कर्म का आईना
दोपहर का समय था। घर में सन्नाटा पसरा हुआ था।
रसोई में काम करते-करते पूजा की आंखें बार-बार दरवाज़े की तरफ उठ जातीं… जैसे किसी खबर का इंतज़ार हो।
तभी उसका फोन बजा।
“हैलो बेटा…”
दूसरी तरफ से उसके पापा की टूटी हुई आवाज आई—
“तुम्हारी माँ की तबियत बहुत खराब है… डॉक्टर ने कहा है जल्दी आ जाओ।”
फोन हाथ से लगभग छूट गया।
“पापा… मैं अभी आती हूँ…”
पूजा दौड़कर अपने कमरे में गई और जल्दी-जल्दी सामान पैक करने लगी।
तभी उसकी सास कमला देवी कमरे में आईं।
“कहाँ जाने की तैयारी हो रही है?”
पूजा ने रोते हुए कहा,
“माँ की हालत बहुत खराब है माजी… मुझे जाना होगा।”
कमला देवी ने भौंहें चढ़ाईं—
“हर बार यही बहाना! ससुराल आई हो या मायके में ही रहना है?”
“माजी, इस बार सच में हालत बहुत खराब है… प्लीज जाने दीजिए…”
“नहीं! बहुएँ बार-बार मायके नहीं जातीं। वहाँ देखने वाले और भी लोग हैं।”
पूजा के हाथ कांपने लगे—
“माजी… मैं उनकी बेटी हूँ…”
“तो क्या? अब इस घर की जिम्मेदारी ज्यादा है तुम्हारी।”
इतना कहकर कमला देवी बाहर चली गईं।
पूजा ने उम्मीद भरी नजरों से अपने पति अमित की तरफ देखा…
लेकिन अमित चुप रहा।
उसकी चुप्पी ने पूजा का दिल तोड़ दिया।
अगले दो दिन… पूजा हर पल तड़पती रही।
हर पल उसका दिल घबराता रहता… हर छोटी-सी आवाज पर वो चौक कर दरवाज़े की तरफ देखती, मानो अब कोई अच्छी खबर आएगी।
उम्मीद और डर के बीच झूलती हुई वो हर मिनट खुद को संभालने की कोशिश करती रही।
लेकिन तीसरे दिन उसका फोन बजा…
काँपते हाथों से उसने कॉल उठाया।
दूसरी तरफ से पापा की टूटी हुई आवाज आई—
“बेटा… तुम्हारी माँ अब नहीं रहीं…”
ये सुनते ही पूजा के पैरों तले जमीन खिसक गई।
फोन उसके हाथ से छूट गया और वो वहीं फर्श पर गिर पड़ी।
“माँ…!” उसकी दर्द भरी चीख निकल गई—
“मैं आपको आखिरी बार भी नहीं देख पाई…”
उसकी सिसकियाँ और चीखें पूरे घर में गूंजने लगीं…
और उस पल, जैसे उसका पूरा संसार बिखर गया।
शाम को अमित के पिताजी राजेश जी घर आए।
उन्हें जब सारी बात पता चली तो उनका चेहरा गुस्से से लाल हो गया।
“कमला! तुमने ये क्या किया?”
कमला देवी घबरा गईं—
“मुझे क्या पता था कि…”
“कोई मरने से पहले बताकर जाता है क्या?”
राजेश जी गरज उठे।
“तुमने एक बेटी को उसकी माँ से मिलने से रोक दिया… ये पाप है।”
पूजा चुपचाप रो रही थी…
राजेश जी उसके पास आए—
“बेटा, तुम अपने मायके जाओ… जितना समय चाहो रहो।”
उस दिन पहली बार पूजा को लगा कि इस घर में कोई उसे समझता भी है।
कुछ महीने बीत गए।
घर में सब सामान्य होने लगा…
लेकिन राजेश जी के मन में एक बात बैठ गई थी।
एक दिन उनकी बेटी नेहा का फोन आया।
“पापा… मैं बच्चों के साथ कुछ दिन के लिए मायके आ जाऊँ? बहुत मन कर रहा है आप सबसे मिलने का…”
राजेश जी कुछ पल चुप रहे, फिर धीमी लेकिन सख्त आवाज में बोले—
“नहीं बेटा… अभी आने की ज़रूरत नहीं है।”
नेहा एकदम चौंक गई—
“क्यों पापा? मैंने ऐसा क्या कर दिया… मैं तो बस आपसे मिलने आना चाहती हूँ…”
राजेश जी ने बिना भाव बदले कहा—
“तुम्हारे ससुराल वाले हैं ना… वही तुम्हारा ध्यान रख लेंगे।”
ये सुनकर नेहा कुछ पल के लिए बिल्कुल खामोश हो गई।
उसकी आंखें भर आईं, लेकिन उसने अपने आंसुओं को रोक लिया।
“ठीक है पापा…” उसने धीमी आवाज में कहा और फोन रख दिया।
फोन कटते ही उसका दिल जैसे टूटकर बिखर गया…
कुछ हफ्तों बाद खबर आई—
नेहा अस्पताल में भर्ती है… हालत गंभीर है।
कमला देवी के पैरों तले जमीन खिसक गई।
“मुझे अभी जाना है मेरी बेटी के पास!”
उन्होंने घबराकर कहा।
राजेश जी ने वही शब्द दोहराए—
“वहाँ उसकी देखभाल करने वाले और भी लोग हैं…”
कमला देवी की आंखों से आँसू बहने लगे—
“माँ की जगह कोई नहीं ले सकता…”
राजेश जी ने सख्त आवाज में कहा—
“और बहू की माँ की जगह कौन ले सकता था?”
कमला देवी चुप हो गईं।
आज उन्हें अपनी गलती समझ आ रही थी…
रात भर वो सो नहीं पाईं।
सुबह होते ही वो पूजा के पास गईं और उसके पैरों में बैठ गईं।
“बहू… मुझे माफ कर दो…”
पूजा चौंक गई—
“माजी… ये आप क्या कर रही हैं?”
“मैंने तुम्हें बहुत बड़ा दर्द दिया है… आज वही दर्द मैं महसूस कर रही हूँ…”
उनकी आवाज कांप रही थी।
“अगर तुम मुझे माफ नहीं करोगी… तो मैं अपनी बेटी से मिलने लायक नहीं हूँ…”
पूजा की आंखों में आँसू आ गए।
कुछ पल की खामोशी के बाद उसने धीरे से कहा—
“माँ से मिलने की तड़प क्या होती है… ये मैं जानती हूँ…”
कमला देवी ने सिर उठाया।
“मैं नहीं चाहती कि कोई और वो दर्द सहे जो मैंने सहा…”
पूजा ने उनका हाथ पकड़ा—
“आप जाइए… अपनी बेटी से मिल लीजिए।”
कमला देवी फूट-फूटकर रो पड़ीं।
उन्होंने पूजा को गले लगा लिया—
“आज से तुम सिर्फ मेरी बहू नहीं… मेरी बेटी हो।”
उस दिन घर का माहौल बदल गया।
कमला देवी का घमंड टूट चुका था…
और दिल में इंसानियत जाग चुकी थी।
सीख:
दूसरों के दर्द को समझना आसान नहीं होता…
लेकिन वक्त सबको वही एहसास जरूर कराता है।
कर्म का हिसाब देर से सही… मगर होता जरूर है।

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