खामोशी का जवाब
घर के आँगन में आज भी वही सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन इस सन्नाटे के पीछे बहुत सारी अनकही बातें दबकर रह गई थीं।
कविता चुपचाप चौकी पर बैठी कपड़े तह कर रही थी। उसके चेहरे पर थकान साफ दिख रही थी, पर आंखों में एक अजीब-सी मजबूती भी थी—जैसे उसने खुद को हर दर्द के साथ जीना सिखा लिया हो।
करीब डेढ़ साल पहले उसके पति निखिल का हार्ट अटैक से अचानक निधन हो गया था। सब कुछ इतनी जल्दी हुआ कि किसी को संभलने का मौका ही नहीं मिला।
घर में ससुर रमेश जी और सास शारदा जी थे, जिनकी तबीयत पहले से ही ठीक नहीं रहती थी। साथ ही कविता की एक दस साल की बेटी—रानी।
निखिल के जाने के बाद सब कुछ जैसे कविता के कंधों पर आ गिरा।
उसके मायके वालों ने बहुत कहा, “बेटा, हमारे साथ चल… अकेले कैसे संभाल पाएगी सब?”
लेकिन कविता ने साफ मना कर दिया।
“मां-पापा, अगर मैं भी चली गई, तो इनका क्या होगा? ये लोग तो बिल्कुल अकेले हो जाएंगे।”
उस दिन के बाद से कविता ने खुद को पूरी तरह इस घर में झोंक दिया।
शुरू में तो जो थोड़ी बहुत बचत थी, उसी से घर चलता रहा। लेकिन धीरे-धीरे खर्च बढ़ने लगे—दवाइयाँ, स्कूल की फीस, राशन…
आखिरकार रमेश जी ने ही एक दिन कहा, “बेटा, अब तुम्हें कुछ काम शुरू करना पड़ेगा… हम कब तक ऐसे चल पाएंगे?”
कविता ने बिना देर किए पास के एक ट्यूशन सेंटर में बच्चों को पढ़ाना शुरू कर दिया।
सुबह से रात तक उसका दिन जैसे मशीन बन गया था— घर का काम, सास-ससुर की सेवा, बेटी की पढ़ाई, और फिर बच्चों को पढ़ाना।
कमाई ज्यादा नहीं थी—महीने के करीब 20,000 रुपए।
पर उसी में वो सब संभाल रही थी।
इसी बीच एक और परेशानी धीरे-धीरे घर में दाखिल हो रही थी—निखिल की बहन, रीना।
रीना का स्वभाव शुरू से ही थोड़ा तुनकमिजाज और स्वार्थी था। शादी के बाद भी उसका मायके आना-जाना लगा रहता था।
शुरू में तो वह कविता के लिए सहानुभूति दिखाती थी।
“भाभी, आप कितना सब कुछ अकेले संभाल रही हो…”
लेकिन समय के साथ उसका रवैया बदलने लगा।
वो हर बार आते ही अलमारी, बक्से, और सामान पर नजर डालती।
एक दिन उसने अचानक पूछा, “भाभी, मम्मी के गहने कहाँ हैं?”
कविता ने सहजता से कहा, “दीदी, उनकी तबीयत खराब थी ना… इलाज में काफी कुछ खर्च हो गया…”
रीना ने बात वहीं खत्म नहीं की।
धीरे-धीरे उसने रिश्तेदारों के बीच बातें फैलानी शुरू कर दीं।
“मम्मी के पास तो बहुत गहने थे… पता नहीं कहाँ गए…” “जब से भाभी अकेली रह रही हैं, तब से सब गायब हो रहा है…”
कुछ लोग सुनकर चुप रहते, तो कुछ उसकी बातों में आ जाते।
कविता तक भी ये बातें पहुँचती थीं।
लेकिन वह हर बार खुद को रोक लेती।
“घर की बात घर में ही रहनी चाहिए…”
वह सोचकर चुप रह जाती।
पर एक दिन हद हो गई।
रीना अपने पति और कुछ रिश्तेदारों के साथ आई हुई थी।
बातों-बातों में उसने अचानक कविता के मायके वालों के सामने ही कह दिया—
“अच्छा किया आप लोग अपनी बेटी को यहीं छोड़ गए… वरना ये सब कैसे करती? वैसे भी, खाली हाथ थोड़ी आई थी… कुछ लेकर ही जाएगी।”
कविता के माता-पिता यह सुनकर सन्न रह गए।
कविता का दिल जैसे चीर गया।
आज तक उसने अपने लिए कुछ नहीं कहा था, लेकिन अपने माता-पिता के लिए ये सब सुनना उसके बस के बाहर था।
वो धीरे से उठी… और सीधे रीना के सामने आकर खड़ी हो गई।
“दीदी, बहुत हो गया…”
उसकी आवाज़ धीमी थी, लेकिन उसमें एक अजीब-सी ताकत थी।
“मैं चुप थी… क्योंकि मैं घर की इज्जत बचाना चाहती थी… लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि आप कुछ भी कहें और मैं सुनती रहूं।”
रीना हँसते हुए बोली, “तो क्या कर लोगी तुम?”
कविता ने उसकी आँखों में देखते हुए कहा, “आपको सच जानना है ना? तो अपने पापा से पूछ लीजिए… गहने कहाँ गए।”
इतना सुनते ही सबकी नजरें रमेश जी की तरफ चली गईं, जो थोड़ी दूरी पर खड़े सब कुछ सुन रहे थे।
वो धीरे-धीरे आगे आए।
उनके चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था।
“रीना, आज मैं भी सबके सामने सच बता देता हूँ।”
“तुम्हारी माँ के इलाज में जो गहने थे, वो मैंने खुद बेचे थे।”
रीना चौंक गई।
“पापा… आपने…?”
“हाँ, मैंने। क्योंकि उस वक्त तुम कहीं नजर नहीं आई थी। ना फोन, ना मदद।”
रमेश जी की आवाज़ अब भारी हो चुकी थी।
“और जिस बहू पर तुम इल्जाम लगा रही हो, उसी ने इस घर को संभाला है… हमें संभाला है… तुम्हारी भाभी ने कभी अपने लिए कुछ नहीं माँगा।”
पूरा माहौल शांत हो गया।
रीना के पास अब कहने के लिए कुछ नहीं था।
वो चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी रही।
रमेश जी ने आगे कहा—
“और एक बात सुन लो… इस घर पर हक सबसे पहले उसी का है जिसने इसे संभाला है… ना कि उसका जो सिर्फ लेने के लिए आता है।”
उस दिन के बाद रीना का मायके आना लगभग बंद हो गया।
कविता ने फिर कभी इस बात को नहीं उठाया।
वो आज भी वैसे ही सब संभाल रही थी—चुपचाप, लेकिन मजबूती के साथ।
सच है…
जो लोग खामोशी को कमजोरी समझते हैं,
उन्हें एक दिन उसी खामोशी का जवाब जरूर मिलता है।

Post a Comment