भरोसे की डोर
सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही थी। पूजा अपने दोनों बच्चों को तैयार कर रही थी। चेहरे पर थकान थी, लेकिन बच्चों के सामने उसने मुस्कान बनाए रखी थी।
“मम्मी, आज स्कूल नहीं जाना क्या?” छोटे बेटे आरव ने पूछा।
पूजा ने धीरे से कहा, “जाओगे बेटा… बस जल्दी तैयार हो जाओ।”
इतने में दरवाज़े की घंटी बजी। पूजा ने दरवाज़ा खोला तो सामने उसकी सहेली नेहा खड़ी थी।
“अरे पूजा! सब ठीक है ना? तुमने कल फोन पर कुछ ठीक नहीं लग रही थी,” नेहा ने चिंता से पूछा।
पूजा ने नजरें चुराते हुए कहा, “हाँ… सब ठीक है।”
नेहा समझ गई कि कुछ तो बात है।
“देख, मुझसे छुपा मत। क्या हुआ?” उसने हाथ पकड़कर पूछा।
पूजा की आँखों में आँसू आ गए।
“नेहा… मुझे लगता है रोहन मुझे धोखा दे रहा है…”
“क्या?” नेहा चौंक गई।
पूजा ने धीरे-धीरे कहा, “कल रात उसके फोन पर एक लड़की का मैसेज आया… और जब मैंने पूछा तो वो गुस्सा करने लगा। आज सुबह भी जल्दी-जल्दी कहीं निकल गया… बिना कुछ बताए।”
नेहा ने शांत स्वर में कहा, “हो सकता है कोई गलतफहमी हो…”
“नहीं नेहा, अब मुझे इस घर में घुटन महसूस होती है,” पूजा ने कहा।
उसने उसी वक्त फैसला किया—वह बच्चों को लेकर मायके जाएगी।
दोपहर तक पूजा अपने बच्चों के साथ मायके पहुँच गई।
दरवाज़ा उसकी माँ सुशीला ने खोला।
“अरे पूजा! अचानक? सब ठीक तो है?” माँ ने हैरानी से पूछा।
पूजा ने मुस्कुराने की कोशिश की, “हाँ माँ… बस आपकी याद आ रही थी।”
बच्चे दौड़कर नानी से लिपट गए।
“नानी! हम आ गए!” दोनों ने खुशी से कहा।
सुशीला ने प्यार से सिर सहलाया, “खुश रहो मेरे बच्चों… आओ अंदर।”
थोड़ी देर बाद जब बच्चे खेलने लगे, माँ ने धीरे से पूछा,
“अब सच बताओ पूजा… क्या बात है?”
पूजा की आँखें भर आईं।
“माँ… मैं अब उस घर में नहीं रहना चाहती…”
माँ चौंक गईं, “इतनी बड़ी बात! हुआ क्या है?”
पूजा ने सब कुछ बता दिया।
माँ कुछ देर चुप रहीं, फिर बोलीं,
“बेटी, रिश्ते शक से नहीं, भरोसे से चलते हैं… क्या तुमने रोहन से ठीक से बात की?”
पूजा ने सिर झुका लिया, “नहीं…”
“तो पहले बात करो… फैसला बाद में लेना,” माँ ने समझाया।
शाम को रोहन का फोन आया।
“पूजा, तुम कहाँ हो? घर खाली है… बच्चे भी नहीं हैं… क्या हुआ?” उसकी आवाज़ में साफ घबराहट थी।
पूजा ने खुद को संभालते हुए ठंडे स्वर में कहा,
“मैं मायके आ गई हूँ… और अब तुम्हें किसी सफाई की ज़रूरत नहीं है।”
रोहन और ज्यादा परेशान हो गया,
“क्या मतलब है तुम्हारा? अचानक ऐसा क्या हो गया कि तुम बिना बताए चली गई?”
पूजा का गुस्सा अब शब्दों में साफ झलकने लगा,
“जितना समझना है, उतना समझ लो… जिस लड़की से तुम बात करते हो, अब उसी के साथ रहो।”
“पूजा, प्लीज मेरी बात तो सुनो—” रोहन कुछ कहना चाहता था, लेकिन
पूजा ने बिना उसकी बात पूरी सुने ही फोन काट दिया।
रोहन तुरंत ऑफिस से निकला और सीधे पूजा के मायके पहुँचा।
दरवाज़ा पूजा के पिता ने खोला।
“अरे रोहन बेटा, आओ… सब ठीक है?” उन्होंने पूछा।
रोहन ने कहा, “पापा, मुझे पूजा से बात करनी है।”
कमरे में जाकर उसने देखा—पूजा खिड़की के पास खड़ी थी।
“पूजा, क्या हो गया है तुम्हें?” उसने धीरे से पूछा।
पूजा ने गुस्से में कहा, “तुम मुझसे झूठ क्यों बोल रहे हो?”
“मैंने क्या झूठ बोला?” रोहन हैरान था।
“वो लड़की कौन है? जो तुम्हें मैसेज करती है, फोन उठाती है?” पूजा ने सवाल किया।
रोहन कुछ पल चुप रहा, फिर बोला,
“वो मेरे ऑफिस की नई कर्मचारी है… उसका फोन खराब था, इसलिए उसने मेरे फोन से कॉल किया था। और मैसेज… वो काम से जुड़ा था।”
“तो तुमने पहले क्यों नहीं बताया?” पूजा ने आँसू भरी आवाज़ में पूछा।
“गलती मेरी है… मुझे तुम्हें पहले बता देना चाहिए था,” रोहन ने स्वीकार किया।
उसने तुरंत उस लड़की को फोन लगाया और स्पीकर ऑन कर दिया।
“हाँ सर, वो फाइल मैंने भेज दी है,” लड़की ने कहा।
पूजा सब सुन रही थी।
अब उसे अपनी गलती का एहसास हुआ।
उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
“मैंने बिना सोचे-समझे इतना बड़ा फैसला ले लिया…” उसने रोते हुए कहा।
रोहन उसके पास आया,
“गलती हो जाती है… लेकिन हमें एक-दूसरे पर भरोसा रखना चाहिए।”
पूजा ने रोहन का हाथ पकड़ लिया,
“मुझे माफ कर दो… आगे से बिना बात किए कभी ऐसा कदम नहीं उठाऊँगी।”
रोहन मुस्कुराया,
“बस इतना याद रखना—हम साथ हैं, तो हर समस्या छोटी है।”
माँ दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थीं।
उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा,
“यही तो असली रिश्ता है—जहाँ नाराज़गी भी हो, लेकिन प्यार उससे बड़ा हो।”
पूजा और रोहन एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिए।
बच्चे दौड़कर आए और दोनों से लिपट गए।
घर में फिर से खुशियाँ लौट आईं।
सीख:
रिश्तों में सबसे मजबूत चीज़ “भरोसा” होता है। अगर हम बिना समझे शक करने लगें, तो अपने ही रिश्ते को कमजोर कर देते हैं। इसलिए किसी भी फैसले से पहले बात करना बहुत जरूरी है।

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