मेरी बच्ची अब रोएगी नहीं
रसोई में प्रेशर कुकर की सीटी लगातार बज रही थी और आँगन में फैले कपड़ों को तेज हवा बार-बार उड़ा रही थी। घर के अंदर काम की भागदौड़ थी, लेकिन मीरा का ध्यान बार-बार दरवाज़े के पास बैठे अपने बेटे आरव पर जा रहा था।
आरव चुपचाप स्कूल बैग पकड़े बैठा था। उसके चेहरे पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी।
“क्या हुआ बेटा? स्कूल नहीं जाना क्या आज?”
मीरा ने पास बैठते हुए पूछा।
आरव ने धीरे से सिर झुका लिया। उसकी आँखें लाल थीं, जैसे काफी देर से रो रहा हो।
“मां… मुझे कल स्कूल में सबके सामने बहुत शर्मिंदगी हुई…”
उसने धीमी आवाज़ में कहा।
मीरा घबरा गई।
“क्यों? किसी ने कुछ कहा क्या?”
इतना सुनते ही आरव की आँखों से आँसू निकल पड़े।
“मैडम ने कहा था कि कल सब बच्चे साइंस प्रोजेक्ट लेकर आएंगे। सबके मम्मी-पापा ने उनके लिए बड़ा अच्छा मॉडल बनाया था… लेकिन मेरे पास कुछ नहीं था…”
मीरा का दिल कसकर रह गया।
“तो तूने मुझे बताया क्यों नहीं बेटा?”
“बताया था मां… पर उस दिन चाची ने कहा था कि बेकार चीज़ों में पैसे उड़ाने की जरूरत नहीं है। पढ़-लिखकर कौन सा कलेक्टर बन जाएगा…”
मीरा चुप हो गई।
उसके पास जवाब नहीं था।
असल में मीरा इस घर की छोटी बहू थी। पति रमेश शहर में मजदूरी करता था, लेकिन जितना कमाता था, उससे ज्यादा शराब में उड़ा देता था। महीने में एक-दो बार ही घर आता और आते ही लड़ाई झगड़ा शुरू कर देता।
घर की पूरी जिम्मेदारी बड़े भाई सुरेश और उसकी पत्नी कमला के हाथ में थी। कमला खुद को इस घर की मालकिन समझती थी।
मीरा और उसके दो बच्चों को घर में रहने दिया गया था, लेकिन बदले में पूरे घर का काम उसी से करवाया जाता। सुबह से रात तक वह मशीन की तरह लगी रहती।
कमला हर बात पर एहसान जताती रहती।
“हम ना रखें तो पता नहीं कहां दर-दर भटकेगी…”
वह अक्सर कहती।
मीरा पढ़ी-लिखी ज्यादा नहीं थी, लेकिन सिलाई बहुत अच्छी करती थी। शादी से पहले मोहल्ले की औरतों के कपड़े सिलकर थोड़ा बहुत कमा लेती थी।
एक बार पड़ोस की रीना ने कहा भी था, “तू चाहे तो फिर से सिलाई शुरू कर सकती है। आजकल अच्छे टेलर की बहुत मांग है।”
लेकिन कमला ने तुरंत बीच में बोल दिया था, “घर की बहुएं बाहर कमाने जाएंगी तो लोग क्या कहेंगे?”
बस वही “लोग क्या कहेंगे” सुन-सुनकर मीरा चुप हो जाती।
उस दिन आरव की बातें सुनकर पहली बार उसे खुद पर गुस्सा आया।
उसका बेटा सिर्फ एक छोटा सा प्रोजेक्ट भी इसलिए नहीं बना पाया क्योंकि उसकी मां हर बात में दूसरों की इजाजत ढूंढती रही।
रात को सब सो गए, लेकिन मीरा की आँखों में नींद नहीं थी।
आरव उसके पास लेटा था।
“मां…”
उसने धीरे से कहा।
“हम्म?”
“अगर हमारे पास पैसे होते ना… तो मैं भी बड़ा वाला प्रोजेक्ट बनाता।”
मीरा की आँखें भर आईं।
“तू जरूर बनाएगा बेटा… बहुत बड़ा बनाएगा…”
“सच?”
“हां… तेरी मां अब कुछ करेगी।”
आरव तो सो गया, लेकिन मीरा सारी रात सोचती रही।
सुबह उसने रोज की तरह सारे काम निपटाए। फिर पुराने संदूक से अपनी सिलाई मशीन निकाली, जो सालों से धूल खा रही थी।
कमला ने देखते ही ताना मारा, “वाह! आज महारानी क्या करने वाली हैं?”
“फिर से सिलाई शुरू करूंगी जीजी।”
मीरा ने शांत आवाज़ में कहा।
कमला जोर से हंस पड़ी।
“तू? सिलाई करेगी? और ग्राहक आएंगे तेरे पास?”
“क्यों नहीं आएंगे? पहले भी आते थे।”
“देख मीरा, घर का काम छोड़कर ये सब नौटंकी मत कर। वरना ठीक नहीं होगा।”
मीरा पहली बार बिना डरे बोली, “घर का काम मैं करूंगी। लेकिन अब अपने बच्चों के लिए कमाऊंगी भी।”
इतने में सुरेश भी बाहर आ गया।
“किस बात की बहस हो रही है?”
कमला तुरंत बोली, “देखिए ना, अब ये घर-घर जाकर कपड़े सिलेगी। हमारी इज्जत मिट्टी में मिल जाएगी।”
सुरेश ने सख्त आवाज़ में कहा, “मीरा, जरूरत क्या है इन सबकी?”
मीरा ने पहली बार सिर उठाकर जवाब दिया, “जरूरत मेरे बच्चों की है भैया। जब मेरा बेटा स्कूल में सबके सामने शर्मिंदा होता है, तब इज्जत नहीं जाती क्या?”
सुरेश चुप हो गया।
मीरा आगे बोली, “मैंने हमेशा इस घर को अपना घर समझा। दिन-रात काम किया। लेकिन बदले में मेरे बच्चों को इतना भी हक नहीं मिला कि वो एक छोटा सा स्कूल प्रोजेक्ट बना सकें।”
कमला बीच में चिल्लाई, “बहुत जुबान चलने लगी है तेरी!”
“जुबान नहीं जीजी… हिम्मत आई है। और ये हिम्मत मेरे बच्चों के आँसुओं ने दी है।”
आँगन में खामोशी छा गई।
इतने में अंदर से बूढ़ी सास बाहर आईं।
उन्होंने धीरे से कहा, “मीरा गलत नहीं कह रही।”
कमला हैरानी से उन्हें देखने लगी।
सास ने पहली बार बड़ी बहू को डांटा, “बहुत सालों से ये लड़की चुप थी, इसका मतलब ये नहीं कि इसका कोई हक नहीं।”
मीरा की आँखें भर आईं।
उसने धीरे से सिलाई मशीन उठाई और बाहर बरामदे में रख दी।
उस दिन उसने पड़ोस की दो औरतों के कपड़े सिले। शाम तक उसके हाथ में तीन सौ रुपये थे।
वो पैसे उसने आरव के हाथ में रख दिए।
“जा बेटा… अपना साइंस प्रोजेक्ट बना ले।”
आरव खुशी से उछल पड़ा।
“सच मां?”
“हां… और इस बार सबसे अच्छा प्रोजेक्ट बनेगा।”
कुछ ही महीनों में मीरा की सिलाई पूरे मोहल्ले में मशहूर हो गई। लोग दूर-दूर से कपड़े सिलवाने आने लगे।
अब घर का माहौल भी बदलने लगा था।
जो कमला पहले ताने मारती थी, वही अब कई बार मीरा से सलाह लेने लगी।
एक दिन आरव स्कूल से दौड़ता हुआ आया।
“मां! मेरा प्रोजेक्ट पूरे स्कूल में पहला आया है!”
मीरा की आँखों में खुशी के आँसू आ गए।
आरव ने मुस्कुराते हुए कहा, “मां… अब ना… मुझे किसी से डर नहीं लगता।”
मीरा ने बेटे को गले लगा लिया।
उसे समझ आ चुका था कि गरीबी इंसान को कमजोर नहीं बनाती…
कमजोर बनाती है दूसरों के डर में जीने की आदत।

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