जब अपने दूर हो जाते हैं
हल्की हवा के साथ दरवाज़े की घंटी बजी तो नीलम ने जल्दी से जाकर दरवाज़ा खोला। सामने खड़ा उसका बेटा आरव स्कूल बैग टांगे मुस्कुरा रहा था।
“मम्मा, सुनो ना… अगले हफ्ते छुट्टियां हैं!”
आरव ने उत्साह से कहा।
नीलम मुस्कुराई, “अच्छा? फिर क्या प्लान है साहब का?”
आरव तुरंत बोला, “नानी के घर चलेंगे! बहुत टाइम हो गया… नानी से मिलने जाना है।”
नीलम का चेहरा एक पल को ठहर गया। उसने हल्की सी मुस्कान ओढ़ ली—“देखते हैं बेटा, पापा से बात करेंगे।”
नीलम के पति, संदीप, एक बड़ी कंपनी में काम करते थे। काम की भागदौड़ में वे इतने उलझ गए थे कि अपने गांव, अपने लोगों से उनका रिश्ता धीरे-धीरे कम होता गया।
नीलम की मां—जिन्हें सब “नानी” कहते थे—गांव में अकेली रहती थीं।
संदीप कई बार उन्हें शहर लाने की कोशिश कर चुके थे, लेकिन नानी हर बार मना कर देतीं—
“मुझे यहां की खुली हवा अच्छी लगती है… वहां तुम्हारे फ्लैट में घुटन होती है बेटा।”
धीरे-धीरे फोन भी कम हो गए… और मुलाकातें तो जैसे बंद ही हो गईं।
लेकिन इस बार आरव की जिद के आगे सबको झुकना पड़ा।
कुछ ही दिनों बाद, तीनों गांव पहुंच गए।
जैसे ही गाड़ी घर के बाहर रुकी, आरव भागते हुए अंदर गया—
“नानी… नानी… देखो मैं आ गया!”
आंगन में बैठी नानी ने जैसे ही आरव को देखा, उनकी आंखें चमक उठीं—
“अरे मेरा राजा बेटा! तू आ गया?”
उन्होंने तुरंत उसे गले से लगा लिया।
नीलम ने आगे बढ़कर मां के पैर छुए।
संदीप थोड़ा संकोच में थे… कई महीनों की दूरी उन्हें अंदर ही अंदर खाए जा रही थी।
नानी ने उन्हें देखा और हल्की नाराज़गी से बोलीं—
“अब याद आई मां की?”
संदीप ने सिर झुका लिया—
“माफ कर दो मां… काम में इतना उलझ गया कि…”
नानी ने बात काट दी—
“आओ बेटा, अंदर आओ… ज्यादा भावुक मत हो।”
गांव का वो घर… वो आंगन… वो लोग…
सब कुछ आरव के लिए नया था, लेकिन उसे बहुत अच्छा लग रहा था।
हर दिन नानी उसे पूरे मोहल्ले में घुमातीं।
हर कोई उन्हें सम्मान देता, प्यार करता।
आरव ने एक दिन पूछा—
“नानी, यहां सब लोग आपको इतना प्यार क्यों करते हैं?”
नानी मुस्कुराईं—
“क्योंकि बेटा, यहां लोग एक-दूसरे के साथ खड़े रहते हैं… सिर्फ अपने लिए नहीं जीते।”
आरव कुछ देर सोचता रहा, फिर बोला—
“हम शहर में क्यों नहीं ऐसे रहते?”
नानी ने गहरी सांस ली—
“क्योंकि वहां सबके पास समय नहीं है… बस दौड़ है।”
दिन कैसे बीत गए, किसी को पता ही नहीं चला।
संदीप को वापस काम पर लौटना था।
उन्होंने नीलम और आरव को कुछ दिन और वहीं छोड़ दिया।
नानी और आरव का रिश्ता अब और गहरा हो गया था।
वो साथ खाते, साथ हंसते, साथ सोते।
एक दिन आरव ने मासूमियत से पूछा—
“नानी, आप हमारे साथ शहर क्यों नहीं चलतीं?”
नानी ने उसके सिर पर हाथ फेरा—
“बेटा, मेरा मन यहीं बसता है… लेकिन ये घर तुम्हारा है… जब चाहो आ जाना।”
फिर थोड़ी देर रुककर बोलीं—
“बस एक बात याद रखना… रिश्ते कभी मत छोड़ना।”
कुछ दिनों बाद संदीप वापस आए और सबको लेकर शहर लौट गए।
जीवन फिर से अपनी रफ्तार में चलने लगा।
करीब दो महीने बाद, एक रात अचानक फोन आया।
संदीप का चेहरा बदल गया।
उन्होंने जल्दी से नीलम को जगाया—
“चलो… अभी गांव जाना है।”
जब वे गांव पहुंचे, घर के बाहर भीड़ लगी थी।
आरव का दिल घबराने लगा।
वो दौड़ता हुआ अंदर गया…
आंगन में सफेद चादर में लिपटी नानी लेटी थीं।
आरव रुक गया… समझ नहीं पा रहा था।
नीलम जोर-जोर से रो रही थी।
संदीप की आंखें भी नम थीं।
आरव धीरे-धीरे नानी के पास गया…
उनके पास बैठकर बोला—
“नानी… उठो ना… हम आए हैं…”
कोई जवाब नहीं आया।
उसने फिर कहा—
“नानी, चलो ना… मुझे घुमाने…”
चारों तरफ सन्नाटा था।
अगले दिन सब कुछ बदल चुका था।
घर वही था… आंगन वही था…
लेकिन आवाज़ नहीं थी।
तेरहवीं के बाद जब वे वापस लौटने लगे, संदीप ने घर को ताला लगाया।
गाड़ी में बैठते ही आरव बोला—
“पापा… नानी कहती थीं ये घर मेरा है… हम इसे बेचेंगे तो नहीं ना?”
संदीप की आंखों से आंसू निकल पड़े।
उन्होंने आरव को गले लगाते हुए कहा—
“नहीं बेटा… ये घर कभी नहीं बिकेगा।”
कुछ पल चुप रहकर बोले—
“बल्कि अब हम बार-बार यहां आएंगे… और शायद एक दिन यहीं आकर रहेंगे।”
आरव खिड़की से बाहर देख रहा था…
गांव धीरे-धीरे पीछे छूट रहा था…
लेकिन इस बार
वो सिर्फ जगह नहीं छोड़ रहा था…
वो अपने बचपन का एक हिस्सा
वहीं छोड़कर जा रहा था… 💔

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