अहम से आगे
हर इंसान अपनी दुनिया में खुद को सबसे ज्यादा समझदार मानता है… और मैं भी कोई अलग नहीं था।
मेरी पहचान एक बड़े सरकारी अधिकारी की थी। लोग खड़े होकर सलाम करते, बात करने से पहले सोचते, और मेरी हाँ-ना पर कई फैसले निर्भर करते थे। धीरे-धीरे यह सब मेरे स्वभाव का हिस्सा बन गया था। मुझे लगने लगा था कि मैं सिर्फ पद में ही नहीं, हर मायने में दूसरों से बेहतर हूं।
घर में भी यही रवैया था।
नौकर हरि सुबह-सुबह काम में लगा रहता, लेकिन मैंने कभी उससे ठीक से बात नहीं की। पत्नी कुछ कहती तो मैं आधा सुनता, आधा अनदेखा कर देता। बेटी कुछ दिखाना चाहती तो मैं कह देता—“बाद में दिखाना, अभी टाइम नहीं है।”
उस दिन भी कुछ अलग नहीं था।
ऑफिस जाने की जल्दी थी। जूते पहनते-पहनते मैंने बस इतना कहा—“गाड़ी निकालो।”
ड्राइवर शेखर गाड़ी तैयार रखे खड़ा था।
गाड़ी चल पड़ी और मैं हमेशा की तरह फाइलों में खो गया।
कुछ दूर जाने के बाद अचानक शेखर ने गाड़ी धीमी कर दी।
“क्या हुआ?” मैंने बिना ऊपर देखे पूछा।
“सर, आगे रोड थोड़ी खराब है… ध्यान से निकलना होगा,” उसने कहा।
मुझे लगा वह जरूरत से ज्यादा सावधानी दिखा रहा है।
“इतना भी क्या… सीधा निकालो,” मैंने कहा।
लेकिन उसने मेरी बात अनसुनी कर दी और धीरे-धीरे गाड़ी निकालने लगा।
थोड़ी देर बाद उसने गाड़ी रोक दी और उतरकर आगे देखने लगा।
अब मैं सच में चिढ़ गया—“इतना टाइम वेस्ट क्यों कर रहे हो?”
वह शांत स्वर में बोला—“सर, अगर जल्दी में गाड़ी डाल देते तो नीचे बड़ा गड्ढा है… गाड़ी फंस सकती थी।”
मैंने बाहर झांक कर देखा—वह सही था।
मैं चुप हो गया… लेकिन अंदर कहीं हल्की सी खटास रह गई।
ऑफिस पहुंचते ही रोज की तरह काम शुरू हो गया।
कुछ देर बाद ऑफिस का चपरासी बबलू पानी लेकर आया।
आज न जाने क्यों मैंने उसे गौर से देखा।
साधारण कपड़े, साधारण चेहरा… लेकिन चेहरे पर एक अजीब सी शांति थी।
“बबलू, तुम्हारे बच्चे क्या करते हैं?” मैंने अचानक पूछ लिया।
वह मुस्कुराया—“सर, दोनों पढ़ते हैं… बड़ा वाला डॉक्टर बनना चाहता है।”
“अच्छा… पढ़ाई का खर्च कैसे संभालते हो?” मैंने पूछा।
“सर, थोड़ा-थोड़ा बचा लेता हूं… और बाकी मेहनत कर लूंगा,” उसने सहजता से कहा।
मैं हैरान था—इतनी कम सैलरी में इतना बड़ा सपना!
मैंने सिर हिलाया… लेकिन मन में कुछ बदलने लगा था।
दोपहर के समय ऑफिस में हलचल हुई।
पता चला कि स्वतंत्रता दिवस के कार्यक्रम की तैयारी चल रही है।
मैंने सोचा—“चलो देखते हैं, ये लोग क्या करते हैं।”
ऑडिटोरियम में पहुंचा तो सामने का दृश्य देखकर मैं रुक गया।
स्टेज पर वही बबलू खड़ा था… और वह गा रहा था।
उसकी आवाज इतनी मधुर थी कि पूरा हॉल शांत होकर सुन रहा था।
“सारे जहां से अच्छा…” उसकी आवाज में एक अलग ही जादू था।
मैं कुर्सी पर बैठ गया।
मेरे लिए यह सब नया था।
जिसे मैं सिर्फ एक चपरासी समझता था… वह इतना बड़ा कलाकार हो सकता है—यह मैंने कभी सोचा ही नहीं था।
शाम तक मेरा मन अजीब सा हो गया था।
अब मैं हर व्यक्ति को अलग नजर से देखने लगा था।
कोई मुझसे ज्यादा धैर्यवान था, कोई ज्यादा मेहनती, कोई ज्यादा खुशमिजाज।
मैं सोचने लगा—“क्या सच में मैं हर मायने में सबसे बेहतर हूं?”
ऑफिस से लौटते वक्त मैंने बाजार जाने का फैसला किया।
पत्नी ने जो सामान लिखा था, वह लेना था।
दुकान पर पहुंचा तो दुकानदार ने बिना ज्यादा सोचे-समझे सब सामान जल्दी-जल्दी निकाल दिया और कुछ ही मिनटों में पूरा हिसाब भी कर दिया।
मैंने सोचा—“मैं तो इतना तेज हिसाब नहीं कर सकता।”
घर पहुंचा तो हरि गाड़ी से सामान उतार रहा था।
मैंने पहली बार उससे पूछा—“हरि, तुम गांव जाते हो?”
वह बोला—“जी साहब, गांव में खेती है… परिवार वहीं रहता है।”
“कितनी जमीन है?” मैंने पूछा।
“बस साहब… करीब तीस बीघा,” उसने सहजता से कहा।
मैं सन्न रह गया।
मैं इतने सालों से नौकरी कर रहा था… और मेरे पास खुद की जमीन तक नहीं थी।
रात को जैसे ही मैं कमरे की ओर बढ़ा, पीछे से बेटी ने मेरा हाथ पकड़ लिया।
“पापा… एक मिनट रुकिए ना, मेरी ड्राइंग देखिए,” उसने मासूम उम्मीद भरी आवाज़ में कहा।
मैं थोड़ी देर के लिए रुक गया। मन तो था कि कह दूँ—“अभी नहीं, बाद में,” लेकिन उसके चेहरे की चमक देखकर खुद को रोक नहीं पाया।
“अच्छा, दिखाओ,” मैंने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
उसने तुरंत अपनी कॉपी खोली और मेरे सामने कर दी।
जैसे ही मेरी नज़र उस ड्राइंग पर पड़ी, मैं कुछ पल के लिए चुप रह गया।
रंगों का इतना सुंदर मेल… छोटी-छोटी बारीकियाँ… और हर स्ट्रोक में एक अलग ही मासूमियत।
यह सिर्फ एक ड्राइंग नहीं थी, जैसे उसकी छोटी-सी दुनिया कागज़ पर उतर आई हो।
मैंने उसकी ओर देखा—वह मेरी प्रतिक्रिया का इंतज़ार कर रही थी।
“ये तुमने बनाया है?” मैंने सच में हैरानी से पूछा।
“हाँ पापा,” उसने धीमे से कहा।
मैंने उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बहुत ही सुंदर बनाया है बेटा… सच में, कमाल कर दिया तुमने।”
मेरी बात सुनते ही उसके चेहरे पर जो खुशी आई… वह किसी इनाम से कम नहीं थी।
और उस पल मुझे महसूस हुआ—
कभी-कभी बच्चों की छोटी-छोटी खुशियाँ, हमारी सबसे बड़ी सीख बन जाती हैं।
डिनर के दौरान मैंने प्लेट रखते हुए धीमे से कहा—
“आज खाना सच में बहुत स्वादिष्ट बना है।”
मेरी आवाज़ में इस बार औपचारिकता नहीं, सच्ची सराहना थी।
पत्नी ने एक पल के लिए मेरी ओर देखा, फिर हल्के से मुस्कुरा दी।
उस मुस्कान में हैरानी भी थी… और एक संतोष भी—जैसे उसे महसूस हो गया हो कि आज मेरे अंदर कुछ सच में बदल गया है।
रात को बिस्तर पर लेटा हुआ मैं पूरे दिन की घटनाओं को एक-एक कर याद करने लगा।
शेखर की समझदारी…
बबलू का अद्भुत हुनर…
दुकानदार की तेज़ी और सटीकता…
हरि की मेहनत से कमाई गई संपत्ति…
बेटी की मासूम कला…
और पत्नी का शांत धैर्य…
हर चेहरा मेरी आंखों के सामने जैसे आईना बनकर खड़ा था।
तब मुझे एहसास हुआ—
हर व्यक्ति किसी न किसी रूप में मुझसे बेहतर है।
और मैं…
अब तक अपने ही अहम में डूबा हुआ जी रहा था।
उस दिन मुझे पहली बार एहसास हुआ—
इंसान की असली पहचान उसके पद से नहीं,
बल्कि उसके गुणों से होती है।
और सच तो यह है—
हम हर किसी से कुछ ना कुछ सीख सकते हैं…
बस नजर बदलने की जरूरत होती है।

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