बहू की मुस्कान के लिए माँ ने कर दिया सबसे बड़ा त्याग

 

Mother emotionally hugs daughter-in-law after gifting her a special anniversary present in a beautifully decorated Indian home


ड्रॉइंग रूम में रखे बड़े से शोकेस पर धूल की हल्की परत जम गई थी। खिड़की से आती हवा बार-बार परदों को हिला रही थी और रसोई में रखी चाय ठंडी हो चुकी थी। लेकिन सुशीला का ध्यान कहीं और ही था। वह हाथ में पुराना फोटो एल्बम लिए चुपचाप सोफे पर बैठी थी।


एल्बम के पन्नों में उसकी जिंदगी के जाने कितने साल कैद थे।


कहीं पति रमेश के साथ मुस्कुराती तस्वीरें, कहीं बेटे आदित्य के बचपन की शरारतें और कहीं पूरे परिवार की हँसी।


एक तस्वीर पर आकर उसके हाथ ठहर गए।


यह आदित्य और उसकी पत्नी काव्या की शादी की तस्वीर थी।


दोनों कितने खुश लग रहे थे।


लेकिन तस्वीर देखते ही सुशीला की आँखें नम हो गईं।


उसे याद आने लगा कि शादी के बाद उसने कभी भी काव्या को वह अपनापन नहीं दिया जिसकी वह हकदार थी।


काव्या हमेशा पूरे मन से घर संभालती रही। सुबह सबसे पहले उठना, सबकी पसंद का खाना बनाना, सुशीला की दवाइयों का ध्यान रखना, हर रिश्तेदार का आदर करना…


फिर भी सुशीला का मन कभी पूरी तरह उसके लिए नहीं खुल पाया।


पति के गुजर जाने के बाद वह जैसे अंदर से टूट गई थी। उसने धीरे-धीरे सबसे दूरी बना ली थी।


घर में रहती जरूर थी लेकिन मन से कहीं और खोई रहती।


उसी समय दरवाजे की घंटी बजी।


सामने उसकी पड़ोसन मीना खड़ी थी।


“अरे सुशीला, इतनी उदास क्यों बैठी हो?” मीना अंदर आते हुए बोली।


“कुछ नहीं, बस ऐसे ही।”


मीना सोफे पर बैठते हुए उत्साह से बोली—

“सुन, मैंने अपनी बहू के जन्मदिन के लिए बड़ा सरप्राइज प्लान किया है।”


“अच्छा?”


“हाँ, उसकी पसंद का केक, सजावट, गिफ्ट… सब तैयार है। पहली बार वो अपना जन्मदिन शादी के बाद हमारे घर पर मना रही है ना।”


मीना लगातार अपनी तैयारियों के बारे में बताती रही।


सुशीला मुस्कुराकर सुनती रही, लेकिन हर बात उसके दिल में कहीं चुभ रही थी।


उसे याद आया…


तीन महीने पहले काव्या का जन्मदिन था।


उस दिन भी काव्या सुबह से घर के काम में लगी रही थी। उसने शायद उम्मीद की होगी कि ससुराल में उसका पहला जन्मदिन खास तरीके से मनाया जाएगा।


लेकिन सुशीला अपने कमरे में चुपचाप बैठी रही थी।


आदित्य केक लेकर आया जरूर था, लेकिन घर में कोई उत्साह नहीं था।


काव्या ने तब भी मुस्कुराकर सब संभाल लिया था।


उसने कभी शिकायत नहीं की।


यह याद आते ही सुशीला का दिल भारी हो गया।


मीना चली गई, लेकिन उसकी बातें सुशीला के मन में घूमती रहीं।


रात को वह काफी देर तक करवटें बदलती रही।


उसे बार-बार यही महसूस हो रहा था कि उसने अपने दुख में बहू की छोटी-छोटी खुशियों को नजरअंदाज कर दिया।


अचानक उसकी नजर दीवार पर टंगी रमेश की तस्वीर पर गई।


“देख रहे हो ना… मैं कितनी बदल गई हूँ,” वह धीमे से बोली।


आँखों से आँसू बह निकले।


अगली सुबह उसने मन में एक फैसला कर लिया।


नाश्ते के बाद उसने काव्या को आवाज दी—

“बहू, जरा इधर आना।”


“जी माँ।”


“अगले हफ्ते तुम्हारी शादी की सालगिरह है ना?”


काव्या मुस्कुराकर बोली—

“जी माँ, लेकिन आप चिंता मत कीजिए। मैं घर पर ही कुछ अच्छा बना लूँगी।”


“नहीं,” सुशीला ने तुरंत कहा, “इस बार सालगिरह अच्छे से मनाई जाएगी।”


काव्या हैरानी से उसकी तरफ देखने लगी।


“माँ, इसकी क्या जरूरत है?”


“जरूरत है,” सुशीला बोली, “घर में खुशियाँ मनाना जरूरी होता है।”


काव्या कुछ नहीं बोली लेकिन उसके चेहरे पर हल्की चमक आ गई।


उधर आदित्य ऑफिस जाने की तैयारी कर रहा था।


“माँ, आज बड़ी खुश लग रही हो,” वह हँसते हुए बोला।


“बस ऐसे ही,” सुशीला मुस्कुरा दी।


लेकिन उसके मन में अब दूसरी चिंता शुरू हो गई थी।


वह काव्या को कोई अच्छा सा उपहार देना चाहती थी।


लेकिन उसके पास ज्यादा पैसे नहीं थे।


पेंशन का आधा पैसा दवाइयों में चला जाता था और बाकी घर के खर्च में।


वह पूरे दिन सोचती रही।


शाम को उसने अलमारी खोली।


अंदर एक लाल कपड़े में लिपटा छोटा सा डिब्बा रखा था।


उसने धीरे से डिब्बा खोला।


उसमें सोने की पुरानी अंगूठी रखी थी।


यह अंगूठी रमेश ने उनकी 25वीं शादी की सालगिरह पर दी थी।


अंगूठी हाथ में लेते ही उसकी आँखें भर आईं।


उसे वह दिन याद आ गया जब रमेश ने हँसते हुए कहा था—

“देखना, ये अंगूठी हमेशा तुम्हारे पास रहेगी।”


सुशीला काफी देर तक अंगूठी को देखती रही।


फिर गहरी साँस लेते हुए बोली—

“आज अगर तुम होते तो अपनी बहू की खुशी के लिए यही कहते ना कि इसे बेच दो।”


अगले दिन वह चुपचाप बाजार निकल गई।


पहले तो उसके कदम रुक रहे थे।


वह बार-बार सोच रही थी कि क्या सच में उसे अंगूठी बेच देनी चाहिए?


लेकिन फिर काव्या का मुस्कुराता चेहरा याद आते ही उसने खुद को संभाल लिया।


ज्वेलरी की दुकान पर जाकर उसने अंगूठी बेच दी।


अंगूठी के बदले मिले पैसों से उसने काव्या के लिए सुंदर सा सोने का पेंडेंट खरीद लिया।


दुकानदार ने जब डिब्बा पैक करके उसके हाथ में दिया तो उसके चेहरे पर अजीब सा सुकून था।


घर लौटते समय उसने रास्ते से कुछ सजावट का सामान भी खरीद लिया।


धीरे-धीरे सालगिरह का दिन आ गया।


सुबह से ही घर में हलचल शुरू हो गई।


सुशीला खुद रसोई में लगी हुई थी।


“माँ, आप रहने दीजिए ना,” काव्या बार-बार कह रही थी।


“नहीं बहू, आज मैं सब करूँगी।”


आदित्य भी हैरान था।


“माँ, आप इतनी मेहनत मत करो।”


लेकिन सुशीला आज किसी की सुनने के मूड में नहीं थी।


उसने पूरे घर को फूलों और लाइटों से सजाया।


डाइनिंग टेबल पर सुंदर सा मेज़पोश बिछाया।


काव्या की पसंद के सारे व्यंजन बनाए।


शाम तक घर पूरी तरह जगमगा उठा।


रिश्तेदार और पड़ोसी आने लगे।


सब लोग घर की सजावट देखकर तारीफ कर रहे थे।


“वाह सुशीला जी, क्या तैयारी की है!”


सुशीला बस मुस्कुरा रही थी।


कई सालों बाद उसके चेहरे पर ऐसी खुशी दिख रही थी।


थोड़ी देर बाद केक काटने का समय आया।


आदित्य और काव्या साथ खड़े थे।


दोनों ने जैसे ही केक काटा, सबने तालियाँ बजाईं।


काव्या की आँखों में खुशी साफ दिखाई दे रही थी।


शायद उसने कभी उम्मीद नहीं की थी कि उसकी सालगिरह इतनी खास बनेगी।


खाना खाने के बाद सुशीला अपने कमरे में गई और अलमारी से छोटा सा डिब्बा लेकर आई।


“काव्या बेटा, ये तुम्हारे लिए।”


“माँ, आपने फिर गिफ्ट क्यों लिया?”


“खोलकर तो देख।”


काव्या ने जैसे ही डिब्बा खोला, वह हैरान रह गई।


“माँ… ये कितना सुंदर है!”


आदित्य भी मुस्कुराया—

“वाह माँ, आपने तो कमाल कर दिया।”


लेकिन तभी उसकी नजर माँ के हाथों पर गई।


“माँ… आपकी अंगूठी कहाँ है?”


सुशीला चुप हो गई।


आदित्य समझ गया।


“आपने वो अंगूठी बेच दी?”


“बेटा…”


“माँ, वो पापा की निशानी थी!”


सुशीला की आँखें भर आईं लेकिन उसने मुस्कुराने की कोशिश की।


“तेरे पापा की निशानी सिर्फ अंगूठी में नहीं है,” वह बोली, “उनकी सीख में भी है। वो हमेशा कहते थे कि अपने लोगों की खुशियों से बढ़कर कुछ नहीं होता।”


कमरे में सन्नाटा छा गया।


काव्या की आँखों से आँसू बह निकले।


वह तुरंत सुशीला के गले लग गई।


“माँ, मुझे ये गिफ्ट नहीं… आपका प्यार चाहिए था। आज वो मिल गया।”


सुशीला खुद को रोक नहीं पाई।


उसने काव्या को कसकर गले लगा लिया।


उस पल जैसे दोनों के बीच की सारी दूरियाँ खत्म हो गईं।


उधर आदित्य भी भावुक होकर अपनी माँ को देख रहा था।


उसे लग रहा था जैसे इतने सालों बाद उसका घर फिर से घर बन गया हो।


रात को सबके सो जाने के बाद सुशीला अकेली बालकनी में जाकर बैठ गई।


आसमान में चमकते चाँद को देखते हुए उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान थी।


आज बहुत दिनों बाद उसके मन का बोझ हल्का हुआ था।


उसे महसूस हुआ कि दुख कभी खत्म नहीं होते, लेकिन अगर इंसान चाहे तो अपनों की खुशियों के सहारे जीना फिर से सीख सकता है।


उसने मन ही मन तय किया—


अब वह अपने बीते दर्द की छाया कभी अपने बच्चों की जिंदगी पर नहीं पड़ने देगी।


क्योंकि रिश्ते सिर्फ साथ रहने से नहीं निभते…


रिश्ते निभते हैं एक-दूसरे की खुशियों को महसूस करने से।



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