दूरी में भी अपनापन
घर के अंदर हल्की-हल्की हलचल थी, जैसे कोई नया अध्याय शुरू होने वाला हो। अलमारी के दरवाज़े खुले थे, बक्से इधर-उधर पड़े थे और बीच में खड़ी थी नेहा—अपने कपड़ों को तह करते हुए, लेकिन मन कहीं और ही उलझा हुआ था।
“इतना सब सामान लेकर कैसे रहेंगे हम यहाँ?” उसने धीमे से खुद से कहा।
तभी पीछे से आवाज आई, “क्या सोच रही हो?”
नेहा ने मुड़कर देखा—उसका पति अमित दरवाज़े पर खड़ा था।
“कुछ नहीं… बस यही कि इतने लोगों के साथ एडजस्ट करना थोड़ा मुश्किल लग रहा है,” नेहा ने साफ शब्दों में कहा।
अमित मुस्कुराया, “शुरुआत में थोड़ा अजीब लगेगा, लेकिन धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”
नेहा ने सिर हिला दिया, लेकिन उसके मन में उठ रहे सवाल अब भी शांत नहीं हुए थे।
दरअसल, शादी के बाद से ही नेहा और अमित दिल्ली में अकेले रहते थे। दोनों नौकरी करते थे, अपनी मर्जी से जीते थे, अपनी पसंद का खाना बनाते थे। लेकिन अब अमित का ट्रांसफर उसके अपने शहर लखनऊ हो गया था, और परिवार के साथ रहने का मौका मिला था।
घर बड़ा था, लेकिन उसमें रहने वाले लोग उससे भी ज्यादा थे—माता-पिता, छोटा भाई, उसकी पत्नी और उनके बच्चे।
नेहा ने कोशिश तो बहुत की कि सबके साथ घुल-मिल जाए, लेकिन हर दिन उसे कुछ न कुछ नया महसूस होता।
कभी खाने को लेकर दिक्कत होती—जहाँ वह ऑलिव ऑयल और हेल्दी खाना पसंद करती थी, वहीं घर में घी-तेल से भरपूर खाना बनता था।
कभी समय को लेकर—जहाँ वह सब कुछ प्लान करके करती थी, वहीं घर में सब कुछ अपने हिसाब से चलता था।
और सबसे बड़ी बात—उसे अपने लिए समय ही नहीं मिल पा रहा था।
वह यह सब किसी से कह भी नहीं पा रही थी, क्योंकि उसे डर था कि कहीं लोग उसे गलत न समझ लें।
दिन बीतते गए… और नेहा अंदर ही अंदर घुटने लगी।
एक दिन रात के खाने के बाद, अमित की माँ—सरोज जी—ने सभी को अपने कमरे में बुलाया।
सब थोड़े हैरान थे।
“क्या बात है माँ?” अमित ने पूछा।
सरोज जी ने सबकी ओर देखा, फिर धीरे से बोलीं, “मैं तुम सबसे एक जरूरी बात करना चाहती हूँ।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
“नेहा और अमित…” उन्होंने कहा, “मैं चाहती हूँ कि तुम दोनों पास ही कोई किराए का घर लेकर रहने लगो।”
यह सुनते ही सब चौंक गए।
नेहा तो जैसे समझ ही नहीं पाई कि उसने सही सुना भी है या नहीं।
“माँ… ये आप क्या कह रही हैं?” अमित ने हैरानी से पूछा।
नेहा की आँखों में भी सवाल थे—“क्या मैंने कुछ गलत किया?”
सरोज जी ने तुरंत उसका हाथ थाम लिया, “नहीं बहू, बिल्कुल नहीं। तुमने कुछ भी गलत नहीं किया है।”
उन्होंने प्यार से कहा, “दरअसल, मैंने पिछले कुछ दिनों में तुम्हें बहुत ध्यान से देखा है।”
नेहा चुपचाप सुनती रही।
“तुम कोशिश तो बहुत कर रही हो, लेकिन तुम्हारी आदतें, तुम्हारी जिंदगी जीने का तरीका… वो यहाँ से थोड़ा अलग है।”
उन्होंने आगे कहा, “और इसमें कुछ भी गलत नहीं है। हर इंसान अपने माहौल के हिसाब से ढलता है।”
अमित और नेहा दोनों शांत थे।
“लेकिन अगर हम सब साथ रहेंगे, तो धीरे-धीरे छोटी-छोटी बातें बड़ी बन सकती हैं,” सरोज जी ने समझाते हुए कहा।
“खाने-पीने से लेकर खर्च तक… हर चीज में फर्क है। और ये फर्क कभी-कभी रिश्तों में दरार डाल देता है।”
नेहा की आँखें भर आईं।
सरोज जी ने उसके सिर पर हाथ रखा, “मैं नहीं चाहती कि हमारे बीच कभी कोई कड़वाहट आए।”
“इसलिए बेहतर यही है कि तुम लोग पास में ही अलग रहो। ताकि तुम अपनी जिंदगी अपने हिसाब से जी सको… और हमारा प्यार भी बना रहे।”
कमरे में गहरी खामोशी छा गई।
अमित ने धीरे से कहा, “माँ… आपने इतना सब सोच लिया?”
सरोज जी हल्के से मुस्कुराईं, “रिश्तों को निभाने के लिए कभी-कभी थोड़ा दूर होना भी जरूरी होता है।”
नेहा अब खुद को रोक नहीं पाई। वह उठी और जाकर अपनी सास के गले लग गई।
“माँ… आपने जो सोचा, वो शायद हम कभी कह भी नहीं पाते,” उसने भावुक होकर कहा।
सरोज जी ने उसे कसकर थाम लिया, “बस तुम खुश रहो… यही मेरे लिए सबसे जरूरी है।”
कुछ दिनों बाद नेहा और अमित पास ही एक छोटे लेकिन सुकून भरे घर में रहने लगे।
अब नेहा अपनी पसंद से खाना बनाती, अपने समय से काम करती और जब मन होता, सास-ससुर से मिलने चली जाती।
और सबसे खास बात—अब उनके रिश्तों में पहले से ज्यादा मिठास आ गई थी।
क्योंकि अब कोई मजबूरी नहीं थी… सिर्फ अपनापन था।
सीख:
हर रिश्ता साथ रहने से नहीं, बल्कि समझदारी से निभाने से मजबूत होता है। कभी-कभी थोड़ी दूरी ही रिश्तों को और करीब ले आती है।

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