औकात नहीं, एहसास बड़ा होता है
सुबह का वक्त था, लेकिन आज घर में एक अलग सी हलचल थी।
आँगन में झाड़ू लग चुकी थी, दरवाज़े पर पानी का छींटा दिया गया था, और तुलसी के पास दिया जल रहा था।
रामप्रसाद जी बार-बार घड़ी देख रहे थे।
“अरे भाग्यवान, बस का टाइम तो हो गया… कहीं बस लेट तो नहीं हो गई?” उन्होंने चिंता से कहा।
रसोई से आवाज आई—
“आप चिंता मत कीजिए, आपकी लाडली आ ही जाएगी। मैंने उसकी पसंद का हलवा भी बना लिया है।”
आज उनकी बेटी पूजा दो साल बाद घर आ रही थी।
पूजा की शादी एक बड़े शहर के बेहद अमीर और प्रतिष्ठित परिवार में हुई थी।
रामप्रसाद जी एक छोटे से सरकारी स्कूल में क्लर्क थे। उन्होंने अपनी पूरी जमा-पूंजी और जीवन भर की बचत अपनी बेटी की शादी में लगा दी थी।
उन्हें इस बात पर हमेशा गर्व रहता था—
“मेरी बेटी अब एक बड़े और इज़्ज़तदार घर की बहू है।”
दोपहर का समय था। गली के बाहर अचानक एक बड़ी, चमचमाती SUV आकर रुकी।
गाड़ी के रुकते ही पूरे मोहल्ले में हलचल मच गई। बच्चे खेलना छोड़कर उधर भागे, और आस-पास के लोग अपनी खिड़कियों और दरवाज़ों से झांकने लगे।
धीरे से कार का दरवाज़ा खुला…
और पूजा बाहर उतरी।
उसने महंगे, स्टाइलिश कपड़े पहन रखे थे, आँखों पर बड़ा सा काला चश्मा था, और हाथ में चमकता हुआ मोबाइल फोन। उसके चलने के अंदाज़, उसके हाव-भाव—सब कुछ बदल चुका था।
वो अब पहले वाली साधारण पूजा नहीं लग रही थी… बल्कि एक अलग ही दुनिया की इंसान नजर आ रही थी।
रामप्रसाद जी खुशी से लगभग दौड़ते हुए गेट तक पहुँचे।
“पूजा बेटा!” उन्होंने भर्राई हुई आवाज़ में पुकारा और उसे गले लगाने के लिए बाँहें फैला दीं।
लेकिन पूजा ने बस हल्का सा सिर झुकाकर उनके पैर छुए और एक कदम पीछे हटकर खड़ी हो गई। उसके चेहरे पर अपनापन कम, औपचारिकता ज़्यादा थी।
उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई, फिर हल्की-सी भौंहें सिकोड़ते हुए बोली—
“पापा, यहाँ बहुत गर्मी है… और ये गली… अभी तक वैसी ही है? कुछ बदला ही नहीं।”
रामप्रसाद जी के चेहरे की चमक एक पल को थम गई, लेकिन उन्होंने तुरंत खुद को संभाल लिया। होंठों पर हल्की मुस्कान लाते हुए बोले—
“हाँ बेटा… वही पुराना घर है, और वही पुरानी गली… जैसे तुम छोड़कर गई थीं।”
घर के अंदर कदम रखते ही पूजा की नज़र चारों तरफ घूम गई।
पुराना पंखा धीरे-धीरे घूम रहा था… लकड़ी की अलमारी अपनी जगह पर शांत खड़ी थी… और वही पुराना सोफा, जिस पर वह कभी घंटों बैठा करती थी।
लेकिन आज सब कुछ उसे अलग लग रहा था—जैसे वह इस घर की नहीं रही हो।
वह बहुत संभलकर सोफे के किनारे बैठ गई, मानो उसे डर हो कि कहीं उसके कपड़े गंदे न हो जाएँ।
तभी माँ एक गिलास पानी लेकर उसके पास आईं।
“ले बेटा, पानी पी ले,” उन्होंने प्यार से कहा।
पूजा ने एक नज़र गिलास की तरफ देखा, फिर हल्का सा सिर हिलाते हुए बोली—
“नहीं माँ… मैं सिर्फ बोतल का पानी पीती हूँ।”
माँ का हाथ वहीं थम गया।
उनकी आँखों में एक पल के लिए ठहराव आ गया—जैसे कुछ टूटकर चुपचाप बिखर गया हो।
खाने का समय हुआ तो माँ ने बड़े प्यार से पूजा के सामने थाली सजाकर रख दी।
गरम-गरम रोटियाँ, खुशबूदार दाल और उसकी पसंदीदा सब्जी—सब कुछ बड़े मन से बनाया गया था।
मुस्कुराते हुए माँ बोलीं,
“ले बेटा, तेरी पसंद का खाना बनाया है… आराम से खा।”
पूजा ने थाली पर एक नज़र डाली, फिर हल्का सा भौंहें सिकोड़ते हुए बोली—
“माँ, आप लोग अभी भी इतना तेल डालते हो? हम लोग अब काफी हेल्दी खाना खाते हैं… ये सब मैं नहीं खा पाऊँगी।”
उसने मजबूरी में एक-दो कौर खाए, फिर धीरे से थाली किनारे सरका दी।
रामप्रसाद जी चुपचाप बैठे रहे।
उनके चेहरे पर दर्द था, लेकिन उन्होंने कुछ नहीं कहा।
शाम को पूजा ने अपना बैग खोला।
“पापा, ये आपके लिए शर्ट है… और माँ, ये साड़ी,” उसने पैकेट आगे बढ़ाते हुए कहा।
फिर हल्की-सी मुस्कान के साथ बोली—
“प्लीज़ अब ये पुराने कपड़े मत पहना कीजिए… थोड़ा अच्छा और साफ-सुथरा पहनिए। अगर मेरे ससुराल वाले देखेंगे, तो क्या सोचेंगे?”
यह सुनकर रामप्रसाद जी का दिल टूट गया।
वही बेटी…
जो कभी कहती थी—
“पापा, आप जैसे हो वैसे ही अच्छे लगते हो।”
थोड़ी देर बाद पूजा ने कहा—
“पापा, आप ये घर बेच क्यों नहीं देते? किसी अच्छी सोसाइटी में शिफ्ट हो जाओ। यहाँ रहना अच्छा नहीं लगता।”
रामप्रसाद जी ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखते हुए शांत लेकिन गहरी आवाज़ में कहा—
“सच-सच बताओ पूजा… यहाँ तुम्हें अच्छा नहीं लगता, या फिर तुम्हें हमसे शर्म आने लगी है?”
पूजा एक पल के लिए चुप रह गई। उसके चेहरे पर हल्की घबराहट और असहजता साफ दिखाई दे रही थी।
“ऐसी बात नहीं है पापा…” उसने नज़रें झुकाते हुए धीरे से कहा,
“मैं तो बस… आपके अच्छे के लिए ही कह रही हूँ।”
रामप्रसाद जी उठे… अंदर गए… और एक पुरानी डायरी लेकर आए।
उन्होंने उसे पूजा के सामने रख दिया।
“ये देखो,” उन्होंने कहा।
पूजा ने डायरी खोली—
उसमें उसकी स्कूल फीस की रसीदें थीं…
कोचिंग की फीस…
दवाइयों के बिल…
और हर पन्ने पर लिखा था—
“मेरी बेटी का सपना”
पूजा की आँखें धीरे-धीरे भरने लगीं।
रामप्रसाद जी बोले—
“बेटा, ये वही घर है जहाँ तूने सपने देखे…
ये वही रसोई है जहाँ तेरी माँ ने खुद भूखी रहकर तुझे खिलाया…
और आज… तुझे यही सब छोटा लग रहा है?”
पूजा चुप थी।
“तू बड़ी हो गई… हमें खुशी है।
लेकिन अगर बड़ा बनने के बाद इंसान छोटा सोचने लगे…
तो वो तरक्की नहीं होती, बेटा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
कुछ देर बाद…
पूजा धीरे से उठी…
रसोई में गई…
और खुद प्लेट में खाना परोसकर लाई।
वो माँ के पास बैठ गई—
“माँ… एक रोटी और देना… और थोड़ा सा घी भी।”
माँ की आँखों से आँसू गिर पड़े… लेकिन इस बार वो खुशी के थे।
पूजा ने पानी का गिलास उठाया…
और एक ही साँस में पी गई।
फिर पापा के पास आकर बोली—
“पापा… मैं बदल गई थी…
मुझे लगा पैसा ही सब कुछ है…
लेकिन आज समझ आया…
सबसे बड़ा ‘स्टैंडर्ड’ इंसानियत का होता है।”
रामप्रसाद जी ने उसका सिर सहलाया—
“बस यही समझ आ जाए… तो इंसान सच में अमीर बन जाता है।”
उस रात पूजा ने एसी वाले कमरे में नहीं…
बल्कि छत पर सोने की ज़िद की।
ठंडी हवा… खुले आसमान… और माता-पिता का साथ…
उसे वही सुकून दे रहा था… जो करोड़ों में भी नहीं मिलता।
सुबह जब वो वापस जा रही थी…
तो इस बार उसने पड़ोस की शर्मा आंटी के पैर छुए…
और मुस्कुराकर बोली—
“आंटी, अगली बार आपके हाथ का पराठा खाने आऊँगी।”
रामप्रसाद जी उसे जाते हुए देख रहे थे…
लेकिन इस बार उनके चेहरे पर कोई दर्द नहीं था।
सिर्फ गर्व था।
क्योंकि उनकी बेटी…
बड़ी नहीं… सही मायनों में ‘अमीर’ बन गई थी।

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