रिश्तों से बड़ा कोई नियम नहीं होता
बालकनी में रखे छोटे-छोटे गमलों में लगे फूल हवा के साथ झूल रहे थे। सामने की सड़क पर बच्चों की साइकिलें दौड़ रही थीं और अपार्टमेंट के पार्क में अलग-अलग देशों के लोग अपने बच्चों के साथ घूम रहे थे। लेकिन उस बड़े से घर के अंदर एक अजीब-सी खामोशी रहती थी, जिसे सिर्फ टीवी की आवाज़ या माइक्रोवेव की बीप तोड़ती थी।
रिया अक्सर उस खामोशी को महसूस करती थी।
भारत छोड़े उसे बारह साल हो चुके थे। पति करण के साथ मिलकर उसने अमेरिका में अपनी दुनिया बना ली थी। दो बेटे थे, अच्छा घर था, बड़ी कार थी, हर सुख-सुविधा थी। बस नहीं था तो रिश्तों का शोर।
न करण के माता-पिता कभी आए थे और न ही रिया के।
जब भी कोई पूछता— “अरे, मम्मी-पापा नहीं आते क्या?”
करण तुरंत जवाब देता— “वीज़ा मिलना बहुत मुश्किल है।”
पहले साल सबने मान लिया। फिर दूसरे साल भी। धीरे-धीरे यही बहाना सच की तरह घर कर गया।
रिया कभी खुलकर कुछ कह नहीं पाती थी। उसे लगता था शायद करण सच कह रहा है। लेकिन अंदर कहीं एक खालीपन था जो हर त्योहार पर और बड़ा हो जाता।
उधर भारत में रिया की छोटी बहन निधि अपने परिवार के साथ सिंगापुर में रहती थी। उसका स्वभाव बिल्कुल अलग था। खुलकर हँसने वाली, रिश्तों को पकड़कर रखने वाली।
वह अक्सर कहती— “दीदी, बच्चे अपने लोगों के बीच रहना सीखेंगे तभी तो परिवार समझेंगे।”
रिया हर बार बात टाल देती।
लेकिन उस साल कुछ अलग हुआ।
करण को कंपनी की तरफ से डेढ़ महीने के लिए कनाडा भेजा गया। जाते-जाते उसने सिर्फ इतना कहा— “घर संभाल लेना। और हाँ, किसी को बुलाने की जरूरत नहीं है। मुझे शोर पसंद नहीं।”
करण के जाते ही निधि ने टिकट बुक कर ली।
फोन पर बोली— “दीदी, इस बार मैं आ रही हूँ। बच्चे भी आएंगे। बस बहुत हो गया।”
रिया एक पल चुप रही। फिर धीरे से बोली— “आ जाओ।”
उस एक वाक्य में जैसे बरसों की दूरी पिघल गई।
निधि खुशी में इतनी उलझ गई कि पैकिंग में क्या रखा, क्या नहीं, उसे खुद याद नहीं रहा। उसके घर में नौकरों की पूरी व्यवस्था थी। बच्चों के पीछे दो हेल्पर घूमते थे। लेकिन वह सब छोड़कर अमेरिका जाने के लिए उत्साहित थी।
उसे लग रहा था जैसे वह छुट्टियां बिताने नहीं, अपना बचपन वापस लेने जा रही हो।
एयरपोर्ट पर दोनों बहनें मिलीं तो कुछ सेकंड तक सिर्फ एक-दूसरे को देखती रहीं। फिर अचानक गले लगकर रो पड़ीं।
बच्चों ने तो उसी पल घर सिर पर उठा लिया।
रिया के दोनों बेटे और निधि की बेटी कुछ ही देर में ऐसे घुल गए जैसे सालों से साथ रहते हों।
कभी वीडियो गेम, कभी पार्क, कभी साइकिल, कभी तकियों की लड़ाई।
घर में पहली बार इतनी आवाज़ें गूँज रही थीं।
रिया शुरू में मुस्कुरा रही थी। लेकिन धीरे-धीरे उसका दूसरा रूप सामने आने लगा।
पहली घटना अगले ही दिन हुई।
बच्चे पार्क से भागते हुए अंदर आए और जूते दरवाजे के पास उतारना भूल गए।
रिया अचानक तेज आवाज़ में बोली— “निधि! बच्चों को कुछ सिखाया नहीं है क्या? पूरा घर गंदा कर दिया।”
निधि ने तुरंत बच्चों को रोका। “अरे बेटा, जूते बाहर।”
फिर मुस्कुराकर बोली— “दीदी, खेलने में भूल गए होंगे।”
लेकिन रिया का चेहरा सख्त था। “मेरे बच्चे कभी ऐसा नहीं करते।”
निधि चुप हो गई।
कुछ देर बाद उसने बच्चों को भूख लगते देख बिस्कुट और केला दे दिया।
रिया फिर बोल पड़ी— “मैं अपने बच्चों को बीच में स्नैक्स नहीं देती। उनकी खाने की आदत खराब होती है।”
“दीदी, अभी खाना बनने में टाइम है इसलिए…”
“तुम अपने बच्चों को जो खिलाना है खिलाओ, मेरे बच्चों को मत दो।”
निधि का हाथ वहीं रुक गया।
उसे पहली बार महसूस हुआ कि उसकी बहन अब पहले जैसी नहीं रही।
शाम को बच्चों ने सोफे पर बैठकर खाना खाने की जिद की।
रिया तुरंत बोली— “डाइनिंग टेबल पर बैठो। हमारे घर में यही नियम है।”
निधि की बेटी थक चुकी थी। धीरे से बोली— “मौसी, यहीं खा लूँ?”
“नहीं। अगर अभी नियम नहीं सीखोगे तो कभी नहीं सीखोगे।”
बच्ची सहम गई।
निधि का दिल भर आया।
उसे याद आया बचपन में यही रिया गर्मियों की छुट्टियों में सब बच्चों को एक ही प्लेट में खिलाती थी। कभी किसी को डाँटती नहीं थी।
अब वही रिया हर बात में नियम, तमीज और तौर-तरीके गिना रही थी।
अगले कुछ दिनों में बात और बढ़ गई।
रिया हर समय तुलना करती रहती।
“मेरे बच्चे इतने स्क्रीन टाइम नहीं लेते।”
“मैं अपने बच्चों को चिल्लाने नहीं देती।”
“तुम बच्चों को बहुत सिर चढ़ाती हो।”
एक दिन तो उसने अपनी सहेली के सामने हँसते हुए कह दिया— “निधि को बचपन से कुछ ढंग नहीं था। अब उसके बच्चे भी वैसे ही हैं।”
निधि वहीं खड़ी सुन रही थी।
उसके कान जलने लगे।
उसे पहली बार समझ आया कि इंसान सिर्फ देश बदलने से नहीं बदलता, कभी-कभी अहंकार उसे पूरी तरह बदल देता है।
उस रात वह बहुत देर तक जागती रही।
सामने गेस्ट रूम में बच्चे एक-दूसरे से लिपटकर सो रहे थे।
रिया के बेटे ने नींद में निधि की बेटी का हाथ पकड़ रखा था।
निधि की आँखें भर आईं।
बच्चों के दिल कितने साफ होते हैं। उन्हें रिश्तों में स्टेटस नहीं दिखता।
अगले दिन उसने चुपचाप अपनी टिकट बदलवा ली।
रिया को कुछ नहीं बताया।
लेकिन जाने से एक रात पहले रिया ने फिर वही बात कह दी— “सच बोलूँ निधि, तुम्हें बच्चों की परवरिश सीखने की जरूरत है।”
इस बार निधि शांत नहीं रही।
उसने पहली बार सीधा जवाब दिया।
“परवरिश सिर्फ नियम सिखाने से नहीं होती दीदी।”
रिया चौंकी।
निधि की आवाज़ भर्रा गई— “परवरिश में अपनापन भी सिखाना पड़ता है। अपने लोगों को जगह देना भी सिखाना पड़ता है। बच्चों को ये भी सीखना चाहिए कि रिश्ते सुविधा से बड़े होते हैं।”
रिया कुछ बोल नहीं पाई।
निधि आगे बोली— “तुम्हारे घर में सबकुछ है दीदी… बस अपनापन नहीं बचा।”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
अगली सुबह बच्चे रो रहे थे।
“मम्मा, हम अभी क्यों जा रहे हैं?”
“मौसी के घर और रुकना है…”
रिया के छोटे बेटे ने निधि को पकड़ लिया। “मासी, फिर कब आओगी?”
निधि ने खुद को संभाला। मुस्कुराकर बोली— “जल्दी आऊँगी।”
लेकिन अंदर से वह जानती थी, अब शायद कभी नहीं आएगी।
एयरपोर्ट जाते समय कार में कोई बात नहीं हुई।
रिया बस खिड़की से बाहर देखती रही।
घर लौटकर उसने पहली बार अपने बड़े से घर को ध्यान से देखा।
सबकुछ व्यवस्थित था। साफ-सुथरा। शांत।
लेकिन बहुत खाली।
इतना खाली कि अपने कदमों की आवाज़ भी चुभ रही थी।
उसी रात उसका बड़ा बेटा बोला— “मम्मा, मासी का घर ज्यादा अच्छा लगता है।”
रिया ने पूछा— “क्यों?”
बेटे ने मासूमियत से कहा— “वहाँ सब साथ में हँसते हैं।”
रिया के हाथ वहीं रुक गए।
बरसों बाद उसे महसूस हुआ कि शायद उसने घर को इतना परफेक्ट बनाने की कोशिश में उसे घर जैसा रहने ही नहीं दिया।

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