झूठ में छिपा सच्चा रिश्ता
शाम ढल रही थी…
बैंक बंद होने का समय करीब था। कर्मचारी अपने-अपने काम समेट रहे थे। तभी दरवाज़े से एक दुबली-पतली बुज़ुर्ग महिला अंदर आई। सिर पर पुराना सा दुपट्टा, पैरों में घिसी चप्पल और हाथ में एक पुरानी थैली।
वो धीरे-धीरे काउंटर तक पहुँची और बोली— “बेटा… ज़रा ये पासबुक देख देगा? मेरे बेटे का पैसा आया क्या?”
काउंटर पर बैठे लड़के ने बिना देखे ही कहा— “अम्मा, रोज-रोज मत आया करो… जब आएगा तब बता देंगे।”
इतना सुनकर अम्मा की आँखें बुझ सी गईं। वो चुपचाप एक कोने में बैठ गईं।
तभी बैंक के नए मैनेजर अमित की नजर उन पर पड़ी।
वो तुरंत उनके पास गया— “अम्मा जी, आप यहाँ बैठी क्यों हैं? आइए, मैं देखता हूँ।”
अम्मा ने उम्मीद से पासबुक आगे बढ़ाई— “मेरा बेटा रोहन… शहर से बाहर काम करता है। बोला था हर महीने पैसे भेजेगा…”
अमित ने पासबुक खोली… कुछ पल चुप रहा… फिर मुस्कुराकर बोला— “हाँ अम्मा, पैसे आ गए हैं।”
उसने अपनी जेब से 3000 रुपये निकाले और उनके हाथ में रख दिए।
अम्मा की आँखों में चमक आ गई— “भगवान तेरा भला करे बेटा…”
उस दिन के बाद ये रोज़ का सिलसिला बन गया।
हर महीने अम्मा आतीं… और अमित उन्हें अपनी जेब से पैसे देता।
बाकी कर्मचारी हैरान रहते।
एक दिन कैशियर ने पूछ ही लिया— “सर, आप ये सब क्यों कर रहे हैं? उनके बेटे ने तो कभी पैसा भेजा ही नहीं…”
अमित ने धीमे से कहा— “उनका बेटा एक साल पहले गुजर गया… मैंने खुद खबर पढ़ी थी। लेकिन मैं कैसे बताऊँ उन्हें? उनकी दुनिया ही टूट जाएगी…”
सब चुप हो गए।
समय बीतता गया…
लेकिन एक महीने अम्मा नहीं आईं।
अमित बेचैन हो गया।
दूसरे दिन भी नहीं…
तीसरे दिन भी नहीं…
आख़िरकार वो उनके घर पहुँच गया।
दरवाज़ा आधा खुला था।
अंदर अम्मा चारपाई पर लेटी थीं… बहुत कमजोर… साँसें धीमी…
अमित घबराकर बोला— “अम्मा! आप बैंक क्यों नहीं आईं? मैं परेशान हो गया था…”
अम्मा ने हल्की मुस्कान के साथ उसे पास बुलाया— “आ गया तू… मुझे पता था तू आएगा…”
फिर उन्होंने धीरे से कहा— “बेटा… ज़रा वो बक्सा निकाल दे… चारपाई के नीचे रखा है…”
अमित ने बक्सा निकाला… खोला…
और जैसे ही ढक्कन उठा…
वो सन्न रह गया…
उस बक्से में वही सारे पैसे रखे थे… जो अमित हर महीने देता था।
एक भी नोट खर्च नहीं हुआ था।
अमित की आँखें भर आईं— “अम्मा… आपने ये पैसे खर्च क्यों नहीं किए?”
अम्मा ने उसका हाथ पकड़ा— “क्योंकि बेटा… मुझे पैसों की ज़रूरत नहीं थी…”
अमित हैरान— “फिर आप बैंक क्यों आती थीं?”
अम्मा की आँखों से आँसू बहने लगे— “मैं पहले दिन से जानती थी कि मेरा रोहन अब इस दुनिया में नहीं है…”
अमित का दिल जोर से धड़कने लगा— “आपको… पता था?”
“हाँ बेटा… उसकी आखिरी चिट्ठी मेरे पास है… जिसमें उसने लिखा था कि वो बहुत बीमार है…”
अमित चुप हो गया।
अम्मा ने आगे कहा— “जिस दिन तूने पहली बार झूठ बोला… और अपनी जेब से पैसे दिए… उस दिन मुझे तुझमें मेरा रोहन दिखाई दिया…”
“मैं पैसे लेने नहीं आती थी बेटा… मैं तुझे देखने आती थी…”
अमित के आँसू रुक नहीं रहे थे।
अम्मा ने कहा— “तेरी वो चिंता… वो अपनापन… मुझे ऐसा लगता था जैसे मेरा बेटा अभी भी मेरे साथ है…”
“ये पैसे रख ले बेटा… ये तेरे हैं…”
“और मुझे माफ कर देना… मैंने भी तुझसे सच छुपाया…”
अमित घुटनों के बल बैठ गया— “अम्मा… ऐसा मत कहो… आपने मुझे माँ का प्यार दिया है…”
अम्मा ने कांपते हाथों से उसका सिर सहलाया— “अब तू ही मेरा बेटा है…”
उस दिन…
अमित ने बक्सा बंद कर दिया…
और अम्मा को गले लगा लिया।
कुछ रिश्ते खून से नहीं बनते…
वो बनते हैं इंसानियत से…
उस दिन एक झूठ बोला गया था…
लेकिन उसी झूठ ने एक माँ को बेटा दे दिया…
और एक बेटे को माँ…
सीख: दुनिया में सबसे मजबूत रिश्ता वो होता है… जो दिल से बनता है, नाम से नहीं।

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