रिश्तों की गर्माहट
दरवाज़े की घंटी बजी तो नेहा ने जल्दी से आकर दरवाज़ा खोला।
“अरे दीदी! आप आ गईं!” उसने हल्की मुस्कान के साथ कहा।
सामने खड़ी थी उसके पति रोहन की बड़ी बहन—संध्या।
संध्या ने अंदर आते ही चारों तरफ नज़र दौड़ाई। घर सजा हुआ था, लेकिन माहौल में कुछ ठंडापन था।
“कैसी हो नेहा?”
“ठीक हूं दीदी…” नेहा ने धीमे से जवाब दिया।
संध्या को कुछ अजीब सा लगा। शादी को अभी सिर्फ तीन महीने ही हुए थे, लेकिन नेहा के चेहरे पर नई दुल्हन वाली चमक नहीं थी।
नेहा ने जल्दी से संध्या का बैग पकड़ लिया—
“आप बैठिए, मैं पानी लेकर आती हूं।”
संध्या सोफे पर बैठ गई, लेकिन उसका ध्यान बार-बार नेहा के चेहरे पर जा रहा था।
तभी अंदर से मांजी की आवाज़ आई—
“आ गई संध्या?”
संध्या उठकर मां के पास गई और गले लग गई।
“इतना सामान क्यों लाई? यहां कोई कमी है क्या?” मां ने कहा।
संध्या मुस्कुराई—
“मां, सामान तो बहाना है… आप सबको देखने का मन था।”
कुछ देर बाद नेहा चाय लेकर आई। उसने सबके सामने ट्रे रखी और चुपचाप एक तरफ बैठ गई।
संध्या ने गौर किया—नेहा बात बहुत कम कर रही थी।
“नेहा, ये तुम्हारे लिए लाई हूं,” संध्या ने एक सुंदर दुपट्टा उसकी तरफ बढ़ाया।
नेहा ने हल्की नज़र से देखा और बोली—
“दीदी, इसकी क्या जरूरत थी…”
“अरे, पसंद नहीं आया क्या?”
“नहीं दीदी, ऐसा नहीं है…” नेहा ने धीरे से कहा।
मांजी तुरंत बोल पड़ीं—
“अरे ले ले, इतना भी नखरा अच्छा नहीं लगता।”
नेहा ने चुपचाप दुपट्टा ले लिया।
संध्या अब समझने लगी थी कि कुछ ठीक नहीं है।
शाम को वह नेहा के कमरे में गई।
कमरा साफ था, लेकिन खाली-खाली सा लग रहा था।
“तुम्हारा सामान कहां है नेहा?” संध्या ने पूछा।
“यहीं है दीदी…”
“लेकिन अलमारी तो आधी खाली है…”
नेहा ने नजरें झुका लीं—
“बस… ऐसे ही।”
संध्या उसके पास बैठ गई।
“नेहा, मुझसे कुछ छुपाओ मत। मैं समझ रही हूं कि कुछ तो बात है।”
नेहा की आंखें भर आईं—
“कुछ नहीं दीदी…”
“अगर कुछ नहीं होता, तो आंखें यूं नहीं बोलतीं,” संध्या ने प्यार से कहा।
अब नेहा खुद को रोक नहीं पाई।
धीरे-धीरे उसने सब बता दिया—
कैसे शादी के बाद उसके मायके से आए गिफ्ट मांजी ने रख लिए…
कैसे उसकी पसंद की चीजें भी उससे बिना पूछे ले ली जाती हैं…
कैसे वह हर बात पर खुद को रोकती रहती है…
“मैं किसी से कुछ कह नहीं पाती दीदी… लगता है कहीं गलत न समझ लें…” नेहा रोते हुए बोली।
संध्या चुपचाप सुनती रही।
फिर उसने नेहा का हाथ पकड़कर कहा—
“तुमने बहुत सह लिया… अब मैं हूं ना।”
अगले दिन सुबह का माहौल थोड़ा अलग था।
संध्या ने मांजी से कहा—
“मां, आज हम सब बाहर जाएंगे। नेहा भी चलेगी।”
मांजी बोलीं—
“इतना काम पड़ा है घर में…”
“काम तो रोज रहेगा मां… लेकिन रिश्तों के लिए समय निकालना भी जरूरी है,” संध्या ने शांत लेकिन दृढ़ आवाज़ में कहा।
दोपहर तक सब तैयार हो गए।
नेहा तैयार होकर आई तो संध्या ने मुस्कुराते हुए कहा—
“आज वही सूट पहनना जो तुम्हें पसंद है।”
नेहा ने हैरानी से मांजी की तरफ देखा।
मांजी ने धीरे से कहा—
“जा बेटा, पहन ले।”
नेहा को विश्वास ही नहीं हुआ।
शाम को जब सब लौटे, तो नेहा का कमरा बदला हुआ था।
उसकी सारी चीजें सलीके से रखी हुई थीं।
उसकी पसंद की सजावट भी की गई थी।
नेहा की आंखें भर आईं।
पीछे खड़ी संध्या मुस्कुरा रही थी।
रात को नेहा पानी लेकर जा रही थी, तभी उसने मांजी और संध्या की बात सुनी—
संध्या कह रही थी—
“मां, बहू को अपनाने का मतलब यह नहीं कि उसकी चीजें ले ली जाएं…
उसे अपनापन दीजिए… वो खुद सब कुछ दे देगी।”
मांजी चुप थीं।
फिर धीरे से बोलीं—
“शायद मुझसे गलती हो गई…”
अगली सुबह मांजी ने नेहा को बुलाया—
“ये लो, तुम्हारी सारी चीजें… और आगे से जो तुम्हारा है, वही तुम्हारा रहेगा।”
नेहा की आंखों से आंसू बह निकले।
उसने झुककर मांजी के पैर छुए।
जब संध्या जाने लगी, तो नेहा ने उसे गले लगा लिया—
“दीदी… आप ना आतीं, तो शायद मैं कभी बोल ही नहीं पाती…”
संध्या मुस्कुराई—
“रिश्ते चुप रहने से नहीं, समझने से चलते हैं।”

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