रिश्तों की लौ
रीना रसोई में खड़ी चाय बना रही थी, लेकिन उसका ध्यान बार-बार दरवाज़े की तरफ जा रहा था। आज उसके बेटे रोहन को स्कूल से देर हो रही थी।
तभी दरवाज़ा जोर से खुला।
“मम्मी!”
रोहन हांफता हुआ अंदर आया।
“क्या हुआ बेटा? इतनी घबराहट क्यों?” रीना ने घबराकर पूछा।
रोहन ने पानी का गिलास उठाया और एक सांस में पी गया।
“मम्मी… पापा के बड़े भाई… बड़े पापा… उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया है।”
रीना के हाथ से चम्मच गिर गया।
“क्या…? कब? कैसे?”
“स्कूल से लौटते समय पापा के दोस्त मिले थे। वही बता रहे थे कि बड़े पापा को सीने में दर्द हुआ था… और हालत ठीक नहीं है।”
रीना कुछ पल के लिए चुप हो गई।
दिल की धड़कन तेज हो गई।
उसने तुरंत अपने पति अमित को फोन लगाया।
“अमित… अभी रोहन ने बताया… भैया को अस्पताल में भर्ती किया गया है… तुमने मुझे बताया क्यों नहीं?”
फोन के उस पार कुछ सेकंड खामोशी रही।
फिर अमित की धीमी आवाज़ आई—
“रीना… मुझे भी अभी थोड़ी देर पहले ही पता चला… मैं ऑफिस से सीधा अस्पताल जा रहा हूँ…”
रीना का मन अशांत हो गया।
वो कुर्सी पर बैठ गई।
असल में, अमित और उसके बड़े भाई राजेश के बीच पिछले तीन सालों से बात बंद थी।
एक छोटी-सी बात…
पैसों का हिसाब…
और फिर धीरे-धीरे बढ़ती गलतफहमियाँ…
एक ही शहर में रहते हुए भी दोनों भाई अजनबी बन गए थे।
रीना ने फैसला किया—
“मैं भी अस्पताल आ रही हूँ।”
अस्पताल का माहौल हमेशा की तरह भारी था।
सफेद दीवारें, दवाइयों की गंध और इधर-उधर भागते लोग।
रीना जैसे ही अंदर पहुंची, उसने देखा—
अमित बाहर बेंच पर बैठा था।
उसका सिर झुका हुआ था और आंखें नम थीं।
“कैसी है हालत?” रीना ने धीरे से पूछा।
अमित ने ऊपर देखा—
“डॉक्टर कह रहे हैं कि हार्ट का मामला है… अभी टेस्ट चल रहे हैं…”
उसकी आवाज़ टूट रही थी।
इतने में ICU का दरवाज़ा खुला और एक डॉक्टर बाहर आए।
“आप लोग राजेश जी के रिश्तेदार हैं?”
अमित तुरंत खड़ा हो गया—
“जी… मैं उनका छोटा भाई हूँ।”
डॉक्टर ने फाइल देखते हुए कहा—
“घबराने की जरूरत नहीं है। हल्का हार्ट अटैक था… लेकिन समय पर अस्पताल आ जाने से खतरा टल गया है।”
दोनों ने राहत की सांस ली।
अमित की आंखों से आंसू निकल पड़े।
“मैं… मैं उनसे मिलने जा सकता हूँ?”
“हाँ, लेकिन ज्यादा देर नहीं।”
अमित धीरे-धीरे ICU में दाखिल हुआ।
राजेश बेड पर लेटे थे।
चेहरा थोड़ा कमजोर था, लेकिन आंखें खुली हुई थीं।
अमित को देखते ही उनकी आंखों में हल्की चमक आ गई।
कुछ पल…
दोनों बस एक-दूसरे को देखते रहे।
तीन साल की दूरी…
तीन साल की खामोशी…
आज एक पल में टूटने लगी।
अमित धीरे से आगे बढ़ा—
“भैया…”
बस इतना कहते ही उसकी आवाज भर्रा गई।
राजेश ने हल्की मुस्कान के साथ हाथ बढ़ाया—
“आ गया तू… छोटे?”
अमित ने उनका हाथ पकड़ लिया…
और खुद को रोक नहीं पाया।
“भैया… मुझसे गलती हो गई… मैंने छोटी-सी बात को इतना बड़ा बना दिया…”
राजेश की आंखों में भी आंसू आ गए—
“गलती मेरी भी थी छोटे… मैं भी जिद पर अड़ा रहा…”
दोनों भाई एक-दूसरे का हाथ थामे रोते रहे।
वो रोना…
सिर्फ दर्द का नहीं था…
बल्कि बरसों से जमी दूरी के पिघलने का था।
कुछ दिनों बाद राजेश घर वापस आ गए।
घर में फिर से रौनक लौट आई थी।
आज दोनों परिवार एक साथ बैठे थे।
हंसी-मजाक, चाय-नाश्ता… सब कुछ पहले जैसा लग रहा था।
रोहन और उसके चचेरे भाई साथ खेल रहे थे।
रीना और भाभी रसोई में हंसते हुए बातें कर रही थीं।
अमित ने राजेश की तरफ देखा और मुस्कुराया—
“भैया… अच्छा हुआ आप ठीक हो गए…”
राजेश ने हल्के मजाक में कहा—
“और अच्छा हुआ ये हार्ट अटैक आया… नहीं तो तू मुझसे मिलने भी नहीं आता!”
दोनों हंस पड़े।
लेकिन उस हंसी के पीछे एक गहरी सच्चाई छिपी थी।
सीख:
कभी-कभी जिंदगी हमें ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है, जहां हमें समझ आता है कि रिश्ते अहंकार से बड़े होते हैं।
छोटी-छोटी बातों को दिल पर लगाकर अपनों से दूर हो जाना आसान है…
लेकिन उन्हें वापस पाना बहुत मुश्किल।
इसलिए—
रिश्तों को समय दीजिए, उन्हें संभालिए…
क्योंकि जब अपने साथ होते हैं, तभी जिंदगी सच में पूरी लगती है। ❤️

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