वो व्रत जो किसी ने देखा ही नहीं

Indian couple celebrating Karwa Chauth with emotional moment under moonlight on rooftop


“भाभी, सच बताना… आपको ये सब व्रत-उपवास सच में अच्छे लगते हैं या बस निभाने के लिए करती हो?”

ननद कृति ने हंसते हुए पूछा।


नेहा थोड़ी देर चुप रही, फिर मुस्कुराकर बोली,

“अच्छे लगें या ना लगें… कुछ चीज़ें दिल से जुड़ जाती हैं।”


नेहा की शादी को अभी छह महीने ही हुए थे। घर में पहली बार करवाचौथ आने वाला था। सास बहुत उत्साहित थीं।


“इस बार तो पूरे रीति-रिवाज से होगा… हमारी बहू की पहली करवाचौथ है,” उन्होंने सबको बताते हुए कहा।


नेहा सब देख-सुन रही थी, पर उसके मन में एक अलग ही ख्याल चल रहा था।


रात को उसने अपने पति आरव से पूछा,

“अगर मैं व्रत ना रखूं तो… तुम्हें बुरा लगेगा?”


आरव ने बिना सोचे कहा,

“बिल्कुल नहीं। मैं चाहता हूं तुम जो भी करो, अपनी मर्जी से करो… किसी दबाव में नहीं।”


नेहा ने राहत की सांस ली,

“थैंक यू… मैं बस ये समझना चाहती थी कि ये सब ज़रूरी है या नहीं।”


करवाचौथ का दिन आ गया।


घर में सुबह से ही हलचल थी। सास ने सरगी दी, पड़ोस की औरतें आईं, हंसी-मज़ाक, तैयारियां… सब कुछ वैसा ही था जैसा हर साल होता है।


लेकिन एक फर्क था—

नेहा ने व्रत नहीं रखा।


वो पूरे दिन सबके साथ रही, काम भी किया, हंसी भी… पर बिना भूखे-प्यासे रहे।


शाम को जब सब औरतें तैयार होकर पूजा के लिए जा रही थीं, सास ने पूछा,

“नेहा, तुम तैयार नहीं हुई?”


नेहा ने धीरे से कहा,

“मम्मी जी… मैंने व्रत नहीं रखा।”


सास के चेहरे का रंग बदल गया,

“क्या मतलब? पहली करवाचौथ है तुम्हारी!”


“मम्मी जी, मैं झूठा व्रत नहीं रखना चाहती थी। अगर रखती तो मन से नहीं रख पाती…”


घर में एक अजीब सा सन्नाटा छा गया।


कृति ने धीरे से कहा,

“भाभी… इतना भी क्या अलग बनना है?”


नेहा ने शांत आवाज़ में जवाब दिया,

“अलग बनने के लिए नहीं… सच्चा रहने के लिए।”


सबको लगा अब घर में बड़ा झगड़ा होगा।


लेकिन तभी आरव आगे आया और बोला,

“मम्मी, मैंने ही नेहा से कहा था कि वो वही करे जो उसे सही लगे।”


“तो तुम भी यही सिखा रहे हो उसे?” सास ने नाराज़ होकर कहा।


आरव ने मुस्कुराते हुए कहा,

“नहीं मम्मी… मैं बस ये सिखा रहा हूं कि रिश्ता व्रत से नहीं, भरोसे से चलता है।”


रात हो गई। छत पर सब औरतें चांद का इंतज़ार कर रही थीं। नेहा भी वहां खड़ी थी—पर बिना थाली, बिना छलनी।


सब उसे अलग नजरों से देख रहे थे।


तभी चांद निकल आया। सभी ने अपने-अपने पतियों के लिए पूजा की, व्रत खोला।


नेहा बस चुपचाप आसमान देख रही थी।


तभी अचानक आरव उसके पास आया और उसके हाथ में पानी का गिलास देते हुए बोला,

“लो, अब तुम भी पानी पी लो।”


नेहा ने हैरानी से पूछा,

“मैं? पर मैंने तो व्रत नहीं रखा…”


आरव ने धीरे से कहा,

“तुमने नहीं रखा… पर मैंने रखा है।”


नेहा एकदम चौंक गई,

“क्या?”


आरव ने मुस्कुराकर कहा,

“सुबह से कुछ नहीं खाया। सोचा, अगर व्रत का मतलब किसी की लंबी उम्र और खुशी की दुआ है… तो मैं भी कर सकता हूं।”


नेहा की आंखें भर आईं,

“पर तुमने बताया क्यों नहीं?”


“क्योंकि ये दिखाने के लिए नहीं था… महसूस करने के लिए था।”


पास खड़ी सास ये सब सुन रही थीं।


उन्होंने पहली बार महसूस किया कि व्रत का मतलब सिर्फ परंपरा नहीं… भावना भी है।


नेहा ने कांपते हाथों से पानी का गिलास लिया और बोली,

“तो चलो… आज हम दोनों साथ में व्रत खोलते हैं—तुम्हारे तरीके से, मेरे तरीके से नहीं।”


दोनों ने एक-दूसरे को पानी पिलाया।


ना कोई पूजा थी, ना कोई मंत्र…

फिर भी उस पल में एक सच्चाई थी, जो शायद किसी भी रिवाज़ से बड़ी थी।


सास धीरे-धीरे उनके पास आईं।


कुछ पल चुप रहीं… फिर बोलीं,

“शायद… हर परंपरा को निभाने का तरीका बदल सकता है, पर उसका मतलब नहीं बदलना चाहिए।”


नेहा ने उनके पैर छुए।


सास ने उसे उठाकर गले लगा लिया।


उस रात किसी ने व्रत की चर्चा नहीं की…

पर सबके मन में एक नई सोच ज़रूर जन्म ले चुकी थी।




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