आख़िरी बार “बाबूजी”
घर के अंदर एक अजीब-सी खामोशी थी। दीवारों पर टंगी घड़ी की टिक-टिक जैसे हर पल का हिसाब दे रही थी, और उस खामोशी के बीच बैठे थे रघुनाथ बाबू—एक ऐसे पिता, जिनकी दुनिया अब सिर्फ यादों तक सिमट कर रह गई थी।
उनकी पत्नी को गुज़रे पाँच साल हो चुके थे। पहले घर में हर वक्त चहल-पहल रहती थी, पर अब आवाज़ें भी जैसे इजाज़त लेकर आती थीं।
उनका बेटा अजय शहर की एक बड़ी कंपनी में काम करता था। शादी को एक साल हुआ था, और उसकी पत्नी सीमा इस घर में आई थी।
सीमा बहुत समझदार थी। आते ही उसने घर को संभाल लिया था, लेकिन एक चीज़ थी जो उसे हर दिन खटकती थी—रघुनाथ बाबू का अकेलापन।
एक दिन रघुनाथ बाबू ने धीरे से कहा,
“बहू… अगर ज़्यादा तकलीफ़ ना हो तो… आज वो… गुड़ की रोटी बना देना… बहुत दिनों से खाने का मन कर रहा है…”
सीमा ने तुरंत कहा,
“अरे बाबूजी, इसमें तकलीफ़ कैसी… अभी बना देती हूँ।”
तभी अजय ने सुन लिया।
“पापा, आपको पता है ना आपकी शुगर है… फिर भी ये सब?” उसने थोड़ा तेज़ स्वर में कहा।
रघुनाथ बाबू चुप हो गए।
“बस… कभी-कभी मन कर जाता है बेटा…”
अजय ने झुंझलाकर कहा,
“मन को कंट्रोल करना सीखिए… हर चीज़ आपकी मर्ज़ी से नहीं हो सकती।”
सीमा ने बीच में कहा,
“आप ऐसे क्यों बोल रहे हैं…?”
अजय बोला,
“क्योंकि मुझे उनकी चिंता है!”
लेकिन सच ये था कि चिंता से ज़्यादा उसमें चिड़चिड़ापन था।
उस दिन रघुनाथ बाबू ने गुड़ की रोटी नहीं खाई।
दिन बीतते गए…
अब उन्होंने मांगना ही छोड़ दिया था।
अगर कभी मन करता, तो चुपचाप रसोई में जाकर थोड़ा सा गुड़ खा लेते… और फिर पानी पीकर ऐसे बैठ जाते जैसे कुछ हुआ ही ना हो।
सीमा कई बार देखती, पर कुछ कह नहीं पाती थी।
एक दिन उसने प्यार से कहा,
“बाबूजी, आप मुझसे क्यों छुपाते हैं?”
रघुनाथ बाबू हल्का सा मुस्कुराए,
“क्योंकि अब मैं बोझ नहीं बनना चाहता बहू…”
ये सुनकर सीमा का दिल कांप गया।
धीरे-धीरे उनकी तबीयत बिगड़ने लगी।
खाँसी बढ़ गई… सांस फूलने लगी… शरीर कमजोर होता गया।
सीमा दिन-रात उनकी सेवा करती।
दवाई, खाना, पानी—हर चीज़ का ध्यान रखती।
लेकिन अजय… वो दूर होता जा रहा था।
उसे लगता था कि ये सब “नॉर्मल” है।
एक रात…
घड़ी में करीब ढाई बजे थे।
अचानक तेज़ खाँसी की आवाज़ आई।
सीमा दौड़कर गई—रघुनाथ बाबू बिस्तर पर बैठे हांफ रहे थे।
“बाबूजी!” वो घबरा गई।
उन्होंने मुश्किल से कहा,
“बहू… सांस नहीं ले पा रहा…”
सीमा ने तुरंत पानी दिया, दवाई दी, पीठ सहलाने लगी।
आँखों में आँसू थे उसके।
वो बार-बार अजय को आवाज़ दे रही थी—
“अजय! उठो! बाबूजी की हालत खराब है!”
अजय करवट बदलकर बोला,
“सीमा… मुझे सुबह ऑफिस जाना है… तुम संभाल लो…”
उस एक पल में… कुछ टूट गया।
सीमा चुप हो गई।
कुछ देर बाद…
रघुनाथ बाबू ने उसका हाथ पकड़ा।
“बहू… एक बात कहूँ…?”
“जी बाबूजी…”
“अगर मैं चला जाऊँ… तो अजय को माफ़ कर देना… वो बुरा नहीं है… बस… समझ नहीं पाया…”
सीमा रो पड़ी,
“ऐसा मत कहिए…”
रघुनाथ बाबू ने दरवाज़े की तरफ देखा…
“एक बार… उसे बुला दो… आख़िरी बार देख लूँ…”
सीमा भागी… अजय को झकझोरा…
“अजय उठो! बाबूजी बुला रहे हैं… जल्दी चलो…”
अजय झुंझलाते हुए उठा…
“क्या है यार…”
जब वो कमरे में पहुँचा…
रघुनाथ बाबू की आँखें दरवाज़े पर टिकी हुई थीं…
जैसे वो बस उसी का इंतज़ार कर रहे थे।
उन्होंने उसे देखा…
होंठ हिले…
“बेटा…”
और फिर…
सांस… थम गई।
कमरे में सन्नाटा छा गया।
सीमा फूट-फूट कर रोने लगी—
“बाबूजी… उठिए… देखिए अजय आ गया…”
अजय वहीं खड़ा रह गया।
जैसे उसके पैरों में जान ही ना हो।
उसने पहली बार महसूस किया—
वो “आख़िरी बार”… सच में आख़िरी होता है।
अंतिम संस्कार के बाद…
घर खाली हो गया।
अब कोई गुड़ की रोटी मांगने वाला नहीं था…
कोई खाँसते हुए “बहू…” नहीं बुलाता था…
कोई दरवाज़े की तरफ इंतज़ार नहीं करता था…
अजय हर दिन उस कमरे में जाता…
चारपाई को देखता…
और धीरे से बैठ जाता।
एक दिन उसने सीमा से कहा,
“काश… उस रात मैं उठ जाता…”
सीमा की आँखों में आँसू थे,
“कुछ बातें समझने के लिए… बहुत देर हो जाती है…”
कुछ महीनों बाद…
सीमा माँ बनने वाली थी।
अजय बदल चुका था।
अब वो हर छोटे पल को जीना सीख गया था।
जब बेटा हुआ…
अजय ने उसे गोद में उठाकर रोते हुए कहा—
“पापा… मुझे माफ़ कर देना…”
और बच्चे का नाम रखा—
रघु
कहते हैं…
माता-पिता ज़िंदगी में बार-बार नहीं मिलते…
लेकिन पछतावा… हर दिन मिलता है।

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