रोटी में कमी नहीं, सोच में थी — एक बेटी का स्वाभिमान
दरवाज़े के बाहर खड़ी बारात की गाड़ियाँ एक-एक करके सजकर तैयार थीं, लेकिन घर के आँगन में खामोशी कुछ ज़्यादा ही गहरी हो गई थी।
विदाई का समय था।
पूजा अपनी माँ के गले से लिपटी थी और उसके आँसू रुकने का नाम नहीं ले रहे थे। माँ बार-बार उसके सिर पर हाथ फेर रही थीं, जैसे उस स्पर्श में सारी ताकत भर देना चाहती हों।
पास ही उसके पिता, हरिशंकर जी, चुप खड़े थे… आँखें लाल थीं, लेकिन आँसू गिरने नहीं दे रहे थे। शायद एक पिता अपनी बेटी के सामने कमजोर नहीं दिखना चाहता।
पूजा धीरे-धीरे गाड़ी की तरफ बढ़ी। उसका दिल हर कदम पर भारी होता जा रहा था। छोटी बहन रिया उसका हाथ पकड़े साथ चल रही थी।
उधर दूल्हा अर्जुन अपने दोस्तों के साथ हँसी-मजाक में लगा हुआ था।
“यार अर्जुन, सच बोलूं तो खाना कुछ खास नहीं था,” उसका दोस्त करण बोला।
“हाँ भाई,” दूसरा दोस्त हँसते हुए बोला, “पनीर तो जैसे बस नाम का था… और मिठाई में तो कोई स्वाद ही नहीं!”
अर्जुन ने भी हल्के अंदाज़ में कहा, “कोई बात नहीं, घर पहुँचकर अच्छे से खाएँगे… यहाँ तो बस रस्म निभानी थी।”
तीनों हँस पड़े।
ये शब्द बहुत धीरे बोले गए थे… लेकिन कुछ शब्द ऐसे होते हैं जो सीधे दिल तक पहुँच जाते हैं।
पूजा के कदम अचानक रुक गए।
उसने गाड़ी का दरवाज़ा पकड़ रखा था… लेकिन अब उसने धीरे से हाथ हटा लिया।
उसकी साँसें तेज़ हो गईं।
एक पल के लिए उसने अपने पापा की तरफ देखा… वही पापा जो पिछले एक साल से हर छोटी-बड़ी चीज़ में लगे थे।
वह अचानक मुड़ी… और तेज़ कदमों से वापस अपने पिता के पास आ गई।
“पापा… मैं नहीं जाऊँगी।”
उसकी आवाज़ साफ थी… और इतनी तेज़ कि आस-पास खड़े सभी लोग चौंक गए।
पूरा माहौल जैसे थम गया।
“क्या हुआ बेटी?” हरिशंकर जी घबरा गए।
“मैं ये शादी नहीं निभा सकती,” पूजा ने कहा।
सब लोग इकट्ठा हो गए।
दूल्हा अर्जुन भी हैरान होकर उसके पास आया—“पूजा, क्या हुआ? अभी तक सब ठीक था…”
पूजा की आँखों में आँसू थे, लेकिन आवाज़ मजबूत थी—
“आप लोगों को खाना पसंद नहीं आया… है ना?”
सब चुप।
“पनीर ठीक नहीं था… मिठाई में स्वाद नहीं था… रोटी गर्म नहीं थी… यही बात कर रहे थे आप लोग?”
अर्जुन और उसके दोस्त एक-दूसरे का चेहरा देखने लगे।
पूजा आगे बोली—
“आपको पता भी है उस खाने के पीछे क्या था?”
उसने अपने पापा का हाथ पकड़ लिया—
“मेरे पापा ने अपनी पूरी जमा-पूँजी लगा दी… माँ ने पिछले एक साल में अपने लिए कुछ नहीं खरीदा… सिर्फ इसलिए कि मेरी शादी में कोई कमी न रह जाए।”
उसकी आवाज़ काँप रही थी—
“आपको रोटी ठंडी लगी… लेकिन क्या आपको ये महसूस हुआ कि वो रोटी मेरे पापा के सपनों से बनी थी?”
भीड़ में सन्नाटा छा गया।
“आपको मिठाई में स्वाद नहीं आया… क्योंकि उसमें शक्कर नहीं, मेरी माँ की कुर्बानियाँ मिली थीं… जो शायद आपके स्वाद से बड़ी थीं…”
अर्जुन का सिर झुक गया।
पूजा ने सीधे उसकी आँखों में देखा—
“जो इंसान मेरे माता-पिता की इज्जत नहीं समझ सकता… वो मुझे क्या समझेगा?”
हरिशंकर जी ने धीरे से कहा—
“बेटा… बात को इतना मत बढ़ा…”
“नहीं पापा,” पूजा ने उनका हाथ कसकर पकड़ा, “ये छोटी बात नहीं है। आज अगर मैं चुप रही, तो जिंदगी भर चुप रहना पड़ेगा।”
अर्जुन अचानक आगे बढ़ा।
उसने हरिशंकर जी के पैर पकड़ लिए—
“मुझे माफ कर दीजिए अंकल… मुझसे गलती हो गई… मैंने सोचा ही नहीं कि मेरे शब्द इतने चोट पहुँचाएंगे…”
उसकी आँखों से आँसू बह रहे थे—
“मैं वादा करता हूँ… आज के बाद कभी ऐसी गलती नहीं करूँगा।”
तभी अर्जुन के पिता, रामनारायण जी, आगे आए।
उन्होंने पूजा के सिर पर हाथ रखा—
“बेटा… आज तूने हमें सिखा दिया कि बेटी क्या होती है… और उसका सम्मान क्या होता है।”
उन्होंने हाथ जोड़ लिए—
“अगर माफ कर सके… तो इन नादानों को माफ कर दे।”
पूजा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने अपने आँसू पोंछे… और धीरे से कहा—
“एक शर्त पर।”
सब उसकी तरफ देखने लगे।
“मेरे माता-पिता की इज्जत… हमेशा सबसे पहले होगी।”
अर्जुन ने तुरंत कहा—
“मैं वादा करता हूँ।”
पूजा ने अपने पापा की तरफ देखा।
उनकी आँखों में गर्व था।
“जाओ बेटा,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा, “अब मुझे कोई डर नहीं है।”
इस बार पूजा ने गाड़ी का दरवाज़ा खोला… और बैठ गई।
गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ी…
पीछे छूट गया वो आँगन… जहाँ उसने बचपन बिताया था।
लेकिन इस बार…
वो सिर्फ बेटी बनकर नहीं जा रही थी…
बल्कि अपने माता-पिता की इज्जत को साथ लेकर जा रही थी।
और शायद यही एक बेटी की सबसे बड़ी ताकत होती है।

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