एक फोन कॉल की कीमत

 

Young man sitting in a train looking out the window while thinking about his emotional goodbye with his mother at the station


रेल की हल्की-हल्की आवाज़ के साथ डिब्बे में बैठे लोग अपने-अपने ख्यालों में खोए हुए थे। खिड़की के पास बैठा आर्यन बार-बार अपने फोन की स्क्रीन देख रहा था। उसके सामने वाली सीट पर एक बुजुर्ग आदमी शांत भाव से उसे देख रहे थे।


कुछ ही देर पहले स्टेशन पर जो हुआ था, वो अब भी उनकी आँखों के सामने ताज़ा था।


आर्यन की माँ उसे छोड़ने आई थी। चेहरे पर मुस्कान थी, लेकिन आँखों में छिपी चिंता साफ दिख रही थी। बार-बार पूछ रही थी—

“सब रख लिया ना बेटा? दवाई, पैसे, टिकट?”


आर्यन हर बार हल्के से हँसकर कह देता—

“हाँ माँ, सब है… आप टेंशन मत लो।”


ट्रेन चलने लगी तो माँ ने उसका हाथ कसकर पकड़ा, जैसे कुछ पल और रोक लेना चाहती हो। फिर धीरे से छोड़ दिया। आर्यन ने खिड़की से हाथ हिलाया, और माँ वहीं खड़ी उसे जाते हुए देखती रही।


लेकिन जैसे ही ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, माँ की आँखों से आँसू बहने लगे।


डिब्बे में बैठे बुजुर्ग आदमी ने वो सब देखा था।


थोड़ी देर बाद आर्यन ने फोन निकाला और किसी को कॉल किया—

“हेलो जान… हाँ, बैठ गया हूँ ट्रेन में… बस अब जल्दी ही मिलेंगे… बहुत मिस किया यार…”


उसकी आवाज़ में उत्साह था, खुशी थी।


बुजुर्ग आदमी ने धीरे से पूछा—

“बेटा, दिल्ली पढ़ने जा रहे हो?”


आर्यन ने सिर हिलाया—

“जी अंकल, कॉलेज है वहाँ।”


“अच्छा है… पढ़ाई ज़रूरी है।”

फिर थोड़ी देर रुककर बोले—

“अभी जो तुम्हारी माँ थी… बहुत प्यार करती है तुमसे।”


आर्यन ने हल्की सी मुस्कान दी—

“हाँ अंकल, माँ तो ऐसी ही होती हैं… थोड़ा ज्यादा इमोशनल।”


बुजुर्ग आदमी चुप हो गए।


कुछ देर बाद उन्होंने अपनी जेब से एक पुरानी तस्वीर निकाली। उसमें एक लड़का और एक औरत साथ खड़े मुस्कुरा रहे थे।


उन्होंने तस्वीर आर्यन की तरफ बढ़ाई—

“ये मेरा बेटा है… और ये उसकी माँ।”


आर्यन ने तस्वीर देखी—

“बहुत प्यारी फोटो है अंकल।”


बुजुर्ग आदमी की आवाज़ भर्रा गई—

“था… अब इस दुनिया में नहीं है।”


आर्यन चौंका—

“क्या मतलब?”


उन्होंने गहरी साँस ली—

“मेरा बेटा भी तुम्हारी तरह पढ़ने के लिए बाहर गया था… शुरू में हर दिन फोन करता था… फिर धीरे-धीरे हफ्ते में एक बार… फिर महीने में…”


आर्यन ध्यान से सुनने लगा।


“उसकी जिंदगी में नए लोग आ गए… नई दुनिया बस गई। हम पीछे छूट गए। उसकी माँ हर दिन उसका इंतज़ार करती थी… हर फोन की घंटी पर दौड़कर जाती थी।”


उनकी आँखें भर आईं।


“एक दिन उसकी माँ बहुत बीमार पड़ गई… उसने बार-बार बेटे को फोन किया… लेकिन वो बिज़ी था… नहीं उठा पाया।”


आर्यन के चेहरे की मुस्कान धीरे-धीरे गायब हो रही थी।


“जब तक वो आया… बहुत देर हो चुकी थी।”


डिब्बे में सन्नाटा छा गया।


“उस दिन पहली बार मैंने अपने बेटे को रोते देखा… लेकिन तब तक सब खत्म हो चुका था।”


आर्यन के हाथ में पकड़ा फोन धीरे-धीरे नीचे आ गया।


बुजुर्ग आदमी ने उसकी तरफ देखते हुए कहा—

“बेटा, जिंदगी में आगे बढ़ो… सपने पूरे करो… लेकिन पीछे मुड़कर देखना मत भूलना… वहाँ कोई होता है जो हर दिन सिर्फ तुम्हारे लिए जीता है।”


आर्यन की आँखें भर आईं।


उसने तुरंत फोन उठाया और माँ का नंबर डायल किया।


“हेलो माँ…”


उधर से आवाज़ आई—

“हाँ बेटा, पहुँच गए क्या?”


आर्यन की आवाज़ कांप रही थी—

“माँ… सॉरी… मैं… मैं आपको समझ नहीं पाया।”


माँ थोड़ी घबरा गई—

“क्या हुआ बेटा?”


“कुछ नहीं माँ… बस… आप अपना ख्याल रखना… और हाँ… मैं रोज फोन करूँगा… पक्का।”


माँ की आवाज़ में हल्की मुस्कान लौट आई—

“बस तू खुश रह बेटा… वही काफी है।”


फोन कट गया।


आर्यन ने खिड़की से बाहर देखा… लेकिन इस बार उसकी नजरें कहीं दूर नहीं थीं…

वो अपने घर तक पहुँच चुकी थीं।


उसने मन ही मन सोचा—

“जिस प्यार को हम अक्सर हल्के में ले लेते हैं… वही असल में हमारी सबसे बड़ी ताकत होता है।”



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