदीप के नाम कर दिए गए।


गांव के लोगों ने कई बार समझाया—

“काका, ज़रा सोच-समझकर फैसला लेना… सब कुछ एक साथ मत सौंप देना।”


लेकिन माँ का दिल तो आखिर माँ का ही होता है।

उसे अपने बेटे पर पूरा भरोसा था—

कि वह कभी उनका बुरा नहीं सोचेगा।



शहर पहुँचने के बाद माहौल धीरे-धीरे बदलने लगा।


शुरुआत के कुछ दिन सब सामान्य रहे, लेकिन समय बीतने के साथ घर का रंग-रूप ही बदल गया।


अब छोटी-छोटी बातों पर ताने सुनाई देने लगे—


“इतनी छोटी जगह में रहना मुश्किल हो रहा है…”

“बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ रहा है…”

“ऐसे तो हमारी आज़ादी ही खत्म हो जाएगी…”


धीरे-धीरे ये बातें शिकायत से आदत बन गईं,

और घर का सुकून कहीं खो गया।



एक दिन प्रिया ने साफ-साफ कह दिया—


“संदीप, अब फैसला तुम्हें करना होगा…

या तो हम अलग घर में रहेंगे, या फिर तुम्हारे माँ-बाप को कहीं और रहने का इंतज़ाम करना होगा।”


संदीप कुछ पल तक चुप बैठा रहा।

उसकी नजरें झुकी हुई थीं, जैसे वह खुद से ही नज़रें चुरा रहा हो।


उसने कुछ नहीं कहा…

लेकिन उसकी खामोशी ही सब कुछ कह गई।



कुछ ही दिनों बाद…


रामदीन काका और लाजो देवी खुद को एक वृद्धाश्रम के बाहर खड़े पाए।


लाजो देवी की आँखों से आँसू थमने का नाम नहीं ले रहे थे। कांपती आवाज़ में उन्होंने कहा—

“बेटा… हमने तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ा… हर मुश्किल में तुम्हारे साथ खड़े रहे…”


संदीप ने नजरें झुका लीं। उसके होंठ हिले, पर आवाज़ में अपनापन नहीं था—

“यहाँ आपकी अच्छी देखभाल होगी… आपको कोई तकलीफ़ नहीं होगी…”


इतना कहकर उसने दरवाज़ा खटखटाया।

अंदर से किसी ने दरवाज़ा खोला… और संदीप बिना पीछे देखे वापस मुड़ गया।


दरवाज़ा धीरे-धीरे बंद हुआ…

और उसी के साथ एक रिश्ता भी हमेशा के लिए बंद हो गया।



वक्त बीतता गया…


लाजो देवी की तबीयत बिगड़ती गई।

हर दिन वो बस एक ही बात कहतीं—


“मुझे अपने घर ले चलो…”


लेकिन अब उनका “घर” कहीं नहीं था।


एक दिन उन्होंने आखिरी साँस ली…

बिना बेटे को देखे।


रामदीन काका टूट चुके थे।


कुछ साल बाद…

वो भी इस दुनिया से चले गए।


समय बीतता रहा…


संदीप अब खुद बूढ़ा हो चुका था।


जिस बेटे के लिए उसने सब कुछ किया…

वो भी अब बड़ा हो गया था।


एक दिन उसका बेटा बोला—


“पापा, हमने आपके लिए बहुत अच्छा वृद्धाश्रम देखा है…”


संदीप के हाथ काँपने लगे…


“नहीं बेटा… मैं तुम्हारे साथ रह लूंगा…”


लेकिन इतिहास खुद को दोहराने लगा था।



वही दरवाज़ा…

वही जगह…

वही दर्द…


संदीप उसी वृद्धाश्रम के बाहर खड़ा था…

जहाँ उसने अपने माता-पिता को छोड़ा था।


उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे—


“काश… उस दिन मैं अपने माँ-बाप को नहीं छोड़ता…”


अंदर जाते हुए उसने आखिरी बार पीछे मुड़कर देखा…

लेकिन इस बार कोई उसे रोकने वाला नहीं था।



सीख:

समय कभी भी किसी के साथ पक्षपात नहीं करता।

जो हम दूसरों के साथ करते हैं…

एक दिन वही हमारे सामने लौटकर आता है।




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