नज़र का सच
कॉलेज का पहला दिन हमेशा खास होता है… और रिया के लिए तो जैसे एक नई दुनिया का दरवाज़ा खुल गया था।
रिया पढ़ाई में तेज, बातों में समझदार और दिखने में बेहद आकर्षक थी। गोरा चेहरा, बड़ी-बड़ी आंखें और आत्मविश्वास से भरी चाल—उसे देखकर हर कोई एक बार जरूर मुड़कर देखता।
स्कूल से ही उसे आदत हो गई थी कि लोग उसकी तारीफ करें, उसकी तरफ खिंचे चले आएं। धीरे-धीरे ये सब उसके स्वभाव का हिस्सा बन गया था।
कॉलेज में कदम रखते ही वही सब शुरू हो गया।
“यार, वो नई लड़की देखी? क्या पर्सनैलिटी है!”
“मुझे तो लगता है, वो किसी मॉडल से कम नहीं है!”
रिया ये सब सुनती… और मुस्कुरा देती।
उसकी सहेली काव्या तो हर वक्त उसे बढ़ावा देती—
“रिया, तू तो कॉलेज की स्टार बनने वाली है!”
रिया हंसकर कहती,
“मुझे पता है… मैं लोगों को देखते ही समझ जाती हूं कि उनके दिमाग में क्या चल रहा है।”
धीरे-धीरे उसकी नजर एक शख्स पर जाकर टिक गई—
प्रोफेसर आदित्य।
वो अंग्रेज़ी के प्रोफेसर थे। लगभग 35 साल के, शांत स्वभाव, सादगी से कपड़े पहनने वाले, लेकिन उनकी बातों में एक अलग ही गहराई थी।
जब वो पढ़ाते, तो पूरी क्लास चुप हो जाती।
रिया ने नोटिस किया कि जब भी वो जवाब देती, प्रोफेसर आदित्य हल्की मुस्कान के साथ उसकी तारीफ करते।
बस… यहीं से कहानी शुरू हुई।
रिया को लगने लगा कि सर उसे बाकी स्टूडेंट्स से अलग तरीके से देखते हैं।
काव्या ने भी आग में घी डाला—
“रिया, मुझे तो साफ दिखता है… सर तुझसे इम्प्रेस हैं!”
रिया के मन में धीरे-धीरे एक अलग ही दुनिया बनने लगी।
अब वो कॉलेज पहले से ज्यादा सज-धज कर आने लगी। क्लास में सबसे आगे बैठती… हर सवाल का जवाब देने की कोशिश करती… ताकि सर की नजर उस पर बनी रहे।
प्रोफेसर आदित्य उसकी मेहनत देखकर खुश होते और उसे प्रोत्साहित करते।
कुछ हफ्ते बीत गए।
अब रिया को पूरा यकीन हो गया—
“सर मुझे पसंद करते हैं।”
एक दिन क्लास खत्म होने के बाद सर ने कहा—
“रिया, अगर तुम्हारे पास समय हो तो लाइब्रेरी के बाहर मिलना… कुछ जरूरी बात करनी है।”
रिया का दिल तेज़ धड़कने लगा।
“आज… आज सब साफ हो जाएगा…”
वो पूरे दिन उसी पल के बारे में सोचती रही।
शाम को जब वो लाइब्रेरी के बाहर पहुंची, तो सर पहले से वहां खड़े थे।
“हाय रिया, कैसी हो?”
“मैं ठीक हूं सर…”
कुछ पल की खामोशी के बाद सर बोले—
“रिया, मुझे लगता है तुम मुझसे कुछ कहना चाहती हो… सही समझ रहा हूं ना?”
रिया का दिल जोर से धड़कने लगा।
उसने हिम्मत जुटाई—
“सर… मैं आपको पसंद करने लगी हूं…”
कुछ सेकंड के लिए सब शांत हो गया।
फिर सर ने बहुत ही शांत और स्नेह भरी आवाज में कहा—
“रिया… तुम मेरी छात्रा हो… और मेरे लिए एक बेटी जैसी हो।”
रिया जैसे वहीं रुक गई।
उसकी आंखें फैल गईं… शब्द जैसे गले में अटक गए।
सर आगे बोले—
“देखो रिया… तुम बहुत होशियार हो, समझदार हो… और तुम्हारे अंदर बहुत क्षमता है।”
“लेकिन इस उम्र में भावनाएं अक्सर हमें गलत दिशा में ले जाती हैं।”
“मेरा काम है तुम्हें सही रास्ता दिखाना… न कि तुम्हारी कमजोरी का फायदा उठाना।”
रिया की आंखों में आंसू आ गए।
लेकिन ये आंसू दुख के नहीं… समझ के थे।
सर ने मुस्कुराते हुए कहा—
“तुम अपने सपनों पर ध्यान दो… एक दिन बहुत आगे जाओगी।”
“और हां… अगर कभी पढ़ाई में मदद चाहिए हो, तो मैं हमेशा हूं।”
इतना कहकर वो वहां से चले गए।
रिया वहीं खड़ी रही… लेकिन अब उसके मन में कोई भ्रम नहीं था।
उसे एहसास हुआ—
हर मुस्कान प्यार नहीं होती… और हर रिश्ता प्रेम का नहीं होता।
कभी-कभी…
कोई इंसान हमें गिरने से बचाने के लिए सामने आता है।
रिया ने धीरे से अपने आंसू पोंछे और मन ही मन कहा—
“सॉरी सर… और थैंक यू…”
उस दिन के बाद रिया बदल गई।
अब वो दूसरों की नजरों में नहीं…
अपने लक्ष्य में जीने लगी थी।
और प्रोफेसर आदित्य…
अब उसकी नजर में सिर्फ एक शिक्षक नहीं…
एक सच्चे मार्गदर्शक बन चुके थे।

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