खाली आँगन का फैसला
दरवाज़े के पास रखी छोटी सी झूले वाली कुर्सी कई महीनों से वैसे ही पड़ी थी। हर आने-जाने वाला उसे देखकर एक ही बात कहता—
“अरे, अब तो इसमें नन्हा मेहमान बैठना चाहिए…”
सिया बस हल्की मुस्कान दे देती।
शादी को अभी एक साल ही हुआ था, लेकिन सवालों की गिनती सालों से भी लंबी लगने लगी थी।
रिश्तेदार, पड़ोसी, यहाँ तक कि दूर के जानने वाले भी—सबको जैसे एक ही चिंता थी।
“कोई खुशखबरी कब दे रही हो?”
सिया हर बार बात टाल देती, लेकिन ये सवाल धीरे-धीरे उसके दिल में चुभने लगे थे।
उसकी सास, कमला देवी, बाहर से तो हमेशा सिया का साथ देतीं—
“अरे अभी क्या जल्दी है…”
लेकिन अंदर ही अंदर वो भी दादी बनने का सपना देखने लगी थीं।
रोहन, सिया का पति, हर बार उसे संभालता—
“लोगों का काम है बोलना, तुम दिल पर मत लो।”
सिया सिर हिला देती, लेकिन दिल को समझाना इतना आसान नहीं था।
एक दिन सिया को अचानक तेज चक्कर आया। वह किचन में काम करते-करते संभल नहीं पाई और धीरे से नीचे बैठ गई। उसके चेहरे पर घबराहट साफ दिखाई दे रही थी।
घरवालों ने बिना देर किए डॉक्टर को बुला लिया।
डॉक्टर ने सिया की हालत देखकर कहा,
“अभी कुछ जरूरी टेस्ट कराने होंगे, तभी सही कारण पता चल पाएगा।”
डॉक्टर के जाते ही घर का माहौल बदल गया।
हल्की-सी चिंता के बीच एक अनकही उम्मीद भी फैलने लगी।
कमला देवी के चेहरे पर अलग ही चमक थी—उन्हें लगा शायद वो पल आ गया है जिसका उन्हें बेसब्री से इंतज़ार था।
सिया भी चुप थी, लेकिन उसके मन में कई छोटी-छोटी उम्मीदें धीरे-धीरे जन्म लेने लगी थीं।
कुछ दिन बाद रिपोर्ट आई।
डॉक्टर ने रोहन और उसके परिवार को अलग कमरे में बुलाया।
“सिया गर्भवती नहीं है… बल्कि उसके गर्भाशय में एक बड़ा ट्यूमर है।
और हालत ऐसी है कि ऑपरेशन करके गर्भाशय निकालना ही पड़ेगा… तभी उसकी जान बचेगी।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कमला देवी की आँखों से आँसू निकल पड़े।
रोहन जैसे पत्थर बन गया।
“क्या… फिर वो कभी माँ नहीं बन पाएगी?” उसने काँपती आवाज़ में पूछा।
डॉक्टर ने धीरे से सिर झुका दिया।
ऑपरेशन सफल रहा।
सिया की जान तो बच गई, लेकिन उसके जीवन का एक अहम हिस्सा हमेशा के लिए उससे छिन गया।
जब उसे सच्चाई बताई गई, तो वह कुछ पल बिल्कुल निःशब्द रह गई—जैसे शब्दों ने उसका साथ छोड़ दिया हो।
उसकी आँखें खाली थीं, और मन के भीतर सिर्फ एक ही आवाज़ बार-बार गूंज रही थी—
“अब मैं कभी माँ नहीं बन पाऊँगी…”
दिन बीतने लगे।
घर फिर से सामान्य होने लगा…
लेकिन सिया की दुनिया अब वैसी नहीं रही थी।
उसकी हँसी जैसे कहीं खो गई थी।
बातें भी अब बस ज़रूरत भर की रह गई थीं।
वह अक्सर चुपचाप एक कोने में बैठ जाती,
या बिना कुछ कहे अपने काम में लगी रहती—
जैसे बाहर सब ठीक हो, पर अंदर सब बिखरा हुआ हो।
धीरे-धीरे लोगों की बातें भी बदलने लगीं—
“बेचारी… इसकी किस्मत ही ऐसी है…”
“अब इस घर में कभी किलकारी नहीं गूँजेगी…”
“क्या फायदा ऐसी ज़िंदगी का…”
ये शब्द सिर्फ ताने नहीं थे…
हर बार सिया के दिल पर एक नया ज़ख्म छोड़ जाते थे।
वह मुस्कुराने की कोशिश तो करती,
लेकिन अंदर ही अंदर हर रोज़ थोड़ा और टूट जाती थी।
एक रात सिया चुपचाप बैठी थी।
रोहन उसके पास आया और बोला,
“क्या तुम सच में मानती हो कि माँ बनने का सिर्फ एक ही तरीका होता है?”
सिया ने उसकी तरफ देखा,
“तो और क्या तरीका है…?”
रोहन मुस्कुराया,
“माँ बनने के लिए दिल चाहिए… शरीर नहीं।”
सिया कुछ समझ नहीं पाई, लेकिन उसके शब्द दिल में कहीं बैठ गए।
अगले दिन…
सिया और रोहन बिना किसी को बताए घर से निकल गए।
पूरा दिन बीत गया।
घर में सब परेशान—कहाँ गए, क्यों गए, कुछ पता नहीं।
शाम को दरवाज़ा खुला।
सिया और रोहन अंदर आए…
और उनके साथ एक छोटी सी बच्ची थी।
करीब चार साल की… मासूम आँखें, हाथ में पुरानी सी गुड़िया।
सब हैरान।
“ये… कौन है?” कमला देवी ने पूछा।
सिया आगे बढ़ी, बच्ची का हाथ पकड़ा और बोली—
“ये हमारी बेटी है… ‘आशा’।”
घर में सन्नाटा छा गया।
रोहन ने धीरे से कहा,
“हम इसे अनाथालय से लाए हैं।”
सिया की आँखों में पहली बार चमक थी—
“मुझे भगवान ने माँ बनने का मौका अलग तरीके से दिया है…
शायद इसलिए कि मैं समझ सकूँ कि माँ होना सिर्फ जन्म देने से नहीं होता…”
वह बच्ची को गले लगाते हुए बोली—
“एक औरत बाँझ हो सकती है…
लेकिन उसके अंदर की ममता कभी बाँझ नहीं होती।”
कमला देवी धीरे-धीरे आगे बढ़ीं।
उन्होंने ‘आशा’ को गोद में लिया…
और उनकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“हमसे गलती हो गई… हमें माफ कर दो।”
उस दिन के बाद…
वही घर, जो कभी सवालों से भरा था, अब हँसी से भर गया।
झूले वाली कुर्सी अब खाली नहीं थी…
उसमें ‘आशा’ बैठी खिलखिला रही थी।
और सिया…
अब वो सिर्फ सिया नहीं थी—
वो एक माँ थी। ❤️

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