अपने हिस्से की थाली
घर में आज फिर वही भागदौड़ थी, लेकिन चेहरे पर थकान पहले से ज्यादा गहरी थी।
निशा रसोई में खड़ी थी। गैस पर दाल चढ़ी थी, दूसरी तरफ सब्ज़ी बन रही थी, और हाथों में आटा गूंथते हुए वह बार-बार घड़ी देख रही थी। बच्चों का स्कूल, सास-ससुर की दवाइयाँ, पति के ऑफिस का टिफिन—सब कुछ जैसे उसी के इर्द-गिर्द घूम रहा था।
रसोई से निकलकर वह कमरे में गई—
“माँजी, आपकी दवाई रख दी है टेबल पर।”
“हूँ…” बस इतना जवाब आया।
“पापा जी, आपकी चाय टेबल पर रख दी है…”
पापा जी ने कप उठाकर एक घूंट लिया, फिर भौंहें सिकोड़ते हुए बोले—
“अरे, ये तो ठंडी हो गई है… ज़रा गरम करके ले आओ।”
निशा ने हल्के से सिर हिलाया—
“जी…”
और बिना कुछ कहे, चुपचाप कप उठाकर फिर से रसोई की ओर लौट गई।
इतने में पति रोहित की आवाज आई—
“निशा! मेरा टिफिन हुआ या नहीं? मुझे देर हो रही है!”
“बस अभी…” उसने जल्दी से रोटी सेंकी और टिफिन पैक कर दिया।
रोहित बिना उसकी तरफ देखे ही टिफिन लेकर निकल गया।
दरवाज़ा बंद हुआ तो निशा ने एक पल को दीवार का सहारा लिया…
सांसें तेज़ चल रही थीं… लेकिन काम अभी भी बाकी था।
रसोई में वापस आकर उसने सोचा—
“चलो, अब थोड़ी देर बैठकर खा लेती हूँ…”
उसने अपने लिए प्लेट में दो रोटियाँ और थोड़ी सब्ज़ी रखी ही थी कि तभी दरवाज़े की घंटी बज गई।
“अरे, अब कौन आ गया?”
दरवाज़ा खोला तो सामने पड़ोस की रीना खड़ी थी।
“अरे निशा! आज हमारी सोसाइटी में मीटिंग है, तू भी आ जाना।”
“हाँ… देखती हूँ…” निशा ने हल्की मुस्कान दी।
रीना चली गई।
निशा वापस किचन में आई…
प्लेट वहीं रखी थी… लेकिन रोटियाँ गायब थीं।
सासू माँ आराम से बैठकर खा रही थीं—
“अच्छा बनाया है आज… और बना लेना, भूख लग रही थी।”
निशा ने कुछ नहीं कहा… बस चुपचाप खाली प्लेट उठाकर सिंक में रख दी।
उसने पानी पिया… और फिर काम में लग गई।
दिन ऐसे ही निकलते रहे।
निशा की आदत बन गई थी—
सबको खिलाना… खुद को भूल जाना।
कभी बच्चों के बचे हुए टुकड़े खा लेना,
कभी सिर्फ चाय पीकर रह जाना।
और धीरे-धीरे उसका शरीर जवाब देने लगा।
एक दिन…
निशा कपड़े सुखाने छत पर गई थी।
अचानक उसकी आँखों के आगे अंधेरा छा गया…
हाथ से कपड़ों की टोकरी छूट गई…
और वह वहीं गिर पड़ी।
नीचे से बेटे ने देखा—
“मम्मी…!!!”
घर में अफरा-तफरी मच गई।
रोहित ऑफिस से दौड़ता हुआ आया।
निशा को तुरंत अस्पताल ले जाया गया।
डॉक्टर ने जांच के बाद कहा—
“इनका शरीर बहुत कमजोर हो चुका है…
हीमोग्लोबिन बहुत कम है…
ब्लड प्रेशर लो है…
और सबसे बड़ी बात—इन्होंने ठीक से खाना ही नहीं खाया है।”
रोहित चौंक गया—
“क्या मतलब?”
डॉक्टर ने गंभीर होकर कहा—
“मतलब ये कि ये खुद को सबसे आखिरी में रखती रही हैं…
और अब शरीर ने जवाब दे दिया है।”
अस्पताल के कमरे में निशा चुपचाप लेटी थी।
रोहित उसके पास बैठा था…
पहली बार उसने गौर से निशा को देखा—
कमजोर चेहरा…
सूखी हुई हथेलियाँ…
और आँखों के नीचे काले घेरे…
उसे याद आने लगा—
कितनी बार निशा ने कहा था—
“थोड़ा बैठ जाओ, साथ में खा लेते हैं…”
और हर बार उसने कहा—
“तुम खा लो, मुझे देर हो रही है…”
रोहित की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से निशा का हाथ पकड़ा—
“माफ़ कर दो… मैंने कभी ध्यान ही नहीं दिया…”
निशा ने हल्की मुस्कान दी—
“कोई बात नहीं… आदत हो गई थी…”
“नहीं… अब ये आदत बदलनी होगी,” रोहित ने दृढ़ता से कहा।
कुछ दिनों के इलाज के बाद निशा घर लौटी।
दरवाज़ा खुला…
और वह रुक गई।
घर साफ-सुथरा था…
रसोई सजी हुई थी…
सब कुछ व्यवस्थित…
“ये सब…?” उसने आश्चर्य से पूछा।
रोहित मुस्कुराया—
“हम सबने मिलकर किया है…”
सासू माँ भी पास आईं—
“बहू… हमें माफ़ कर दे… हमने कभी सोचा ही नहीं कि तू खुद कब खाती है…”
निशा की आँखें भर आईं।
रोहित रसोई में गया और एक प्लेट लेकर आया—
“ये तुम्हारे लिए है…”
प्लेट में गरम रोटियाँ, सब्ज़ी और सलाद सजा हुआ था।
“पहले तुम खाओगी… फिर बाकी सब खाएँगे,” उसने कहा।
निशा ने हिचकिचाते हुए पूछा—
“और आप लोग?”
“हम इंतज़ार करेंगे,” रोहित ने मुस्कुराते हुए कहा।
निशा की आँखों से आँसू बह निकले…
लेकिन इस बार ये दर्द के नहीं…
खुशी के आँसू थे।
उसने पहली बार बिना किसी जल्दबाज़ी के…
अपनी पूरी थाली… अपने लिए खाई।
उस दिन के बाद घर का नियम बदल गया—
अब रसोई सिर्फ निशा की जिम्मेदारी नहीं थी…
सब मिलकर काम करते थे…
और सबसे जरूरी बात—
अब निशा की थाली कभी खाली नहीं रहती थी।
सीख:
जब तक इंसान खुद को महत्व नहीं देता, दुनिया भी उसे हल्के में लेने लगती है।
अपनी देखभाल करना कोई स्वार्थ नहीं, बल्कि ज़रूरी है।

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