मरने के बाद समझ आया उसका प्यार
बरसात अभी-अभी थमी थी। गली में जगह-जगह पानी जमा था और छज्जों से बूंदें अब भी टपक रही थीं। शाम का धुंधलका धीरे-धीरे पूरे मोहल्ले पर उतर रहा था।
लेकिन मिश्रा परिवार के छोटे से घर के अंदर रोज की तरह तनाव पसरा हुआ था।
रसोई में गैस पर दाल चढ़ी थी और सुनीता बेलन से रोटियाँ बेलते हुए बार-बार दरवाज़े की तरफ देख रही थी। दीवार पर लगी घड़ी रात के साढ़े नौ बजा रही थी।
“फिर देर…” उसने झुंझलाकर खुद से कहा।
तभी बाहर गेट की चरमराहट सुनाई दी।
उसका पति महेश अंदर आया। भीगा हुआ पुराना बैग कंधे पर लटका था। कुर्ते की जेब से मुड़े-तुड़े कागज झांक रहे थे। चेहरे पर वही रोज वाली थकान।
सुनीता तमतमाकर बोली—
“कहाँ रह जाते हो रोज? बच्चों ने खाना तक नहीं खाया।”
महेश ने चुपचाप चप्पल उतारी और बोला—
“मार्केट में हिसाब बंद करना था…”
“बस यही सुनना बाकी रह गया था,” सुनीता ने ताना मारा, “दुनिया के सारे काम तुम्हीं करते हो।”
महेश चुप रहे।
उनकी यही आदत सुनीता को और चिढ़ा देती थी। न कभी बहस, न गुस्सा।
घर में दो बच्चे थे—तेरह साल की पूजा और आठ साल का सोनू। दोनों कमरे के कोने में चुपचाप बैठे पिता को देख रहे थे।
महेश ने मुस्कुराकर बच्चों के सिर पर हाथ फेरा और जेब से समोसे का छोटा पैकेट निकाला।
“लो, तुम दोनों के लिए…”
सोनू खुश होकर उछल पड़ा।
लेकिन सुनीता का गुस्सा कम नहीं हुआ।
“घर में चीनी खत्म है, सिलेंडर खाली होने वाला है और तुम्हें समोसे लाने की सूझ रही है।”
महेश ने धीरे से कहा—
“बच्चे कई दिन से मांग रहे थे…”
“तो क्या मैं मना करती हूँ? लेकिन पहले जरूरी चीजें भी तो देखो।”
महेश चुपचाप हाथ-मुँह धोने चले गए।
मोहल्ले में लोग उन्हें सीधा-सादा आदमी मानते थे। वह शहर की बड़ी कपड़ा मंडी में एक व्यापारी के यहाँ हिसाब-किताब लिखते थे। सुबह आठ बजे निकलते और रात नौ-दस बजे लौटते।
साधारण कपड़े, पुरानी साइकिल और जरूरत से ज्यादा चुप रहने की आदत।
मोहल्ले वाले कई बार मजाक उड़ाते—
“अरे महेश बाबू, जिंदगीभर बस खाते लिखते रह जाओगे।”
कोई कहता—
“इतने सीधे आदमी आजकल कहाँ चलते हैं।”
महेश बस हल्का-सा मुस्कुरा देते।
सुनीता को हमेशा शिकायत रहती कि महेश में दुनिया की समझ नहीं है।
उसकी सहेली रेखा का पति प्रॉपर्टी का काम करता था। हर साल नया फोन, नया फर्नीचर, सोने के गहने।
और एक महेश थे…
त्योहार पर भी मुश्किल से बच्चों के कपड़े बनते।
एक रात सुनीता फूट पड़ी—
“क्या मिला तुम्हारी ईमानदारी से? पूरी जिंदगी बस जोड़-घटाना करते रहो।”
महेश ने शांत स्वर में कहा—
“कम है… लेकिन गलत नहीं है।”
“गलत सही से पेट नहीं भरता,” सुनीता ने तड़पकर कहा।
महेश ने कुछ जवाब नहीं दिया।
उस रात देर तक वह खिड़की के पास बैठे रहे।
दिन बीतते गए।
सर्दियाँ आ गईं।
एक सुबह महेश रोज की तरह काम पर निकले, लेकिन दोपहर में अचानक कपड़ा मंडी से खबर आई—
“महेश बाबू को सीने में दर्द हुआ है…”
जब तक सुनीता अस्पताल पहुँची, डॉक्टर उन्हें मृत घोषित कर चुके थे।
सुनीता के पैरों तले जमीन खिसक गई।
पूजा चीख-चीखकर रोने लगी।
सोनू समझ ही नहीं पा रहा था कि क्या हुआ।
पूरा मोहल्ला जमा हो गया।
सबके चेहरे पर दुख था, लेकिन बातों का सिलसिला भी शुरू हो चुका था—
“बेचारा बहुत मेहनती था…”
“इतना सीधा आदमी भगवान जल्दी उठा लेते हैं…”
“अब बच्चों का क्या होगा…”
तेरहवीं तक घर में लोगों का आना-जाना लगा रहा।
फिर धीरे-धीरे भीड़ कम होने लगी।
और साथ ही चिंता बढ़ने लगी।
सुनीता रातभर जागती रहती।
घर का खर्च कैसे चलेगा?
बच्चों की पढ़ाई?
किराना?
बिजली का बिल?
उसके पास कोई जवाब नहीं था।
एक दिन दोपहर में दरवाजे पर दस्तक हुई।
बाहर बैंक के दो कर्मचारी खड़े थे।
उनके साथ मोहल्ले के ही रहने वाले बैंक क्लर्क विनोद भी थे।
सुनीता घबरा गई।
“क्या बात है?”
विनोद ने धीरे से कहा—
“भाभीजी, घबराइए मत। महेश जी के बैंक खाते और कुछ निवेश के कागज हैं…”
“कौन-से कागज?”
“उन्होंने आपके नाम कई एफडी कर रखी थीं… बीमा भी था…”
सुनीता अवाक रह गई।
“क्या?”
“करीब अठारह लाख रुपए जमा हैं… और बीमा का अलग पैसा।”
सुनीता को लगा जैसे कानों ने गलत सुना हो।
“अठारह लाख?”
“जी।”
यह खबर पूरे मोहल्ले में आग की तरह फैल गई।
जिस महेश को लोग मामूली क्लर्क समझते थे, उसने इतनी बड़ी रकम छोड़ दी!
अब मोहल्ले वालों के सुर बदल गए।
“महेश बहुत दूर की सोच रखते थे।”
“परिवार के लिए जीते थे।”
“आजकल कौन इतना बचाकर रखता है…”
कुछ लोग मन ही मन पछता भी रहे थे—
“अगर पहले पता होता तो थोड़ा उधार ही ले लेते।”
सुनीता खुद समझ नहीं पा रही थी कि महेश ने इतना पैसा कैसे जोड़ा।
उसे याद आने लगा—
महेश कभी बेवजह खर्च नहीं करते थे।
नई शर्ट लेने से पहले बच्चों की फीस सोचते।
खुद पैदल चले जाते लेकिन रिक्शा नहीं लेते।
सुनीता को पहली बार एहसास हुआ कि वह आदमी चुपचाप परिवार के लिए कितना कुछ सहता रहा।
कुछ दिनों बाद मायके से सुनीता की माँ, भाई दीपक और छोटी बहन नेहा आ गए।
माँ ने आते ही कहा—
“बेटी, अब तू अकेली कैसे रहेगी?”
दीपक बोला—
“देख दीदी, पैसे को संभालना आसान नहीं होता। हम हैं न।”
धीरे-धीरे घर में बदलाव आने लगा।
नई अलमारी आई।
फ्रिज खरीदा गया।
बच्चों का दाखिला अच्छे स्कूल में करा दिया गया।
कामवाली भी रख ली गई।
मोहल्ले की औरतें अब अलग बातें करने लगीं—
“पैसा आते ही तेवर बदल गए।”
“पहले तो किसी से ठीक से बात तक नहीं करती थी।”
लेकिन असली बदलाव अभी बाकी था।
एक रात सुनीता अलमारी साफ कर रही थी।
उसे महेश की पुरानी डायरी मिली।
उसने यूँ ही पन्ने पलटे।
पहले ही पन्ने पर लिखा था—
“अगर मुझे कुछ हो जाए तो मेरे बच्चों को किसी के आगे हाथ न फैलाना पड़े…”
सुनीता की आँखें भर आईं।
आगे हर महीने का हिसाब लिखा था।
कहाँ कितना बचाया।
कौन-सी एफडी कब कराई।
किस बीमा की कितनी किस्त भरी।
यहाँ तक लिखा था—
“इस बार पूजा के जूते नहीं दिला पाया… अगले महीने जरूर दिलाऊँगा।”
सुनीता फूट-फूटकर रो पड़ी।
उसे अपनी कही हर कड़वी बात याद आने लगी।
“तुम जिंदगीभर कुछ नहीं कर पाओगे…”
“तुममें समझ ही नहीं है…”
आज वही आदमी बच्चों का भविष्य सुरक्षित कर गया था।
धीरे-धीरे सुनीता को रिश्तों की असलियत भी समझ आने लगी।
भाई दीपक अब अक्सर पैसों की बात करने लगा।
“दीदी, अगर थोड़ा पैसा मिल जाए तो मैं बिजनेस शुरू कर लूं।”
माँ बोली—
“अपनों के काम नहीं आएगा तो किसके आएगा?”
सुनीता उलझन में पड़ गई।
उधर मोहल्ले में भी लोगों का व्यवहार बदल गया था।
जो औरतें पहले उसे नजरअंदाज करती थीं, अब मीठी बातें करतीं।
“अरे बहन, कभी घर भी आया करो…”
एक दिन दीपक बोला—
“दीदी, घर अपने नाम करवा लो। बाद में दिक्कत होगी।”
धीरे-धीरे उसे समझ आने लगा कि लोग उसके दुख से ज्यादा उसके पैसों में दिलचस्पी ले रहे हैं।
इसी बीच बैंक में उसकी मुलाकात आदित्य से हुई।
वह बैंक का वित्तीय सलाहकार था।
शांत स्वभाव, सलीके से बात करने वाला।
उसने सुनीता को समझाया—
“अचानक मिले पैसे को संभालना सबसे मुश्किल होता है।”
उसने एफडी, ब्याज, बच्चों की पढ़ाई और भविष्य की योजनाओं के बारे में विस्तार से बताया।
पहली बार सुनीता को लगा कि कोई उसे बिना स्वार्थ समझा रहा है।
धीरे-धीरे दोनों की बातचीत बढ़ने लगी।
आदित्य बच्चों से भी अपनापन रखता था।
पूजा उसे “आदित्य अंकल” कहने लगी।
सोनू तो उसके साथ तुरंत घुलमिल गया।
लेकिन जब मोहल्ले में बातें शुरू हुईं, तो सुनीता डर गई।
“लोग क्या कहेंगे…”
आदित्य ने मुस्कुराकर कहा—
“लोगों का काम कहना है।”
समय बीतता गया।
एक दिन आदित्य ने साफ शब्दों में कहा—
“मैं आपको और बच्चों को सम्मान के साथ अपनाना चाहता हूँ।”
सुनीता सन्न रह गई।
उस रात वह देर तक महेश की तस्वीर के सामने बैठी रही।
“क्या मैं गलत कर रही हूँ?” उसने मन ही मन पूछा।
मानो भीतर से आवाज आई—
“जिंदगी रुकनी नहीं चाहिए…”
जब सुनीता ने घरवालों को शादी की बात बताई तो जैसे तूफान आ गया।
माँ चिल्लाईं—
“लोग क्या कहेंगे?”
दीपक बोला—
“इतनी जल्दी दूसरी शादी?”
सुनीता पहली बार दृढ़ आवाज में बोली—
“जब मैं अकेली रोती थी तब कोई साथ नहीं था। अब फैसला भी मैं खुद करूँगी।”
घर में सन्नाटा छा गया।
कुछ दिनों बाद आर्य समाज मंदिर में सादगी से शादी हो गई।
पूजा और सोनू दोनों खुश थे।
विदाई के समय सुनीता ने महेश की तस्वीर के सामने दीपक जलाया।
उसकी आँखों से आँसू बह निकले।
धीरे से बोली—
“तुमने जीते-जी भी सहारा दिया… और जाने के बाद भी जीना सिखा गए…”

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