जिसे बोझ समझा, वही अपना निकला

 

Happy Indian family enjoying time together at home with love and bonding


सुबह की हल्की ठंडी हवा खिड़की से अंदर आ रही थी, लेकिन पूजा का मन बिल्कुल भी शांत नहीं था।


रसोई में गैस पर चाय चढ़ी थी, पर उसका ध्यान बार-बार घड़ी पर जा रहा था।


“हे भगवान… आज फिर दीदी आने वाली हैं…” उसने धीमे से खुद से कहा और कप जोर से सिंक में रख दिया।


इतने में बाहर से उसके पति अजय की आवाज आई—


“पूजा, सुनो… नेहा दीदी का फोन आया था। वो और बच्चे आज शाम तक पहुँच जाएंगे। इस बार थोड़ा ज्यादा दिन रुकेंगी… करीब 10-12 दिन।”


बस ये सुनना था कि पूजा का मूड पूरी तरह खराब हो गया।


वो तेजी से बाहर आई और बोली—


“क्या बात है! जब मन किया, उठो और आ जाओ… मेरा घर है या गेस्ट हाउस?”


अजय थोड़ा चौंक गया।


“अरे पूजा, वो मेरी बहन है… साल में एक बार ही तो आती है…”


“तो क्या मैं नौकरानी हूँ?” पूजा ने बीच में ही काट दिया।

“दिन भर उनके पीछे घूमो, बच्चों को संभालो, खाना बनाओ… और ऊपर से मुस्कुराते रहो!”


अजय ने समझाने की कोशिश की—


“वो तुम्हें बहुत मानती है पूजा… हर बार तुम्हारे लिए कुछ ना कुछ लेकर आती है…”


लेकिन पूजा अब सुनने के मूड में नहीं थी।


“बस! इस बार मैं कहीं नहीं रुकने वाली। मैं कल ही अपने मायके जा रही हूँ। वहां कम से कम मुझे आराम तो मिलेगा!”


उसने उसी वक्त अलमारी से कपड़े निकालने शुरू कर दिए।



दूसरी तरफ…


उधर, नेहा अपने घर में बड़े ही प्यार और उत्साह के साथ पैकिंग कर रही थी। उसके चेहरे पर एक सुकून भरी मुस्कान थी, जैसे इस बार का मिलना उसके लिए खास हो।


वह कपड़े तह करते हुए अपने बेटे से बोली—

“इस बार मैं भाभी को बिल्कुल काम नहीं करने दूंगी… उन्हें बस आराम करवाऊंगी।”


उसने अलमारी से बड़े ध्यान से एक खूबसूरत सूट निकाला, जिसे उसने खास तौर पर पूजा के लिए खरीदा था। कपड़े को हाथों में पकड़कर वह कुछ पल उसे देखती रही, जैसे मन ही मन सोच रही हो कि भाभी पर ये कितना अच्छा लगेगा।


बेटे ने उत्सुकता से पूछा—

“मम्मी, भाभी खुश होंगी ना?”


नेहा ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए मुस्कुराकर कहा—

“बहुत खुश होंगी… आखिर वो हमारी अपनी हैं।”




अगले दिन...


पूजा अपने बच्चों को लेकर मायके पहुँच गई।


उसके मन में बस एक ही ख्याल था—


“अब आराम ही आराम…”


जैसे ही उसने दरवाज़ा खटखटाया, उसकी मां ने दरवाज़ा खोला।


“अरे पूजा! आ गई?” मां ने हल्की मुस्कान के साथ कहा।


पूजा अंदर आई और तुरंत बोली—


“मां, बहुत थक गई हूँ… जरा भाभी से कहो चाय बना दे…”


मां का चेहरा थोड़ा उतर गया।


“बेटा… तेरी भाभी तो सुबह ही अपने मायके चली गई…”


पूजा जैसे पत्थर की हो गई।


“क्या? ऐसे कैसे चली गई?”


“उसे भी तो आराम चाहिए था ना…” मां ने धीरे से कहा।



सच का आईना...


शाम को उसका भाई रोहित घर लौटा।


जैसे ही पूजा ने उसे देखा, उसके अंदर भरा गुस्सा बाहर आ गया।


वह शिकायत भरे लहजे में बोली—


“भैया, भाभी को तो रुकना चाहिए था ना! उन्हें पता था कि मैं बच्चों के साथ आने वाली हूँ… फिर भी वो चली गईं। क्या मेरी इस घर में कोई अहमियत नहीं है?”


रोहित कुछ पल चुप रहा। उसने ध्यान से पूजा की तरफ देखा, फिर धीरे से उसके पास आकर बैठ गया।


उसने बहुत ही शांत लेकिन गहरी आवाज में कहा—


“पूजा… एक बात पूछूँ?”


पूजा ने बिना कुछ बोले उसकी तरफ देखा।


“तुम यहाँ क्यों आई हो?” रोहित ने पूछा।


पूजा थोड़ी झुंझलाई हुई बोली—

“आराम करने… और क्यों?”


रोहित ने हल्की सांस ली और बोला—


“ठीक वही काम तुम्हारी भाभी ने भी किया है। वो भी तो पूरे साल घर और जिम्मेदारियों में लगी रहती है। उसे भी कुछ दिन अपने माँ-बाप के पास सुकून से रहने का हक है… जैसे तुम्हें है।”


पूजा के चेहरे का भाव धीरे-धीरे बदलने लगा।


रोहित ने आगे कहा—


“तुम अपनी जिम्मेदारी छोड़कर यहाँ आई हो, ताकि थोड़ा आराम मिल सके… और भाभी ने भी वही किया। अब बताओ, अगर वो गलत है… तो तुम सही कैसे हो?”


ये शब्द जैसे सीधे पूजा के दिल में उतर गए।


उसके पास अब कोई जवाब नहीं था… सिर्फ खामोशी थी, और उस खामोशी में छिपा एक कड़वा सच।



उस रात पूजा को नींद नहीं आई।


उसे याद आने लगा—


नेहा हर बार कितने प्यार से आती थी…

उसके बच्चों के लिए गिफ्ट लाती थी…

और वो खुद क्या करती थी?


बस शिकायत…


उसकी आंखों से आँसू बहने लगे।



फैसला...


सुबह की हल्की रोशनी कमरे में फैल चुकी थी, लेकिन पूजा की आँखों में पूरी रात की बेचैनी साफ झलक रही थी।


वो चुपचाप उठी… कुछ पल खिड़की के पास खड़ी रही, जैसे खुद से कोई वादा कर रही हो।


फिर उसने गहरी सांस ली और अपना फोन उठाया।


कांपते हाथों से उसने अजय का नंबर मिलाया।


“हेलो…” अजय की आवाज आई।


कुछ सेकंड तक पूजा कुछ बोल ही नहीं पाई… गला भर आया था।


फिर खुद को संभालते हुए धीमे से बोली—


“अजय… मैं आज ही घर वापस आ रही हूँ…”


अजय थोड़ा चौंका—


“सब ठीक है ना, पूजा?”


पूजा की आँखों से आँसू बह निकले, लेकिन इस बार उनमें पछतावा कम और एक दृढ़ निश्चय ज्यादा था।


“अब सब ठीक करूँगी…” उसने धीमी लेकिन मजबूत आवाज में कहा।



घर वापसी...


जब पूजा घर पहुँची, तो उसने देखा कि दरवाज़ा खुला हुआ है।


वह धीरे-धीरे अंदर गई।


ड्राइंग रूम में नेहा और बच्चे चुपचाप बैठे थे। उनके चेहरों पर हल्की उदासी साफ झलक रही थी।


नेहा अपने बेटे से धीमी आवाज़ में कह रही थी—

“लगता है भाभी कहीं बाहर गई हैं…”


तभी दरवाज़े पर आहट हुई।


नेहा ने पलटकर देखा… और सामने पूजा को खड़ा पाया।


वह एक पल के लिए चौंक गई—

“अरे भाभी! आप…?”


पूजा की आँखें नम थीं।

वह बिना कुछ कहे तेजी से आगे बढ़ी और नेहा को गले लगा लिया।


उसकी आवाज़ भर्रा गई—

“मुझे माफ कर दो दीदी… मुझसे बहुत बड़ी गलती हो गई…”


नेहा की आँखें भी भर आईं।

उसने प्यार से पूजा को कसकर थाम लिया।


उस पल दोनों के बीच की सारी दूरियाँ जैसे खुद-ब-खुद खत्म हो गईं।




उस दिन के बाद घर का माहौल बदल गया।


पूजा ने पूरे दिल से अपनी ननद का स्वागत किया।


दोनों ने मिलकर काम किया, हंसी-मजाक किया…

और वो 10 दिन कब बीत गए, किसी को पता ही नहीं चला।



सीख:

रिश्ते बोझ नहीं होते…

हमारी सोच उन्हें बोझ बना देती है।


जिस प्यार और सम्मान की उम्मीद हम दूसरों से करते हैं…

वो पहले हमें देना पड़ता है।


क्योंकि सच यही है—


दुनिया गोल है…

जो हम देते हैं, वही लौटकर हमारे पास आता है।




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