सोच का आईना
सुबह का समय था, लेकिन घर में शांति नहीं, बल्कि हल्की-हल्की भागदौड़ थी।
अनु किचन में खड़ी थी। एक हाथ से पराठे सेंक रही थी, दूसरे हाथ से टिफिन पैक कर रही थी। गैस पर चाय उबल रही थी और दिमाग में ऑफिस की प्रेजेंटेशन घूम रही थी।
उधर हॉल में सविता देवी अपने फोन पर किसी से बातें कर रही थीं।
“अरे दीदी, क्या बताऊँ… मेरी बड़ी बहन की बहू कितनी किस्मत वाली है! उसका पति ऑफिस से आकर खुद खाना बनाता है… बच्चे संभालता है… आजकल ऐसे लड़के कहाँ मिलते हैं!”
अनु ने ये बात सुनी, लेकिन कुछ कहा नहीं। बस हल्की-सी मुस्कान आई और फिर वह अपने काम में लग गई।
तभी उसका पति आदित्य अंदर आया।
“अनु, तुम अभी तक तैयार नहीं हुई?” उसने पूछा।
“बस हो रही हूँ… आज क्लाइंट मीटिंग है, थोड़ी टेंशन है…” अनु ने जल्दी-जल्दी कहा।
आदित्य ने बिना कुछ बोले गैस से तवा हटाया और कहा,
“तुम जाओ तैयार हो जाओ, मैं बाकी काम कर देता हूँ।”
अनु ने चौंककर देखा,
“नहीं, मैं कर लूँगी…”
“अरे, मैं हूँ ना,” आदित्य मुस्कुराया।
अनु मन ही मन खुश हो गई और कमरे में चली गई।
कुछ देर बाद…
आदित्य बच्चों का टिफिन पैक कर रहा था, तभी सविता देवी किचन में आईं।
जैसे ही उन्होंने आदित्य को काम करते देखा, उनका चेहरा बदल गया।
“आदित्य!” उनकी आवाज़ तेज हो गई,
“ये क्या कर रहा है तू?”
आदित्य शांत रहा,
“माँ, बस बच्चों का टिफिन बना रहा हूँ…”
“और बहू कहाँ है?”
“वो तैयार हो रही है… उसकी मीटिंग है।”
सविता देवी ने तुनककर कहा,
“तो क्या हुआ? घर का काम छोड़ दे क्या? और तू… तू ये सब करेगा?”
आदित्य ने धीरे से कहा,
“माँ, इसमें गलत क्या है?”
“गलत क्या है?” उन्होंने गुस्से में कहा,
“मर्द ये सब करते अच्छे लगते हैं क्या? लोग हँसेंगे हम पर!”
आदित्य कुछ नहीं बोला। बस चुपचाप टिफिन बंद करता रहा।
नाश्ते की टेबल पर माहौल थोड़ा भारी था।
अनु समझ रही थी कि कुछ हुआ है, लेकिन वह चुप थी।
तभी सविता देवी बोलीं,
“आजकल की बहुएँ तो बस आराम करना जानती हैं… सारा काम बेटे से करवाओ।”
अनु का हाथ रुक गया।
आदित्य ने तुरंत कहा,
“माँ, ऐसा नहीं है…”
लेकिन उन्होंने उसकी बात काट दी,
“तू चुप रह! तुझे समझ नहीं है अभी।”
दिन बीत गया।
शाम को आदित्य ऑफिस से लौटा, तो घर में अजीब सन्नाटा था।
अनु सोफे पर बैठी थी, चेहरा उतरा हुआ।
“क्या हुआ?” आदित्य ने पूछा।
अनु ने धीरे से कहा,
“कुछ नहीं… बस थोड़ा थक गई हूँ।”
लेकिन उसकी आवाज़ में छुपा दर्द साफ था।
उसी समय दरवाज़े की घंटी बजी।
सविता देवी की पुरानी सहेली मीना जी आई थीं।
बैठते ही बातें शुरू हो गईं।
मीना जी ने हँसते हुए कहा,
“अरे, आजकल तो मेरी बहू बड़ी आराम में है… मेरा बेटा ऑफिस से आकर खुद किचन में हाथ बंटाता है!”
सविता देवी तुरंत बोलीं,
“वाह! बहुत अच्छा है… ऐसे लड़के ही तो घर संभालते हैं… सच में, संस्कार दिखते हैं उसमें।”
आदित्य और अनु दोनों ये सुन रहे थे।
आदित्य ने धीरे से माँ की तरफ देखा… लेकिन कुछ कहा नहीं।
रात का खाना खत्म हुआ।
मीना जी चली गईं।
घर में फिर वही सन्नाटा छा गया।
आदित्य धीरे से माँ के पास गया और बोला,
“माँ, एक बात पूछूँ?”
“क्या?” उन्होंने सामान्य स्वर में कहा।
“अभी आप मीना आंटी के बेटे की तारीफ कर रही थीं…”
“हाँ, तो?”
“वो क्या करता है?”
“अपनी पत्नी की मदद करता है… और क्या!”
आदित्य ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा,
“और मैं?”
सविता देवी चुप हो गईं।
आदित्य की आवाज़ अब पहले से ज्यादा गंभीर थी—
“जब कोई और बेटा अपनी पत्नी की मदद करता है तो वो ‘संस्कारी’ है…
और जब मैं करता हूँ तो ‘गलत’?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
आदित्य कुछ पल चुप रहा, जैसे शब्दों को सही ढंग से चुन रहा हो। फिर उसने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा—
“माँ… आपने ही तो हमेशा मुझे सिखाया है कि इंसान की असली पहचान उसके व्यवहार से होती है।
वो दूसरों के साथ कैसा बर्ताव करता है, यही उसके संस्कार बताते हैं…
फिर जब वही बात मैं अपने जीवन में निभा रहा हूँ…
तो वो गलत कैसे हो गई, माँ?”
सविता देवी उसके चेहरे को देखती रह गईं।
उनकी आँखों में हल्का सा संकोच और उलझन साफ झलक रही थी… जैसे पहली बार उन्होंने इस सवाल को सच में महसूस किया हो।
तभी अनु धीरे से बोली—
“माँजी, मैं घर का काम करने से कभी पीछे नहीं हटती…
लेकिन कभी-कभी सच में संभालना मुश्किल हो जाता है…”
उसकी आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ बहुत शांत थी।
“और जब आदित्य मदद करता है… तो मुझे लगता है कि मैं अकेली नहीं हूँ…”
यह सुनकर सविता देवी के भीतर जैसे कुछ टूट सा गया।
उन्हें अपने ही कहे शब्द एक-एक करके याद आने लगे—
वही बातें, जिन्हें कहते समय उन्हें गर्व होता था…
आज वही शब्द उनके सामने सवाल बनकर खड़े थे।
“संस्कारी लड़के वही होते हैं जो घर भी संभालते हैं…”
“ऐसे दामाद तो बड़ी किस्मत से मिलते हैं…”
अब उन्हें महसूस हो रहा था—
दूसरों के लिए जो बात उन्हें सही लगती थी,
उसी बात को अपने घर में मानने से वह खुद ही पीछे हट रही थीं।
उनकी नज़रें झुक गईं…
और मन पहली बार अपनी ही सोच के सामने खामोश हो गया।
कुछ देर तक कोई कुछ नहीं बोला।
फिर सविता देवी धीरे-धीरे उठीं…
किचन में गईं…
और चुपचाप बर्तन धोने लगीं।
आदित्य और अनु दोनों हैरान थे।
अनु तुरंत भागकर आई—
“माँजी, आप रहने दीजिए… मैं कर लूँगी…”
सविता देवी ने पहली बार उसे बहुत प्यार से देखा—
“नहीं बहू… आज मैं करूँगी।”
उन्होंने आदित्य की तरफ देखा और हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“आज पहली बार मुझे अपनी सोच का आईना दिखा है…”
“मैं दूसरों के घर में वही चीज़ देखती थी, जो अपने घर में देखने से मना करती थी…”
उन्होंने अनु का हाथ पकड़ लिया—
“तू इस घर की बहू ही नहीं… बेटी भी है…
और बेटी को कभी अकेला नहीं छोड़ा जाता…”
आदित्य की आँखें नम हो गईं।
अनु ने झुककर उनके पैर छुए।
उस रात घर में सिर्फ बर्तन साफ नहीं हुए थे…
बल्कि सोच भी साफ हो गई थी।
और सविता देवी को समझ आ गया था कि—
👉 संस्कार वो नहीं जो सिर्फ दूसरों में अच्छे लगें…
बल्कि वो हैं जो अपने घर में भी अपनाए जाएँ।

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