पहली होली — डर से खुशी तक
हल्की-हल्की ठंडी हवा चल रही थी। रात का सन्नाटा पूरे घर में फैला हुआ था, लेकिन नेहा की आँखों में नींद बिल्कुल नहीं थी।
उसके कानों में अपने पति आदित्य की बातें बार-बार गूँज रही थीं—
“नेहा, कल होली है… और ये तुम्हारी इस घर में पहली होली है। ध्यान रखना, कोई कमी नहीं होनी चाहिए… आखिर तुम इस घर की बहू हो।”
बस… यही बात उसके दिल में डर बनकर बैठ गई थी।
नेहा की शादी को अभी दो महीने ही हुए थे। ससुराल एक बड़ा संयुक्त परिवार था—दादा-दादी, चाचा-चाची, देवर-ननद… और हर त्यौहार पर तो जैसे पूरा घर मेले में बदल जाता था।
अब तक उसने दूसरों से ही “पहली होली” के किस्से सुने थे— कहीं बहुओं को सुबह से शाम तक रसोई में खड़ा रहना पड़ता था… कहीं उन्हें खेलने का मौका भी नहीं मिलता था…
और अब… उसकी खुद की पहली होली थी।
लेकिन खुशी की जगह उसके मन में डर ज्यादा था।
रात को जब सब लोग सोने चले गए, तो नेहा ने हिम्मत करके आदित्य से कहा—
“सुनिए… मैं इतने लोगों का खाना अकेले कैसे बना पाऊँगी?”
आदित्य ने थोड़ा गंभीर होकर कहा— “देखो नेहा… हमारे घर की परंपरा है कि त्योहार पर खाना घर में ही बनता है। अब तुम बहू हो, जिम्मेदारी तो निभानी पड़ेगी।”
नेहा का दिल और बैठ गया।
“मतलब… मैं होली भी नहीं खेल पाऊँगी?” उसने धीमे से पूछा।
आदित्य ने हल्की मुस्कान के साथ कहा— “पहले जिम्मेदारी… फिर मस्ती।”
इतना कहकर वो सो गया…
लेकिन नेहा की आँखों से नींद कोसों दूर थी।
अगली सुबह...
नेहा की आँख थोड़ी देर से खुली। जैसे ही उसने घड़ी देखी, उसका दिल घबरा गया—
“हे भगवान! इतनी देर हो गई… अब सब लोग क्या सोचेंगे!”
वो जल्दी-जल्दी उठी और बिना समय गंवाए रसोई की तरफ भागी।
लेकिन रसोई में पहुँचते ही वह रुक गई…
वहाँ कोई नहीं था।
न बर्तनों की आवाज़… न खाना बनता हुआ… सब कुछ बिल्कुल शांत था।
उसे कुछ समझ ही नहीं आया।
थोड़ी उलझन में वह अपनी सास के पास गई और धीमे स्वर में बोली—
“मम्मी जी… खाना कहाँ बनेगा?”
सास ने मुस्कुराते हुए उसकी तरफ देखा और प्यार से कहा—
“ऊपर छत पर बेटा… सारा इंतज़ाम वहीं किया है।”
छत पर जो देखा… वो नेहा ने कभी सोचा भी नहीं था...
नेहा जैसे ही छत पर पहुँची, उसके कदम वहीं रुक गए।
उसकी आँखें आश्चर्य से फैल गईं… सामने का नज़ारा बिल्कुल अप्रत्याशित था—जैसे कोई सुंदर सपना सच हो गया हो।
छत पर पूरा परिवार एक साथ जुटा हुआ था।
👉 उसके ससुर जी बड़े आराम से बैठकर सब्ज़ियाँ काट रहे थे।
👉 देवर हँसते-बात करते हुए आटा गूँथ रहे थे।
👉 चाचा जी बड़े मन से दही भल्ले तैयार कर रहे थे।
👉 कोई मिठाई बनाने में व्यस्त था, तो कोई चूल्हे की जिम्मेदारी संभाल रहा था।
चारों तरफ हँसी, मज़ाक और अपनापन घुला हुआ था।
पूरा माहौल इतना खुशहाल था कि नेहा कुछ पल के लिए बस खड़ी रह गई… जैसे उसे यकीन ही न हो रहा हो कि वो जो देख रही है, वो सच है।
नेहा ने धीमे स्वर में पूछा,
“ये… ये सब क्या हो रहा है?”
तभी उसके ससुर जी मुस्कुराते हुए उसकी तरफ बढ़े और बोले,
“बेटा, हमारे घर में एक खास परंपरा है… होली के दिन घर की सभी महिलाओं को रसोई से छुट्टी दी जाती है।”
नेहा ने हैरानी से उनकी तरफ देखा, मानो उसे अपनी बात पर यकीन ही न हो रहा हो।
“मतलब… आज मुझे खाना नहीं बनाना पड़ेगा?” उसने धीरे से पूछा।
ससुर जी हल्के से हँस पड़े और बोले,
“बिल्कुल नहीं! आज तुम सिर्फ होली खेलो, रंगों का मज़ा लो… रसोई की सारी जिम्मेदारी हमारी है।”
नेहा की आँखों में हल्की-सी नमी आ गई…
जो डर उसने पूरी रात महसूस किया था… वो पलभर में खत्म हो गया।
तभी पीछे से एक हल्की-सी शरारती आवाज़ आई—
“मैडम, कुछ ऑर्डर देना है क्या?”
नेहा ने चौंककर पीछे मुड़कर देखा। सामने आदित्य खड़ा था—एप्रन पहने, हाथ में करछी लिए, चेहरे पर वही शरारती मुस्कान।
उसे इस हाल में देखकर नेहा कुछ पल के लिए बस उसे देखती ही रह गई… फिर आँखें हल्की सिकोड़ते हुए बोली—
“आपको तो मैं बाद में देख लूँगी…”
उसके चेहरे की झुंझलाहट और शर्मीली मुस्कान एक साथ देखकर आदित्य हँस पड़ा।
इतने में आस-पास खड़े देवर भी मज़ाकिया अंदाज़ में बोल उठे—
“लगता है भैया आज सच में गए काम से!”
बस फिर क्या था—पूरा माहौल ठहाकों से गूंज उठा, और नेहा भी अपनी हँसी नहीं रोक पाई।
और फिर शुरू हुई असली होली...
नेहा जैसे ही नीचे आई, माहौल पूरी तरह रंगों से भर चुका था।
उसकी ननदें मुस्कुराते हुए उसके पास आईं और प्यार से उसके गालों पर गुलाल लगा दिया।
देवर भी पीछे नहीं रहे—उन्होंने शरारत करते हुए उस पर रंग भरा पानी डाल दिया।
कुछ ही पलों में नेहा भी हँसी में शामिल हो गई।
चारों तरफ रंग, हँसी और अपनों का साथ था… पूरा घर जैसे खुशियों से झूम रहा था।
और उसी पल… नेहा के दिल में एक सुकून-सा उतर आया।
आज उसे पहली बार सच में महसूस हुआ—
“बहू होना सिर्फ जिम्मेदारियों का बोझ नहीं होता… बल्कि अपनापन और प्यार पाने का एक खूबसूरत एहसास भी होता है।”
शाम को जब सब साथ बैठे खाना खा रहे थे, नेहा के चेहरे पर सच्ची खुशी थी।
वो मन ही मन सोच रही थी—
“डर हमेशा सच नहीं होता…
कई बार वो सिर्फ हमारे मन की बनाई हुई एक कल्पना होती है।”
सीख:
हर घर एक जैसा नहीं होता…
और हर परंपरा बोझ नहीं होती…
कुछ परंपराएँ प्यार भी सिखाती हैं ❤️

Post a Comment