पापा का अनकहा सच

 

Emotional Indian family moment with father and daughters sharing love and warmth at home


घर के आँगन में हलचल थी, पर मेरे दिल में अजीब सी घबराहट चल रही थी।


आज मेरी छोटी बहन आर्या की शादी के बाद पहली बार उसका मायके आना था। पूरे घर में तैयारियां चल रही थीं—रंगोली बन रही थी, मिठाइयाँ सज रही थीं, और पापा बार-बार घड़ी देख रहे थे।


“रिया, ज़रा ये मिठाई ठीक से सजा दो… और देखो, आर्या को कोई कमी महसूस नहीं होनी चाहिए,” पापा ने जल्दी-जल्दी कहा।


मैं मुस्कुरा दी, “पापा, आप इतना टेंशन क्यों लेते हो? सब ठीक ही होगा।”


लेकिन मैं जानती थी… पापा का ये टेंशन सिर्फ मेहमानों के लिए नहीं था, बल्कि उस खालीपन के लिए था जो पिछले कई सालों से हमारे घर में था।


आर्या की शादी को अभी तीन महीने ही हुए थे। उसके जाने के बाद घर और भी सूना लगने लगा था।


तभी दरवाज़े पर गाड़ी रुकी।


“आ गई आर्या!” मैंने खुश होकर कहा।


आर्या और उसके पति अंश अंदर आए। पापा ने आर्या को देखते ही उसे गले लगा लिया।


“कैसी है मेरी बेटी?” उनकी आवाज़ भर्रा गई थी।


“मैं ठीक हूं पापा,” आर्या ने हंसते हुए कहा, लेकिन उसकी आंखें भी नम थीं।


अंदर बैठते ही अंश बोला, “पापा, आज तो आपके हाथ का खाना खाना है। आर्या हमेशा आपके खाने की इतनी तारीफ करती है कि अब इंतज़ार नहीं हो रहा।”


पापा हल्का सा हंस पड़े, “अरे बेटा, अब कहां… अब तो हाथ भी साथ नहीं देते पहले जैसे।”


मैंने तुरंत कहा, “झूठ बोल रहे हैं पापा। अभी भी सबसे अच्छा खाना यही बनाते हैं।”


आर्या भी मुस्कुरा दी, “सच में, पापा के हाथ का स्वाद कोई नहीं ला सकता।”


पापा कुछ नहीं बोले… बस चुपचाप किचन की तरफ चले गए।


मैंने गौर किया—उनकी चाल पहले से धीमी हो गई थी।



खाना तैयार हुआ।


टेबल पर ढेर सारे पकवान थे—दाल, पनीर, पुलाव, पूरी, खीर…


अंश एक-एक चीज़ चखते हुए बोला, “वाह पापा! कमाल है… इतना स्वाद!”


आर्या गर्व से मुझे देखने लगी।


लेकिन मैंने देखा… पापा बस चुपचाप सबको खाते हुए देख रहे थे।


जैसे उन्हें खुद अपनी तारीफ सुनने की आदत ही नहीं रही हो।


खाना खत्म हुआ, तो अंश ने कहा, “पापा, सच में… आपने तो दिल जीत लिया।”


पापा हल्के से मुस्कुराए, “खुश रहो बस…”



रात को मैं पानी लेने किचन में गई।


तभी मैंने देखा—पापा अकेले बैठे थे… चुपचाप।


“पापा?” मैंने धीरे से कहा।


वे थोड़ा चौंक गए, “अरे… तू अभी तक सोई नहीं?”


मैं उनके पास बैठ गई।


“पापा, आप खुश नहीं हो?”


उन्होंने मेरी तरफ देखा… फिर नजरें फेर लीं।


“खुश हूं बेटा… मेरी बेटियां खुश हैं, इससे बड़ी खुशी क्या होगी?”


मैंने उनका हाथ पकड़ा, “पापा, सच बताइए।”


कुछ देर चुप रहने के बाद उन्होंने धीरे से कहा—


“जब तुम दोनों घर पर थीं न… तो मुझे कभी अकेलापन महसूस नहीं हुआ। अब घर बहुत खाली लगता है।”


उनकी आवाज़ में दर्द साफ था।


मेरी आंखें भर आईं।


“पापा… आपने कभी बताया क्यों नहीं?”


वे हल्का सा मुस्कुराए, “पापा लोग बताते नहीं हैं… बस सह लेते हैं।”



अगले दिन सुबह  मैंने एक फैसला किया।


मैंने आर्या और अंश को अलग ले जाकर कहा, “हमें पापा के लिए कुछ करना होगा।”


आर्या तुरंत समझ गई, “मैं भी यही सोच रही थी।”


अंश बोला, “तो फिर क्या प्लान है?”


मैंने कहा, “हम पापा को अकेला नहीं छोड़ सकते… या तो हम उन्हें अपने साथ रखें, या हम बारी-बारी से उनके पास रहें।”


आर्या ने कहा, “या फिर… हम यहीं शिफ्ट हो जाएं कुछ समय के लिए।”


हम तीनों ने मिलकर फैसला कर लिया।



जब हमने पापा को ये बात बताई, तो वे पहले नाराज़ हो गए।


“मैं कोई बोझ हूं क्या तुम लोगों पर?” उन्होंने सख्त आवाज़ में कहा।


मैंने तुरंत कहा, “आप बोझ नहीं हो पापा… आप हमारा सहारा हो।”


आर्या भी बोली, “अब हमारी बारी है आपका साथ देने की।”


पापा की आंखें भर आईं।


उन्होंने पहली बार खुलकर हमें गले लगा लिया।



कुछ महीनों बाद…


घर फिर से हंसी-खुशी से भर गया था।


कभी मैं आ जाती, कभी आर्या।


अंश भी पापा के साथ बैठकर बातें करता, खाना बनाना सीखता।


एक दिन अंश ने हंसते हुए कहा, “पापा, अब तो मैं भी थोड़ा-बहुत शेफ बन गया हूं।”


पापा मुस्कुरा दिए, “अभी बहुत सीखना बाकी है बेटा…”


मैंने मज़ाक में कहा, “पापा, आप तो मास्टर शेफ हो।”


पापा ने मेरी तरफ देखा और बोले—


“नहीं बेटा… मैं बस एक पापा हूं।”



उस दिन मुझे समझ आया…


पापा कभी अपने लिए नहीं जीते।


वे चुपचाप… बिना किसी श्रेय के…


हमारी खुशियों में ही अपनी खुशी ढूंढ लेते हैं।


और सच में…


पापा किसी जादूगर से कम नहीं होते।



No comments

Note: Only a member of this blog may post a comment.

Powered by Blogger.