साथ चलने से ही सफर आसान होता है
सुबह की हल्की धूप आँगन में उतर रही थी। हवा में ठंडक थी, लेकिन घर के अंदर आज एक अलग ही गर्माहट महसूस हो रही थी—उम्मीद की गर्माहट।
करीब डेढ़ महीने बाद आज सरला देवी अस्पताल से घर लौट रही थीं। गली में जैसे ही एंबुलेंस रुकी, घर के सभी लोग दरवाज़े पर आकर खड़े हो गए। किसी की आँखों में खुशी थी, तो किसी की आँखों में चिंता अभी भी बाकी थी।
दरवाज़ा खुला… और व्हीलचेयर पर बैठी मां को जैसे ही बाहर लाया गया, सबकी सांसें थम सी गईं।
"धीरे… ध्यान से," उनके बड़े बेटे रमेश ने कहा, जबकि छोटे बेटे सुरेश ने मां का हाथ मजबूती से पकड़ रखा था।
दोनों बहनें—नीता और कविता—दरवाज़े पर खड़ी थीं। उनकी आँखों में आँसू थे, लेकिन होंठों पर मुस्कान।
बच्चे तो जैसे खुशी से झूम ही उठे— "दादी आ गई… नानी आ गई!"
घर में जैसे फिर से जान लौट आई थी।
सरला देवी ने अपनी पूरी ज़िंदगी अपने परिवार के लिए जी थी। सुबह सबसे पहले उठना, सबके लिए खाना बनाना, बच्चों की पढ़ाई, घर की जिम्मेदारियाँ—उन्होंने कभी खुद के लिए वक्त ही नहीं निकाला।
धीरे-धीरे उम्र बढ़ी, शरीर थकने लगा… लेकिन आदतें नहीं बदलीं।
और फिर एक दिन…
करवा चौथ के अगले दिन सुबह-सुबह, जब वह रसोई में जा रही थीं, अचानक उन्हें चक्कर आया और वह गिर पड़ीं।
"मां!" सुरेश की आवाज पूरे घर में गूंज गई।
सब दौड़कर आए। उन्हें उठाया गया, पानी पिलाया गया… लेकिन दर्द इतना ज्यादा था कि वह कराहने लगीं।
जल्दी से अस्पताल ले जाया गया।
जांच में पता चला—कमर की हड्डी में गंभीर चोट है। डॉक्टर ने साफ कहा, "कम से कम एक महीने का पूरा बेडरेस्ट जरूरी है।"
यह सुनकर जैसे सबके पैरों तले जमीन खिसक गई।
घर लौटने के बाद असली परीक्षा शुरू हुई।
जो मां कभी एक जगह बैठती नहीं थीं, उन्हें अब पूरे दिन बिस्तर पर रहना था।
लेकिन इस बार… मां अकेली नहीं थीं।
उनके पति, रामप्रसाद जी, जो खुद दिल के मरीज थे, उन्होंने उस दिन मन ही मन एक फैसला कर लिया— "अब मैं अपनी जीवनसाथी का सहारा बनूंगा।"
सुबह होते ही उनका दिन शुरू हो जाता।
"सरला, उठो… दवाई का समय हो गया है," वह प्यार से कहते।
वह खुद पानी गर्म करते, दवाई निकालते, टाइम देखकर हर दवाई देते।
कभी उनके हाथ से चाय बनाते, तो कभी खिचड़ी।
घर के बाकी लोग भी पूरा साथ दे रहे थे।
बहुएं घर संभाल रही थीं, बेटे बाहर के काम देख रहे थे, और बच्चे अपने-अपने तरीके से दादी का मन बहलाते थे।
लेकिन रामप्रसाद जी का समर्पण सबसे अलग था।
एक दिन नीता ने कहा, "पापा, आप थोड़ा बाहर टहल आया करो, आपका भी तो ध्यान रखना जरूरी है।"
रामप्रसाद जी मुस्कुराए और बोले, "तेरी मां भी तो अंदर ही है… हम साथ में ही टहलेंगे, जब ये ठीक हो जाएगी।"
यह सुनकर सरला देवी की आँखें भर आईं।
दिन बीतते गए…
दवाइयों के साथ-साथ प्यार, देखभाल और धैर्य ने अपना असर दिखाना शुरू किया।
धीरे-धीरे दर्द कम होने लगा।
एक दिन डॉक्टर ने जांच के बाद कहा, "अब ये थोड़ा बैठ सकती हैं… और सहारे से कुछ कदम भी चल सकती हैं।"
यह सुनते ही घर में जैसे त्योहार सा माहौल हो गया।
उस शाम रामप्रसाद जी ने बगीचे से एक गुलाब तोड़ा, सरला देवी के पास आकर बोले—
"देखो, जल्दी ठीक हो जाओ… अभी तो हमारी 50वीं सालगिरह भी मनानी है। और हां… तुम्हारे हाथ की चाय भी पीनी है।"
सरला देवी हल्के से मुस्कुराईं, "बस कुछ दिन और… फिर मैं सब संभाल लूंगी।"
पास खड़ी पोती ने मोबाइल पर गाना चला दिया— "यूं ही कट जाएगा सफर, साथ चलने से…"
घर के सभी लोग एक-दूसरे को देख मुस्कुरा रहे थे।
उस दिन सबने एक बात महसूस की—
बीमारी सिर्फ दवाई से नहीं, बल्कि अपनेपन से भी ठीक होती है।
जहां परिवार साथ खड़ा हो, वहां हर मुश्किल आसान हो जाती है।
और सच में…
अगर इंसान अपने जीवन में थोड़ा सा समय, प्यार और धैर्य अपने अपनों को दे दे— तो यही धरती स्वर्ग बन सकती है।

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