मायका सिर्फ माँ से नहीं, रिश्तों की सांसों से ज़िंदा रहता है
घर में हलचल थी, क्योंकि अगले दिन एक बड़ा धार्मिक कार्यक्रम रखा गया था। रिश्तेदारों के आने की तैयारी चल रही थी।
रसोई में खड़ी थी संध्या—घर की बहू।
सुबह से काम करते-करते उसके पैर जवाब दे चुके थे, लेकिन चेहरे पर वही शांत मुस्कान थी। हाथ काम कर रहे थे, लेकिन मन कहीं और था।
तभी उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर नाम चमका—“भैया”
संध्या का दिल धड़क उठा।
उसने तुरंत फोन उठाया—
“हेलो भैया…?”
उधर से घबराई हुई आवाज आई— “संध्या… पिताजी को अचानक सीने में तेज दर्द हुआ है। डॉक्टर ने ICU में रखा है… मैं अकेला हूँ… तू आ सकती है क्या?”
संध्या के हाथ कांप गए। दीवार का सहारा लेना पड़ा।
“मैं… मैं अभी आती हूँ भैया…” उसने मुश्किल से कहा।
फोन रखते ही उसकी आँखों से आँसू बहने लगे।
मन का तूफान...
एक तरफ पिता ICU में जिंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे…
दूसरी तरफ ससुराल की जिम्मेदारियाँ उसे वहीं थामे खड़ी थीं।
कुछ पल के लिए संध्या बिल्कुल जड़ हो गई। हाथों में पकड़ा चम्मच जैसे भारी हो गया, साँसें तेज़ चलने लगीं। उसे लगा जैसे उसका शरीर तो रसोई में खड़ा है, लेकिन उसका मन अस्पताल के उस दरवाज़े पर पहुँच चुका है जहाँ उसके पिता अकेले पड़े हैं।
दिल और कर्तव्य के बीच खिंची इस अदृश्य लड़ाई ने उसे अंदर तक तोड़ दिया।
उसने आँखें बंद कीं, गहरी साँस ली और खुद को संभालने की कोशिश की। आँसू पोंछे, चेहरे पर हिम्मत ओढ़ी और धीमे-धीमे कदमों से अपनी सास, कमला देवी, की ओर बढ़ गई—
जैसे हर कदम के साथ वो अपने दिल को और मजबूत बना रही हो।
“मम्मी जी… मुझे अभी मायके जाना होगा। पिताजी की हालत बहुत खराब है…”
कमला देवी ने हल्का सा चश्मा ठीक किया और ठंडे स्वर में बोलीं—
“अभी? जब घर में इतना बड़ा काम है?”
“लेकिन मम्मी जी…” संध्या की आवाज टूट रही थी।
तभी पास बैठी ननद रीना मुस्कुराकर बोली—
“भाभी, एक बात कहूँ? बुरा मत मानना…
मायका तो माँ से होता है। आपकी माँ तो अब रही नहीं… तो फिर बार-बार वहाँ जाने का क्या मतलब?”
ये शब्द जैसे तीर बनकर संध्या के दिल में उतर गए।
उसकी माँ को गुज़रे तीन साल हो चुके थे… लेकिन आज पहली बार किसी ने उस दर्द को यूँ नकार दिया था।
पति की दुविधा...
तभी उसका पति राहुल अंदर आया।
“क्या हुआ?” उसने पूछा।
संध्या कुछ बोलती उससे पहले ही कमला देवी ने सब बता दिया।
राहुल एक पल के लिए चुप रहा…
उसने संध्या की आँखों में देखा… और फिर माँ की तरफ—
“माँ, संध्या को जाना चाहिए…”
कमला देवी का चेहरा सख्त हो गया—
“राहुल! तुम भी?
शादी के बाद लड़की का घर बदल जाता है। हर बार मायके भागना ठीक नहीं।”
राहुल चुप हो गया…
उसकी चुप्पी ने संध्या को अंदर तक तोड़ दिया।
संध्या चुपचाप अपने कमरे में चली गई।
दरवाज़ा बंद करते ही जैसे बाहर की सारी आवाज़ें थम गईं। कमरे में एक अजीब-सी खामोशी फैल गई थी।
वह धीरे-धीरे अलमारी के पास गई, उसे खोला और अंदर रखे बैग को बाहर निकाल लिया।
उसने बैग खोलकर कुछ कपड़े निकालने की कोशिश की… लेकिन उसके हाथ अचानक रुक गए।
उंगलियाँ कपड़ों को छूकर वहीं ठहर गईं।
उसकी नज़रें खाली हो गईं, जैसे वो सामने रखी चीज़ों को नहीं, अपने अंदर चल रहे तूफान को देख रही हो।
धीरे से उसके होंठ हिले—
“क्या सच में… अब वो घर मेरा नहीं रहा…?”
इतना कहते ही उसकी आवाज़ भर्रा गई।
अगले ही पल, आँखों से आँसू ढलकने लगे। एक-एक बूंद जैसे उसके दिल का दर्द बयां कर रही थी।
वह पलंग के किनारे बैठ गई, बैग अभी भी खुला था… लेकिन अब उसमें कुछ रखने की ताकत नहीं बची थी।
उसने अपना चेहरा हथेलियों में छुपा लिया और सिसकने लगी—
धीरे-धीरे, चुपचाप… जैसे अपने ही सवालों से हार गई हो।
तभी बाहर से अचानक घबराई हुई आवाज आई—
“अरे… ये क्या हो गया…!”
कमला देवी का फोन आया था।
उनके भाई—यानी रीना के मामा—की तबियत बहुत खराब थी।
“रीना! जल्दी तैयार हो… हमें अभी जाना होगा!” कमला देवी घबराकर बोलीं।
रीना एक पल चुप रही… फिर धीरे से बोली—
“मम्मी… मैं कैसे जाऊँ?”
कमला देवी हैरान— “क्यों?”
रीना ने वही शब्द दोहरा दिए—
“आप ही तो कहती हैं… शादी के बाद लड़की का मायका नहीं रहता…
और नानी के जाने के बाद तो मामा जी का घर भी आपका मायका नहीं रहा…”
आईना सामने था...
कमला देवी जैसे पत्थर की मूर्ति बनकर वहीं ठिठक गईं।
ऐसा लगा मानो किसी ने अचानक उनके पैरों के नीचे से ज़मीन खींच ली हो।
अभी कुछ ही देर पहले जो शब्द उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से कहे थे,
वही अब उनके सामने सच बनकर खड़े थे—एक कठोर आईने की तरह।
उनका गला सूख गया… आँखें नम होने लगीं।
पछतावे की एक लहर उनके दिल में उठी और धीरे-धीरे आँखों से आँसू बनकर बहने लगी।
बहू का जवाब ...
तभी संध्या धीरे-धीरे बाहर आई।
उसकी आँखें नम थीं, पलकों पर ठहरे आँसू उसकी पीड़ा बयां कर रहे थे, लेकिन उसकी आवाज़ में एक अजीब-सी दृढ़ता और शांति थी।
उसने अपनी सास की ओर देखा और बहुत संयमित स्वर में बोली—
“मम्मी जी…
मायका किसी एक इंसान के होने या न होने से खत्म नहीं होता।
मायका वो एहसास होता है, वो अपनापन होता है… जहाँ एक बेटी बिना झिझक, बिना किसी डर के जा सके।”
वो कुछ पल के लिए रुकी। कमरे में सन्नाटा और गहरा हो गया।
फिर उसने धीरे से, लेकिन गहराई से भरे शब्दों में कहा—
“अगर माँ के जाने से मायका खत्म हो जाता…
तो आज आप अपने भाई के लिए इतनी बेचैन क्यों हैं, मम्मी जी?
क्यों आपको उनके पास जाने की इतनी जल्दी है?”
उसकी बातों में कोई तीखापन नहीं था, लेकिन सच्चाई इतनी गहरी थी कि हर शब्द सीधे दिल को छू रहा था।
पूरा घर एकदम शांत हो गया।
कमला देवी के चेहरे पर जैसे भाव बदलने लगे—हैरानी, पछतावा और समझ… सब एक साथ उभर आए।
कमला देवी की आँखें भर आईं। आँसू अब रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।
उन्होंने कांपते हाथों से संध्या का हाथ थाम लिया—
“मुझे माफ कर दे बहू…
मैंने रिश्तों को अपने बनाए नियमों में बाँध दिया था… और उसी में सच्चे रिश्तों की अहमियत भूल गई…”
संध्या तुरंत झुक गई, उसने प्यार से उनके हाथ थाम लिए—
“ऐसा मत कहिए मम्मी जी… आप बड़ी हैं, आपका हर फैसला हमारे भले के लिए ही होता है…”
कमला देवी ने धीरे से उसका चेहरा ऊपर उठाया, उनकी आवाज अब पहले जैसी कठोर नहीं, बल्कि ममता से भरी थी—
“नहीं बहू… आज तूने मुझे सिखाया है कि रिश्ते हक से नहीं, दिल से निभाए जाते हैं…
तू अभी अपने पिताजी के पास जा… बिना किसी चिंता के…
और सुन…”
वो एक पल के लिए रुकीं, फिर मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं—
“वहाँ बहू बनकर नहीं…
अपनी माँ-बाप की वही बेटी बनकर जाना, जो हर मुश्किल में उनके साथ खड़ी रहती है…”
राहुल आगे आया।
इस बार उसकी आवाज मजबूत थी—
“चलो संध्या, मैं तुम्हें खुद छोड़कर आता हूँ।”
संध्या ने पहली बार राहत की सांस ली।
रीना चुप थी… लेकिन उसकी आँखों में सम्मान था।
उस रात…
एक तरफ संध्या अपने पिता के पास ICU के बाहर बैठी थी…
और दूसरी तरफ कमला देवी अपने भाई का हाथ थामे रो रही थीं…
दूरी थी…
लेकिन रिश्ते पहले से ज्यादा करीब आ चुके थे।
सीख:
मायका सिर्फ माँ से नहीं, उस रिश्ते से होता है जहाँ बेटी का हक कभी खत्म नहीं होता।
रिश्ते नियमों से नहीं, समझ और सम्मान से चलते हैं।

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