जब बहू को अपनी गलती का एहसास हुआ
“जिस घर में अपनापन बचा रहे, वहाँ छोटी-छोटी गलतफहमियाँ भी ज्यादा देर टिक नहीं पातीं…”
आँगन में रखी तुलसी के पास खड़ी सुमित्रा देवी चुपचाप कपड़ों की रस्सी से सूखे कपड़े उतार रही थीं। उम्र ढल चुकी थी, लेकिन आदतें अब भी वही पुरानी थीं—घर के हर सदस्य का ध्यान रखना, बिना कुछ कहे सबकी जरूरत समझ जाना।
तभी अंदर से तेज आवाज आई—
“माँजी, आप फिर दीदी की ही मदद कर रही हैं ना?”
सुमित्रा देवी ने पलटकर देखा। छोटी बहू रानी दरवाज़े पर खड़ी थी। चेहरे पर नाराज़गी साफ दिखाई दे रही थी।
“क्या हुआ बहू?” सुमित्रा देवी ने प्यार से पूछा।
रानी होंठ फुलाकर बोली, “कुछ नहीं माँजी… बस इतना समझ आ गया कि इस घर में बड़ी बहू की ज्यादा अहमियत है। मैं तो शायद सिर्फ काम करने के लिए आई हूँ।”
इतने में बड़ी बहू पूजा भी रसोई से बाहर आ गई।
“अरे रानी, फिर क्या हो गया?” उसने शांत स्वर में पूछा।
रानी तुरंत बोली, “दीदी, आप बीच में मत बोलिए। मैं माँजी से बात कर रही हूँ। अभी मैंने देखा, माँजी आपके कमरे की अलमारी ठीक कर रही थीं। कभी मेरे कमरे में तो नहीं आतीं।”
सुमित्रा देवी हल्का सा मुस्कुराईं।
“अरे बहू, पूजा सुबह से रसोई में लगी हुई थी, इसलिए मैंने सोचा उसका थोड़ा हाथ बँटा दूँ।”
रानी तुनककर बोली, “तो मेरा हाथ कौन बँटाएगा? मैं भी तो इस घर की बहू हूँ।”
पूजा प्यार से बोली, “रानी, अगर तुम्हें कोई काम था तो मुझे बोल देती। हम दोनों मिलकर कर लेते।”
लेकिन रानी अब किसी की सुनने के मूड में नहीं थी।
“बस यही तो बात है दीदी… हर बार आप ही आगे क्यों रहती हैं? मुझे भी तो अपनी जगह बनानी है इस घर में।”
पूजा और सुमित्रा देवी एक-दूसरे का चेहरा देखने लगीं। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि अचानक रानी इतना बदल क्यों गई।
असल में पिछले कुछ दिनों से पड़ोस की कमला चाची अक्सर रानी के पास बैठने लगी थीं।
वो हर रोज एक ही बात कहतीं—
“देख लेना बहू, अभी से अपना हक नहीं जमाया ना, तो आगे चलकर सारा काम तुमसे करवाएँगे। बड़ी बहू तो चालाक लगती है मुझे।”
धीरे-धीरे रानी उन बातों को सच मानने लगी।
अब उसे हर छोटी बात में भेदभाव दिखाई देने लगा था।
एक दिन रानी ने जानबूझकर कहा—
“माँजी, मेरी चप्पल टूट गई है। ज़रा बाज़ार से सिलवा दीजिए ना।”
पूजा तुरंत बोली, “रानी, मैं जाते वक्त दे आऊँगी।”
लेकिन रानी तुरंत बोल पड़ी, “नहीं दीदी, हर काम आप ही क्यों करेंगी? माँजी भी तो कर सकती हैं।”
सुमित्रा देवी ने बिना कुछ कहे चप्पल उठा ली।
उनकी उम्र ज्यादा थी। घुटनों में दर्द भी रहता था। फिर भी वो धीरे-धीरे चलकर चप्पल ठीक करवाने चली गईं।
जब पूजा को पता चला तो उसे बहुत बुरा लगा।
“माँजी, आपने मुझे क्यों नहीं बताया?”
सुमित्रा देवी धीमे स्वर में बोलीं, “घर में शांति बनी रहे बहू… इसलिए चुप रही।”
पूजा की आँखें भर आईं।
उधर रानी को लगने लगा कि अब उसकी बातों का असर होने लगा है।
कुछ दिन बाद उसने फिर कहा—
“माँजी, आज मेरा सिर बहुत दर्द कर रहा है। आप ज़रा मेरा कमरा साफ कर दीजिए।”
पूजा ने तुरंत कहा, “मैं कर देती हूँ।”
लेकिन रानी फिर बोल पड़ी—
“नहीं दीदी, आप रहने दीजिए। माँजी को भी तो पता चले कि छोटी बहू की मदद कैसी की जाती है।”
सुमित्रा देवी चुपचाप झाड़ू उठाने लगीं।
पूजा अब खुद को रोक नहीं पाई।
वो रानी के पास गई और बोली—
“रानी, एक बात पूछूँ? क्या तुम अपनी माँ से भी ऐसे काम करवाती थीं?”
रानी कुछ पल के लिए चुप हो गई, लेकिन फिर बोली—
“दीदी, आप मुझे गलत साबित करना चाहती हैं।”
पूजा ने प्यार से उसका हाथ पकड़ा।
“नहीं रानी… मैं सिर्फ तुम्हें समझाना चाहती हूँ। माँजी अब पहले जैसी ताकतवर नहीं रहीं। उन्हें आराम की जरूरत है, काम की नहीं।”
लेकिन कमला चाची की बातें रानी के दिमाग में इतनी भर चुकी थीं कि उसे अपने लोग भी गलत लगने लगे।
उस रात उसने अपने पति मोहित से कहा—
“अब मैं इस घर में नहीं रह सकती। यहाँ हमेशा मुझे छोटा महसूस करवाया जाता है।”
मोहित हैरान रह गया।
“ये कैसी बातें कर रही हो रानी? भाभी और माँ ने तुम्हें कब कुछ कहा?”
रानी रोते हुए बोली, “आपको तो बस अपनी माँ और भाभी ही सही लगती हैं।”
पत्नी के आँसू देखकर मोहित भी परेशान हो गया।
अगली सुबह उसने माँ से कहा—
“माँ, अगर ऐसे ही चलता रहा तो शायद हमें अलग होना पड़े।”
सुमित्रा देवी के हाथ से पानी का गिलास छूटते-छूटते बचा।
“बेटा… इतनी छोटी सी बात पर घर टूट जाएगा?”
इतने में पूजा भी वहाँ आ गई।
“देवर जी, आखिर हुआ क्या है?”
मोहित कुछ बोल पाता उससे पहले रानी बोल पड़ी—
“दीदी, अब आप बीच में मत पड़िए। मैं अलग रहना चाहती हूँ।”
पूजा ने गहरी साँस ली।
फिर शांत आवाज में बोली—
“ठीक है रानी… अगर तुम्हें लगता है कि हम तुम्हारे अपने नहीं हैं, तो मैं कुछ नहीं कहूँगी। लेकिन एक बात याद रखना… बाहर वाले लोग सिर्फ आग लगाते हैं, घर नहीं बचाते।”
रानी चौंक गई।
“क्या मतलब?”
पूजा बोली—
“मतलब ये कि जो लोग तुम्हें हमारे खिलाफ भड़का रहे हैं, वो तुम्हारे दुख में कभी साथ नहीं देंगे।”
इतने में मोहित भी समझ गया कि बात कहाँ से शुरू हुई थी।
वो बोला—
“रानी, मैंने भी कई बार देखा है, कमला चाची तुम्हारे कान भरती रहती हैं। लेकिन तुमने कभी मेरी बात नहीं मानी।”
अब पहली बार रानी थोड़ा घबराई।
उसे एहसास होने लगा कि शायद सच में वो दूसरों की बातों में आ गई थी।
तभी पूजा ने धीरे से कहा—
“रानी, अगर हम तुम्हें बोझ समझते, तो क्या माँजी तुम्हारे लिए रात को जाग-जागकर काढ़ा बनातीं जब तुम्हें बुखार हुआ था?”
“क्या मैंने कभी तुम्हें अकेले रसोई में छोड़ा?”
“क्या माँजी ने कभी तुम्हें बहू नहीं, बेटी की तरह नहीं रखा?”
रानी की आँखें भर आईं।
उसे एक-एक बात याद आने लगी।
शादी के बाद कैसे पूजा ने उसे हर काम प्यार से सिखाया था…
कैसे सुमित्रा देवी उसकी पसंद का खाना बनाती थीं…
कैसे इस घर में किसी ने कभी उसे अकेला महसूस नहीं होने दिया…
फिर भी उसने उन्हीं लोगों का दिल दुखाया।
रानी रोते हुए सुमित्रा देवी के पैरों में बैठ गई।
“माँजी… मुझे माफ कर दीजिए। मैंने दूसरों की बातों में आकर बहुत गलत व्यवहार किया।”
सुमित्रा देवी ने तुरंत उसे उठाकर गले लगा लिया।
“पगली… अपने बच्चों से कोई नाराज़ रहता है क्या?”
पूजा भी मुस्कुरा दी।
“चलो, अब ये सब खत्म करो। और हाँ… आगे से कोई बाहर वाला हमारे रिश्तों के बीच नहीं आएगा।”
रानी ने आँसू पोंछते हुए सिर हिला दिया।
कुछ दिन बाद जब कमला चाची फिर घर आईं तो रानी मुस्कुराकर बोली—
“चाची, अब आप हमारे घर की चिंता मत कीजिए। हम सब बहुत खुश हैं… और हमेशा साथ रहेंगे।”
कमला चाची समझ गईं कि अब उनकी दाल नहीं गलने वाली।
वो चुपचाप वहाँ से चली गईं।
धीरे-धीरे घर फिर पहले जैसा हँसी-खुशी से भर गया।
अब रानी और पूजा दोनों मिलकर काम करतीं और सुमित्रा देवी को आराम करने देतीं।
कभी तीनों साथ बैठकर चाय पीतीं, तो कभी हँसते-हँसते पुरानी बातें याद करतीं।
सुमित्रा देवी अक्सर भगवान से बस यही प्रार्थना करतीं—
“हे प्रभु, हर घर में रिश्तों का प्यार ऐसे ही बना रहे… क्योंकि जहाँ अपनापन होता है, वहाँ कोई तीसरा इंसान दीवार नहीं खड़ी कर सकता…”

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