दीवार के उस पार
दोपहर ढलने को थी। धूप धीरे-धीरे टिन की छत पर चढ़ती जा रही थी और गर्मी से पूरा कमरा तंदूर जैसा हो गया था।
गीता फर्श पर बैठी थी। सामने सिलाई मशीन रखी थी, जिस पर वह लगातार काम कर रही थी। उसके हाथ तेज़ी से चल रहे थे, लेकिन आँखों में थकान साफ दिख रही थी।
पास में उसका बेटा अमन किताब खोलकर बैठा था… लेकिन पढ़ाई से ज़्यादा वह अपनी माँ को देख रहा था।
“माँ… थोड़ा आराम कर लो,” उसने धीरे से कहा।
गीता हल्का-सा मुस्कुराई, “आराम बाद में… पहले ये कपड़े खत्म करने हैं, तभी शाम को पैसे मिलेंगे।”
घर छोटा था, लेकिन जिम्मेदारियाँ बड़ी।
पति, राकेश…
नाम का ही सहारा था।
वह पहले अच्छा इंसान था, मेहनत करता था। लेकिन धीरे-धीरे गलत संगत में पड़ गया—शराब, जुआ, और झूठ उसकी आदत बन गए।
अब हाल ये था कि वह घर से ज्यादा बाहर रहता था।
और जब आता…
तो या तो पैसे मांगने, या झगड़ा करने।
उस दिन शाम को…
दरवाज़ा ज़ोर से खुला।
राकेश अंदर आया—आँखें लाल, चाल लड़खड़ाती हुई।
“गीता! पैसे दे!”
गीता चौंकी, “कौन से पैसे?”
“जो सिलाई से कमाती है! सब दे!”
गीता ने शांत रहने की कोशिश की, “ये पैसे घर के खर्च के लिए हैं… बच्चों की फीस भरनी है…”
“मुझे मत सिखा!” राकेश चिल्लाया।
उसने मशीन को जोर से धक्का दिया।
मशीन गिर गई।
अमन डर गया।
गीता ने पहली बार गुस्से में कहा— “बस! अब और नहीं!”
राकेश रुक गया।
“आज के बाद मैं तुझे एक रुपया भी नहीं दूँगी!”
“अच्छा? इतनी हिम्मत?” वह हंसा।
और गीता की तरफ बढ़ा।
लेकिन इस बार…
अमन अचानक आगे बढ़कर दोनों के बीच खड़ा हो गया।
“पापा… बस कीजिए!” उसने हिम्मत जुटाकर कहा।
राकेश गुस्से से गरज उठा—“हट जा मेरे सामने से!”
अमन की टाँगें काँप रही थीं, लेकिन वह अपनी जगह से नहीं हिला।
“नहीं हटूँगा,” उसने दाँत भींचते हुए कहा।
उसकी आवाज़ कमजोर जरूर थी, मगर इरादा मजबूत था।
“अगर आपको पैसे चाहिए तो खुद कमाओ ना… माँ को क्यों मारते हो?”
ये शब्द जैसे सीधे राकेश के दिल में उतर गए।
कमरे में अचानक सन्नाटा छा गया।
न गुस्से की आवाज़… न डर की।
बस एक पल था, जहाँ सब कुछ ठहर सा गया।
राकेश ने गुस्से में हाथ उठाया…
लेकिन इस बार उसका हाथ हवा में ही रुक गया।
उसने अपने बेटे की आँखों में देखा…
डर नहीं था…
नफरत थी।
और वही नफरत उसे अंदर तक हिला गई।
वह बिना कुछ बोले बाहर चला गया।
दरवाज़ा धीरे से बंद हुआ।
उस रात…
गीता चुप थी।
अमन भी।
लेकिन दोनों को समझ आ गया था—
कुछ बदलने वाला है।
अगले दिन…
गीता ने एक बड़ा फैसला लिया।
उसने पास की कॉलोनी में और काम पकड़ लिया।
साथ ही, अमन को अच्छे स्कूल में दाखिला दिलाने की ठानी।
“तू पढ़ेगा… और अपनी जिंदगी खुद बनाएगा,” उसने कहा।
दिन बीतते गए…
राकेश कई दिनों तक घर नहीं लौटा…
घर में एक अजीब-सी खामोशी बनी रही।
गीता ने खुद को संभाल लिया था, लेकिन कहीं न कहीं मन में सवाल अब भी बाकी थे।
फिर एक दिन…
दरवाज़े पर हल्की-सी दस्तक हुई।
गीता ने दरवाज़ा खोला—सामने राकेश खड़ा था।
लेकिन आज कुछ अलग था।
न उसकी आँखों में नशा था,
न चेहरे पर गुस्सा…
बस थकान थी… और एक अजीब-सी झिझक।
वह चुपचाप दरवाज़े पर खड़ा रहा, जैसे अंदर आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा हो।
“गीता…” उसने धीमी आवाज़ में कहा।
गीता बिना कुछ बोले उसे देखती रही।
राकेश ने नज़रें झुका लीं।
“मैं… काम ढूंढ रहा हूँ,” उसने धीरे-धीरे शब्दों को जोड़ते हुए कहा,
“सोचा… अगर… अगर एक मौका और मिल जाए…”
उसकी आवाज़ में पहली बार पछतावा साफ सुनाई दे रहा था।
गीता कुछ पल तक चुप रही।
उसके मन में पुराने जख्म भी थे… और सामने खड़ा बदला हुआ इंसान भी।
उसने कोई जवाब नहीं दिया…
लेकिन इस बार…
उसने दरवाज़ा भी बंद नहीं किया।
समय लगा…
लेकिन धीरे-धीरे राकेश बदलने लगा।
अमन अब बड़ा हो रहा था।
लेकिन इस बार…
डर से नहीं…
हिम्मत से।
सीख:
हर कहानी में लड़ाई जरूरी नहीं होती… कभी-कभी एक सच्चा शब्द भी इंसान को बदल सकता है।

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