समझ का एक दिन
सुमित्रा देवी गैस के सामने खड़ी थीं। एक हाथ से सब्ज़ी चला रही थीं और दूसरे हाथ से कमर पकड़कर दर्द सह रही थीं। चेहरे पर थकान थी, लेकिन आदत के अनुसार काम रुक नहीं रहा था।
“माँ जी, आप बैठ क्यों नहीं जातीं?”
दरवाज़े पर खड़ी नंदिनी ने धीरे से कहा।
सुमित्रा देवी ने बिना पीछे देखे जवाब दिया—
“अरे रहने दे बहू… तू ऑफिस से अभी आई है। जा, आराम कर।”
नंदिनी कुछ पल वहीं खड़ी रही। रोज़ यही जवाब मिलता था।
शादी को दो साल हो गए थे, लेकिन सुमित्रा देवी को हमेशा लगता था कि नौकरी करने वाली बहुएँ घर को उतना महत्व नहीं देतीं।
नंदिनी ने बैग एक तरफ रखा, दुपट्टा ठीक किया और चुपचाप किचन में आ गई।
“मैं सब्ज़ी बना देती हूँ,” उसने गैस की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कहा।
“नहीं-नहीं… तू रहने दे,” सुमित्रा देवी ने हल्का सा रोकते हुए कहा, “तुम लोगों को ये सब कहाँ आता है?”
यह सुनकर नंदिनी के चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आई, लेकिन आँखों में एक चुभन भी थी।
उसने कुछ नहीं कहा।
बस सिंक में पड़े बर्तन उठाकर धोने लगी।
धीरे-धीरे उसने पूरे किचन को संभाल लिया—सब्ज़ी बन गई, दाल चढ़ गई, रोटियों का आटा गूंध लिया।
सुमित्रा देवी चुपचाप उसे देखती रहीं।
उन्हें उम्मीद थी कि बहू थोड़ी देर में थककर छोड़ देगी, लेकिन नंदिनी बिना रुके काम करती रही।
शाम होते-होते सुमित्रा देवी को चक्कर आने लगे।
“माँ जी!”
नंदिनी ने तुरंत उन्हें पकड़ लिया और सोफे पर बैठाया।
“कुछ नहीं… बस हल्का सा चक्कर है,” सुमित्रा देवी बोलीं, लेकिन उनकी आवाज़ कमजोर थी।
नंदिनी ने तुरंत पानी दिया, दवाई लाई और उनके पैरों के नीचे तकिया रख दिया।
“आपने फिर दवाई टाइम पर नहीं ली ना?” उसने हल्की नाराज़गी में पूछा।
सुमित्रा देवी चुप रहीं।
नंदिनी ने उनके पैर दबाने शुरू कर दिए।
उसके हाथों में अपनापन था—कोई दिखावा नहीं, कोई मजबूरी नहीं।
उसी समय नंदिनी का फोन बजा।
“हाँ भैया…” उसने कॉल उठाई।
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“माँ की तबीयत ठीक नहीं है। डॉक्टर के पास ले जाना है… अगर तू आ सके तो…”
नंदिनी का दिल घबरा गया।
उसने एक पल को आँखें बंद कीं… फिर धीरे से बोली—
“भैया… आज नहीं आ पाऊँगी। यहाँ माँ जी की तबीयत भी ठीक नहीं है। मैं कल सुबह आ जाऊँगी।”
फोन रखते ही उसकी आँखें भर आईं।
उसने तुरंत चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
लेकिन इस बार… सुमित्रा देवी सब देख चुकी थीं।
रात को खाना खाते समय सुमित्रा देवी असामान्य रूप से चुप थीं।
आज उनकी नज़रें बार-बार नंदिनी पर ठहर रही थीं।
पहली बार उन्होंने उसे सच में ध्यान से देखा—
वह खुद बेहद थकी हुई थी, चेहरे पर दिनभर की थकान साफ झलक रही थी…
फिर भी बिना रुके पूरे घर को संभाल रही थी।
सुमित्रा देवी के मन में कुछ हल्का-सा पिघलने लगा।
उन्होंने धीमे स्वर में पुकारा—
“बहू…”
नंदिनी तुरंत सतर्क होकर बोली—
“जी माँ जी?”
सुमित्रा देवी ने एक पल ठहरकर उसकी ओर देखा, फिर नरम आवाज़ में कहा—
“तेरी माँ की तबीयत खराब है… तू कल नहीं, अभी चली जा।”
नंदिनी एकदम चौंक गई—
“नहीं माँ जी, आप अकेली कैसे—”
“मैं ठीक हूँ,” सुमित्रा देवी ने उसकी बात बीच में ही रोक दी।
“और अगर तू नहीं गई ना… तो मुझे सच में अच्छा नहीं लगेगा।”
उनकी आवाज़ में इस बार आदेश कम, अपनापन ज्यादा था।
नंदिनी की आँखें भर आईं।
उसे समझ आ गया था—
आज पहली बार माँ जी ने उसे रोका नहीं…
बल्कि सच में समझा है।
अगली सुबह सुमित्रा देवी खुद जल्दी उठीं।
उन्होंने नंदिनी के लिए नाश्ता बनाया, टिफिन पैक किया और उसके हाथ में पैसे रख दिए।
“ये क्या है माँ जी?” नंदिनी ने पूछा।
“रास्ते में कुछ खा लेना… और सुन,”
उन्होंने उसके सिर पर हाथ रखते हुए कहा—
“वहाँ बेटी बनकर रहना… यहाँ बहू बनकर नहीं।”
नंदिनी रो पड़ी।
“माँ जी… मैं दोनों घरों की हूँ।”
सुमित्रा देवी मुस्कुरा दीं—
“अब समझ में आ गया है मुझे।”
कुछ दिनों बाद…
मोहल्ले में एक दिन किसी ने पूछा—
“सुमित्रा जी, आपकी बहू तो नौकरी करती है ना? फिर घर कैसे संभाल लेती है?”
सुमित्रा देवी मुस्कुराईं और बोलीं—
“वो सिर्फ नौकरी नहीं करती… वो रिश्ते निभाना भी जानती है।”
सीख ❤️
घर सिर्फ काम से नहीं चलता,
और रिश्ते सिर्फ नाम से नहीं बनते।
समझ, भरोसा और थोड़ा सा प्यार—
बस यही काफी होता है
किसी को “बहू” से “बेटी” बनाने के लिए।

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