मन की खिड़की
खिड़की के बाहर हल्की-हल्की बारिश हो रही थी। बूंदें कांच पर गिरकर जैसे कोई पुरानी धुन बजा रही थीं।
सुमित्रा देवी चुपचाप कुर्सी पर बैठी बाहर देख रही थीं। उनकी आंखें कहीं दूर अतीत में खोई हुई थीं।
“मांजी, खिड़की बंद कर दूं? हवा ठंडी है… आपको सर्दी लग जाएगी।”
नेहा ने धीरे से कहा।
सुमित्रा देवी ने हल्की मुस्कान के साथ सिर हिलाया—
“नहीं बहू… रहने दे… ये बारिश… बहुत कुछ याद दिलाती है…”
नेहा चुप हो गई। वह समझ गई कि मांजी फिर बाबूजी को याद कर रही हैं।
कुछ देर बाद सुमित्रा देवी खुद ही बोलने लगीं—
“तेरे बाबूजी को बारिश बहुत पसंद थी… जैसे ही बूंदें गिरतीं… बस खिड़की के पास बैठ जाते थे… और कहते—‘सुमित्रा, आज गरमा-गरम कचौरी बना दो।’”
उनकी आंखों में चमक आई… फिर धीरे-धीरे वही चमक नमी में बदल गई।
नेहा का दिल भर आया।
उसे पता था—डॉक्टर ने मांजी को सख्त मना किया है तला-भुना खाने से। शुगर और बीपी दोनों ही बढ़े हुए थे।
लेकिन दिल का क्या करे…?
कुछ दिन पहले ही सुमित्रा देवी अपने पति को खोकर बेटे रोहन और बहू नेहा के पास रहने आई थीं।
घर में सब उनका बहुत ध्यान रखते थे… पोती नंदिनी तो हर समय उनके पीछे-पीछे घूमती रहती थी…
लेकिन एक खालीपन था… जो किसी से नहीं भरता था।
एक दिन नेहा ने गौर किया कि सुमित्रा देवी खाना तो खा रही थीं, लेकिन हर निवाले के साथ उनका ध्यान कहीं और भटक जाता था। उनके चेहरे पर एक अजीब-सी उदासी थी, जैसे मन किसी पुराने ख्याल में उलझा हो।
नेहा ने धीरे से पूछा—
“मांजी, खाना ठीक नहीं बना क्या?”
सुमित्रा देवी ने हल्की मुस्कान लाने की कोशिश की—
“नहीं बेटा… खाना तो बहुत अच्छा है…”
लेकिन उनकी आवाज़ में वो बात नहीं थी।
नेहा समझ गई—ये कमी स्वाद में नहीं…
ये भूख पेट की नहीं, बल्कि मन की है।
शाम को नेहा ने रोहन से कहा—
“रोहन… मुझे लगता है मांजी बहुत अकेला महसूस करती हैं। हम सब उनके साथ हैं… फिर भी उनके अंदर एक खालीपन है, जो शायद भर नहीं पा रहा…”
रोहन ने उसकी बात ध्यान से सुनी। उसने गहरी सांस ली और कुछ पल चुप रहा, जैसे सही शब्द ढूंढ रहा हो।
“नेहा… पापा के जाने का दुख इतना जल्दी खत्म नहीं होता। वो उनके साथ पूरी ज़िंदगी रहे हैं… आदत भी थी और अपनापन भी। ऐसे में अकेलापन महसूस होना स्वाभाविक है… हमें बस धैर्य रखना होगा और उनके साथ खड़ा रहना होगा।”
नेहा ने धीरे से सिर हिलाया, लेकिन उसकी आंखों में अब भी बेचैनी थी।
वह चुप तो हो गई… पर उसके मन में एक ख्याल लगातार आकार ले रहा था—
कुछ ऐसा करना होगा, जिससे मांजी फिर से मुस्कुरा सकें।
अगले दिन नेहा ने एक छोटा सा प्लान बनाया।
“मांजी, चलिए आज छत पर चलते हैं।”
“छत पर? मैं क्या करूंगी वहां?”
“बस चलिए ना… अच्छा लगेगा…”
नेहा ने उनका हाथ पकड़ लिया।
छत पर पहुंचते ही हल्की बारिश शुरू हो गई।
सुमित्रा देवी एकदम चौंक गईं—
“अरे… भीग जाएंगे!”
नेहा हल्के से मुस्कुराई—
“आज तो भीगने का ही दिन है, मांजी…”
इतना कहकर उसने पास ही एक छोटा-सा टेबल लगा दिया।
टेबल पर चाय से भरा थर्मस रखा था… और साथ में एक प्लेट।
सुमित्रा देवी की नजर जैसे ही उस प्लेट पर पड़ी, वो रुक गईं।
“ये… कचौरी?”
उनकी आवाज हल्की-सी कांप गई।
नेहा ने प्यार से कहा—
“हाँ मांजी… लेकिन आप बिल्कुल मत घबराइए। ये तली हुई नहीं है… मैंने इसे बिना तेल के, बेक करके बनाया है…”
सुमित्रा देवी कुछ पल तक चुप रहीं। उनकी आंखों में हैरानी और भावनाएं दोनों साथ दिखाई दे रही थीं।
फिर उन्होंने धीमे स्वर में पूछा—
“तूने… ये मेरे लिए बनाया?”
नेहा ने उनकी आंखों में देखते हुए मुस्कुराकर कहा—
“सिर्फ आपके लिए नहीं मांजी… आपके उस छोटे-से शौक के लिए, जिसे आपने अपनी सेहत की वजह से दिल में दबा लिया था…”
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
सुमित्रा देवी ने कांपते हाथों से एक कचौरी उठाई… उसे ध्यान से देखा, जैसे उसमें कोई पुरानी याद बस गई हो… फिर धीरे-धीरे एक कौर लिया।
जैसे ही स्वाद ज़ुबान पर आया, उनकी आंखें भर आईं… और अगले ही पल आंसू चुपचाप गालों पर बहने लगे।
“बिल्कुल वैसी ही… जैसे वो बनवाते थे…”
उनकी आवाज़ भावनाओं से भीग गई।
नेहा ने पास आकर उनका हाथ थाम लिया…
“यादें कभी खत्म नहीं होतीं मांजी… बस उन्हें जीने का तरीका बदलना पड़ता है…”
तभी नंदिनी दौड़ते हुए आई—
“दादी! मुझे भी दो ना!”
सुमित्रा देवी हंस पड़ीं—
“आ जा… आज हम दोनों साथ खाएंगे…”
उस दिन पहली बार…
सुमित्रा देवी ने बारिश को देखकर आह नहीं भरी…
बल्कि मुस्कुराईं।
रात को रोहन ने नेहा से कहा—
“आज मां बहुत खुश थीं… तुमने क्या किया?”
नेहा ने हल्के से कहा—
“बस… उनकी यादों को दर्द से निकालकर… खुशी में बदल दिया…”
सच तो ये है—
बुजुर्गों को ज्यादा चीजों की जरूरत नहीं होती…
उन्हें चाहिए होता है—
कोई जो उनके दिल की छोटी-छोटी बातों को समझ सके।
दोस्तों,
रिश्ते बड़े कामों से नहीं…
छोटी-छोटी समझ और एहसास से मजबूत होते हैं।

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