खामोशी का जवाब
सुबह के 7 बजे थे। घर में अलार्म नहीं, बल्कि ऊँची आवाज़ें गूंज रही थीं।
“कितनी बार कहा है, मेरे कपड़े अलग रखा कर! समझ नहीं आता तुझे?”
कमला देवी की तेज़ आवाज़ पूरे घर में फैल गई।
नेहा अलमारी के सामने खड़ी थी। हाथ रुके हुए थे, लेकिन चेहरा शांत था।
“माँजी, मैंने अलग ही रखा था… शायद—”
“मुझसे झूठ मत बोल!” कमला देवी ने बात काट दी।
“तू चाहती ही नहीं कि मैं ठीक से रहूं!”
हॉल में बैठे रोहन ने अखबार नीचे रखा।
“माँ, आप हर बात पर नेहा को क्यों डांटती रहती हैं?”
“क्योंकि ये गलत है!” कमला देवी बोलीं।
रोहन चिढ़ गया। “गलत है या आपको बस शिकायत करनी है?”
माहौल गरम हो गया।
तभी नेहा ने धीरे से कहा—
“आप ऑफिस के लिए लेट हो रहे हैं रोहन… मैं संभाल लूंगी।”
रोहन चुपचाप चला गया… लेकिन उसके मन में गुस्सा भरा हुआ था।
नेहा की अजीब आदत...
पड़ोस में अक्सर फुसफुसाहटें सुनाई देती थीं—
“नेहा कितनी चुप रहती है…”
“इतनी बातें सहकर भी कभी जवाब नहीं देती!”
लोग उसे समझने की बजाय बस उसके बारे में बातें करते थे।
लेकिन एक बात ऐसी थी, जिस पर किसी की नज़र नहीं गई।
हर दिन, चाहे कितना भी व्यस्त या मुश्किल क्यों न हो…
नेहा कुछ पल अपने लिए ज़रूर निकालती थी।
वह अपनी छोटी-सी डायरी खोलती, पेन उठाती…
और चुपचाप उसमें कुछ लिख देती।
ये उसकी आदत नहीं, उसकी ताकत थी—
जिसे कोई देख नहीं पाया।
बीमारी का सच...
कमला देवी पहले ऐसी बिल्कुल नहीं थीं।
वो हँसमुख स्वभाव की थीं—घर में हर समय उनकी हँसी गूंजती रहती थी। छोटी-छोटी बातों में खुशी ढूंढ लेना उनकी आदत थी, और पूरे परिवार को साथ लेकर चलना उन्हें बहुत अच्छे से आता था।
लेकिन पिछले एक साल में सब कुछ धीरे-धीरे बदलने लगा। उनका स्वभाव पहले जैसा नहीं रहा।
डॉक्टर ने समझाते हुए कहा था—
“उम्र बढ़ने के साथ याददाश्त और व्यवहार में बदलाव आना आम बात है। ऐसे में इंसान जल्दी चिड़चिड़ा हो जाता है और कई बार बिना वजह शक भी करने लगता है।”
अब कमला देवी छोटी-छोटी बातों पर गुस्सा करने लगी थीं।
कई बार चीजें रखकर भूल जातीं, और फिर उसी बात पर दूसरों पर शक करने लगतीं।
उनका यह बदलता व्यवहार पूरे घर के लिए एक नई चुनौती बन गया था।
एक दिन… बड़ा हंगामा...
उस दिन घर में रिश्तेदार आए हुए थे।
सब बैठे थे कि अचानक कमला देवी बाहर आईं।
“मेरी सोने की चेन कहाँ है?” उन्होंने जोर से पूछा।
सब चौंक गए।
“नेहा! तूने ही ली है न?” उन्होंने सीधे आरोप लगा दिया।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
रोहन गुस्से में खड़ा हो गया—
“माँ! ये क्या कह रही हैं आप?”
नेहा कुछ सेकंड चुप रही…
फिर बोली—
“अगर आपको लगता है मैंने ली है… तो मैं ढूंढ देती हूँ।”
उसने पूरे घर में चेन ढूंढी… और आखिर में वही चेन कमला देवी के पुराने बैग में मिल गई।
सबकी नजरें झुक गईं।
लेकिन नेहा ने कुछ नहीं कहा।
सच सामने आया...
रात को रोहन ने गुस्से में कहा—
“बस! अब मैं माँ को कहीं और शिफ्ट कर दूंगा। ये रोज़ का ड्रामा मैं नहीं झेल सकता!”
नेहा ने अपनी डायरी उठाई।
“पहले ये पढ़ लो…”
रोहन ने डायरी खोली।
उसमें हर दिन की एक लाइन लिखी थी—
👉 “आज माँजी ने मुझे डांटा… लेकिन सुबह उन्होंने मुझे ‘बेटी’ कहा था।”
👉 “आज उन्होंने मुझ पर शक किया… लेकिन दोपहर में पूछा कि मैंने खाना खाया या नहीं।”
👉 “आज उन्होंने गुस्सा किया… लेकिन शाम को मेरे सिर पर हाथ रखा।”
रोहन की आँखें भर आईं।
“तुम ये सब क्यों लिखती हो?”
नेहा मुस्कुराई—
“ताकि मैं ये याद रख सकूं कि वो सिर्फ बुरी नहीं हैं…”
“वो बस… बीमार हैं।”
“अगर मैं हर दिन सिर्फ उनकी बुरी बातें याद रखूं… तो मैं उनसे नफरत करने लगूंगी,” नेहा बोली।
“इसलिए मैं उनकी अच्छी बातें लिख लेती हूँ… ताकि मेरा नजरिया ना बदले।”
रोहन चुप हो गया।
उसने पहली बार अपनी माँ को उस नजर से देखा—
एक बीमार इंसान… न कि एक गुस्सैल औरत।
उस दिन के बाद घर में कुछ बदल गया।
कमला देवी अब भी कभी-कभी चिल्लाती थीं…
लेकिन अब नेहा अकेली नहीं थी।
रोहन भी हर रात डायरी में एक लाइन लिखने लगा।
👉 “आज माँ ने गुस्सा किया… लेकिन वो मेरी माँ हैं।”
सीख:
👉 “रिश्ते शब्दों से नहीं, नजरिए से टूटते हैं।”
👉 “अगर आप सिर्फ बुरा देखेंगे, तो प्यार कभी दिखेगा ही नहीं।”

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