जहाँ अपनापन मिला
सुबह अभी पूरी तरह जागी भी नहीं थी। आसमान हल्की नीली चादर ओढ़े था और दूर मंदिर की घंटी की आवाज़ हवा में तैर रही थी। मैं रोज़ की तरह छत पर आकर बैठ गई। चाय का कप हाथ में था और सामने उगते सूरज को देखना मेरे दिन की सबसे प्यारी शुरुआत बन चुका था।
सेवानिवृत्ति के बाद समय जैसे ठहर गया था। पहले घर, पति और बेटे के बीच दिन कब निकल जाता था, पता ही नहीं चलता था। अब पति अपने बिज़नेस में इतने व्यस्त रहते कि महीनों घर से बाहर रहते। और बेटा… वह तो विदेश में अपनी दुनिया बसा चुका था।
मैंने खुद को व्यस्त रखने के लिए घर की ऊपरी मंज़िल किराए पर दे दी थी। कुछ ही दिनों में वहाँ रहने आईं रीना और उनकी बेटी काव्या।
रीना एक प्राइवेट कंपनी में काम करती थीं—हमेशा व्यस्त, हमेशा जल्दी में। और काव्या… वह बिल्कुल अलग थी—तेज़, जिद्दी, और कुछ हद तक बदतमीज़ भी।
पहले ही दिन मैंने नोटिस किया था कि माँ-बेटी के बीच अक्सर बहस होती रहती थी। छोटी-छोटी बातों पर आवाज़ें ऊँची हो जातीं, दरवाज़े जोर से बंद होते और फिर लंबे समय तक सन्नाटा छा जाता।
एक दिन सुबह-सुबह मैं पौधों में पानी दे रही थी कि ऊपर से तेज़ आवाज़ें आने लगीं।
“आपको मेरी लाइफ में दखल देने की कोई जरूरत नहीं है!”
काव्या चिल्ला रही थी।
“मैं तुम्हारी माँ हूँ, मुझे हक है!” रीना की आवाज़ काँप रही थी।
कुछ ही देर में काव्या गुस्से में नीचे उतरी, बैग उठाया और बिना किसी की तरफ देखे घर से बाहर निकल गई।
मैं चुप रही… लेकिन दिल कहीं बेचैन हो गया।
धीरे-धीरे रीना मेरे पास बैठने लगीं। एक दिन उन्होंने खुद ही कहा—
“समझ नहीं आता, मैं कहाँ गलत हो रही हूँ। जितना समझाने की कोशिश करती हूँ, उतना ही वह मुझसे दूर होती जा रही है।”
उनकी आँखों में थकान थी… और एक गहरी बेबसी भी।
मैंने बस इतना कहा, “कभी-कभी बच्चों को समझाने से ज्यादा उन्हें महसूस करवाने की जरूरत होती है।”
वह चुप हो गईं।
कुछ दिनों बाद की बात है।
दोपहर का समय था। अचानक दरवाज़े पर हल्की दस्तक हुई। दरवाज़ा खोला तो सामने काव्या खड़ी थी।
चेहरा उतरा हुआ… आँखें लाल… और शरीर काँप रहा था।
“आंटी… पानी मिलेगा?”
मैं तुरंत उसे अंदर ले आई। पानी दिया। जैसे ही उसका हाथ छुआ, मुझे महसूस हुआ—उसे तेज़ बुखार है।
“तुम्हें तो बहुत तेज़ बुखार है!” मैंने चिंता से कहा।
वह तुरंत पीछे हट गई—
“मैं ठीक हूँ… मुझे आदत है खुद संभालने की।”
उसकी बात सुनकर दिल भर आया।
थोड़ी देर बाद मैं खुद को रोक नहीं पाई। अदरक-तुलसी की चाय और दवा लेकर उसके कमरे में गई।
वह बिस्तर पर पड़ी काँप रही थी।
मैंने बिना कुछ कहे उसके माथे पर ठंडी पट्टी रखी, उसे चाय दी और धीरे-धीरे उसकी देखभाल करने लगी।
इस बार उसने विरोध नहीं किया।
बस चुपचाप मेरी तरफ देखती रही…
शाम तक उसका बुखार थोड़ा उतर गया।
मैं उठने लगी तो उसने धीरे से कहा—
“थैंक यू…”
मैं मुस्कुरा दी—
“थैंक यू नहीं… आंटी कहो।”
वह कुछ पल चुप रही, फिर बोली—
“मैं रिश्तों में विश्वास नहीं करती।”
उसकी आँखों में दर्द साफ दिख रहा था।
मैंने धीरे से कहा—
“रिश्ते कभी बोझ नहीं होते… बस सही समय पर सही लोग मिल जाएँ तो वही जिंदगी का सहारा बन जाते हैं।”
वह कुछ नहीं बोली।
अगले दिन वह खुद मेरे पास आई।
पहली बार उसके चेहरे पर गुस्से की जगह संकोच था।
“आंटी… मैं आपसे बात करना चाहती हूँ।”
मैंने उसे पास बैठा लिया।
कुछ देर चुप रहने के बाद वह बोली—
“मेरे मम्मी-पापा अलग हो चुके हैं… पापा हमें छोड़कर चले गए। मम्मी हमेशा काम में व्यस्त रहती हैं… और मैं… मैं हमेशा अकेली रही हूँ।”
उसकी आवाज़ भर्रा गई।
“जब मैं बीमार होती थी, कोई मेरे पास नहीं होता था। जब मुझे डर लगता था, कोई मुझे गले लगाने वाला नहीं था। धीरे-धीरे मुझे लगा… कोई मेरा अपना है ही नहीं।”
मेरी आँखें नम हो गईं।
वह आगे बोली—
“मैं जानबूझकर मम्मी को दुख देती हूँ… ताकि उन्हें भी वैसा ही दर्द महसूस हो जैसा मैंने किया।”
मैंने उसका हाथ पकड़ लिया।
“काव्या, दर्द बाँटने से कम होता है… बढ़ाने से नहीं।”
वह मेरी तरफ देखने लगी।
“तुम्हारी माँ गलत नहीं हैं… बस हालात ने उन्हें कठोर बना दिया है। और तुम… तुम अपने ही दिल को चोट पहुँचा रही हो।”
कुछ देर सन्नाटा रहा।
फिर मैंने कहा—
“अगर सच में बदलना चाहती हो… तो शुरुआत आज से करो। अपनी माँ से लड़ना बंद करो… उन्हें समझने की कोशिश करो।”
उस दिन वह बिना कुछ कहे चली गई।
अगले दिन सुबह मैंने देखा—
वह बालकनी में खड़ी अपने दोस्तों से कह रही थी—
“आज नहीं… मुझे घर पर रहना है।”
मैं हैरान रह गई।
कुछ दिन बाद वह ट्रे में चाय और पकौड़े लेकर आई।
“आंटी… मैंने बनाए हैं।”
मैंने चखा… और मुस्कुरा दी।
“बहुत अच्छे हैं।”
वह खिल उठी।
रीना भी वहीं बैठी थीं। अपनी बेटी को इस रूप में देखकर उनकी आँखें भर आईं।
उन्होंने मेरी तरफ देखा… जैसे बिना शब्दों के धन्यवाद कह रही हों।
उस दिन मुझे महसूस हुआ—
रिश्ते खून से नहीं… अपनापन से बनते हैं।
और कभी-कभी… एक छोटा सा प्यार भरा स्पर्श किसी की पूरी जिंदगी बदल सकता है।

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