प्यार या कैद…? जब रिश्ते में भरोसा मर जाए
“कुछ रिश्ते टूटते नहीं… बस इंसान को अंदर से थोड़ा-थोड़ा खत्म करते रहते हैं…”
कॉलेज के बाहर बनी छोटी सी कॉफी शॉप में बैठा विवान लगातार दरवाज़े की तरफ देख रहा था। सामने रखी कॉफी कब की ठंडी हो चुकी थी, लेकिन उसकी बेचैनी कम नहीं हो रही थी।
करीब पाँच साल बाद आज उसने अनन्या को मिलने के लिए बुलाया था।
वही अनन्या… जिसके साथ उसने जिंदगी बिताने के सपने देखे थे।
वही अनन्या… जो एक दिन बिना कोई वजह बताए उसकी जिंदगी से चली गई थी।
तभी कॉफी शॉप का दरवाज़ा खुला।
हल्के नीले रंग का सूट पहने अनन्या अंदर आई। चेहरे पर वही सादगी थी… लेकिन आंखों में पहले वाली चमक नहीं थी।
दोनों की नज़रें मिलीं।
कुछ पल के लिए जैसे समय रुक गया।
अनन्या धीरे से सामने वाली कुर्सी पर बैठ गई।
“कैसी हो?” विवान ने हिम्मत जुटाकर पूछा।
“ठीक हूं।” छोटा सा जवाब था उसका।
फिर दोनों के बीच चुप्पी फैल गई।
आखिर विवान खुद को रोक नहीं पाया।
“इतने सालों बाद भी मुझे समझ नहीं आया अनन्या… तुम गई क्यों थीं? मैंने तुम्हें हर जगह ढूंढा… तुम्हारे दोस्तों से पूछा… तुम्हारे ऑफिस तक गया… लेकिन तुमने कभी पलटकर नहीं देखा।”
अनन्या हल्का सा मुस्कुराई… मगर वो मुस्कान दर्द से भरी थी।
“क्योंकि अगर रुक जाती… तो शायद खुद को खो देती।”
विवान उसकी बात समझ नहीं पाया।
“मतलब?”
अनन्या ने उसकी आंखों में देखते हुए कहा—
“तुम्हें याद है विवान… जब मैं ऑफिस में होती थी तो तुम हर आधे घंटे में वीडियो कॉल कर देते थे।”
“वो तो बस केयर थी…”
“केयर?” अनन्या की आवाज़ थोड़ी भारी हो गई, “किसी की सांसों तक पर नजर रखना केयर नहीं होती विवान… घुटन होती है।”
विवान चुप हो गया।
अनन्या बोलती रही—
“मैं मीटिंग में होती थी तो तुम दस-दस मिस्ड कॉल कर देते थे। अगर मैं किसी मेल का जवाब देने में बिज़ी होती, तो तुम पूछते—‘इतनी देर किससे चैट कर रही थी?’”
“क्योंकि मैं तुमसे बहुत प्यार करता था…” विवान की आवाज़ भर्रा गई।
अनन्या ने उसकी तरफ देखा, फिर धीमे से सिर हिलाया।
“नहीं विवान… प्यार किसी को हर पल शक की निगाहों से देखने का नाम नहीं होता। प्यार भरोसा देता है… सुकून देता है… ना कि हर वक्त किसी पर पहरा बिठा दे। जिस रिश्ते में इंसान को हर बात की सफाई देनी पड़े, वहां प्यार धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है…”
उसकी बातें सीधे विवान के दिल में उतर रही थीं।
पास वाली टेबल पर बैठे लोग हंस रहे थे… वेटर ऑर्डर ले रहे थे… लेकिन उन दोनों के बीच जैसे सिर्फ पुरानी तकलीफें बैठी थीं।
“तुम्हें पता है,” अनन्या फिर बोली, “मैंने धीरे-धीरे अपने दोस्तों से बात करना बंद कर दिया था… सिर्फ इसलिए क्योंकि तुम्हें शक होता था।”
विवान ने नजरें झुका लीं।
“तुम्हें मेरा किसी लड़के से बात करना पसंद नहीं था… लेकिन धीरे-धीरे तुम्हें मेरा किसी से भी बात करना पसंद नहीं रहा। यहां तक कि अपनी बहन के साथ बाहर जाऊं तो भी तुम हर घंटे लोकेशन मांगते थे।”
“मैं बस तुम्हें खो देने से डरता था…” विवान की आवाज़ धीमी पड़ गई।
अनन्या ने उसकी आंखों में देखते हुए हल्की कड़वाहट से कहा—
“और उसी डर ने तुम्हें इतना बदल दिया… कि आखिरकार तुमने मुझे सच में खो दिया।”
विवान के पास कोई जवाब नहीं था।
अनन्या ने पानी का गिलास उठाया और एक लंबी सांस ली।
“तुम्हें याद है एक बार मैं अपनी दोस्त की शादी में गई थी?”
विवान धीरे से बोला, “हां…”
“उस दिन मैंने सिर्फ दो घंटे फोन नहीं उठाया था… और तुमने मेरे भाई तक को फोन कर दिया था। तुम्हें अंदाजा भी है मुझे कितनी शर्मिंदगी हुई थी?”
विवान की आंखें भर आईं।
“मैं पागल था अनन्या… सच में। लेकिन इन पांच सालों में मैंने खुद को समझा है। मैंने जाना कि प्यार किसी को बांधना नहीं होता।”
अनन्या हल्का सा मुस्कुराई।
“कई बार इंसान सही बात बहुत देर से समझता है।”
“तो एक मौका दे दो…” विवान की आवाज़ कांप गई, “मैं सच में बदल गया हूं।”
अनन्या कुछ पल उसे देखती रही।
फिर उसने धीरे से पूछा—
“क्या तुम जानते हो… तुम्हारे जाने के बाद मुझे सबसे ज्यादा क्या अच्छा लगा?”
विवान ने ना में सिर हिलाया।
“चैन की नींद।”
उसका जवाब सुनकर विवान अंदर तक टूट गया।
“मैं रात को बिना डर के सो पाती थी कि अब कोई अचानक कॉल करके पूछेगा नहीं—‘ऑनलाइन क्यों थी?’… मैं बिना सफाई दिए हंस पाती थी… बिना डर के किसी दोस्त से बात कर पाती थी।”
उसकी आंखों में आंसू आ चुके थे।
“रिश्ता अगर इंसान की आज़ादी छीन ले… तो वो रिश्ता नहीं, कैद बन जाता है विवान।”
विवान की पलकों से भी आंसू गिर पड़े।
“मैंने तुम्हें बहुत दर्द दिया ना…?”
अनन्या ने तुरंत जवाब नहीं दिया।
कुछ पल बाद बोली—
“तुम बुरे इंसान नहीं थे… बस तुम्हारे अंदर डर बहुत ज्यादा था। और डर जब प्यार से बड़ा हो जाए… तो रिश्ता टूट ही जाता है।”
कॉफी शॉप के बाहर बारिश शुरू हो चुकी थी।
लोग भागते हुए अंदर आ रहे थे।
लेकिन उन दोनों के बीच अब एक अजीब सी शांति थी।
विवान ने कांपती आवाज़ में कहा—
“क्या हमारी कहानी यहीं खत्म हो गई?”
अनन्या ने उसकी तरफ देखा।
उसकी आंखों में अब शिकायत नहीं थी… सिर्फ थकान थी।
“कुछ कहानियां पूरी नहीं होतीं विवान… लेकिन अधूरी होकर भी बहुत कुछ सिखा जाती हैं।”
इतना कहकर उसने अपना बैग उठाया।
विवान ने आखिरी बार उसका हाथ पकड़ लिया।
“रुक जाओ ना…”
अनन्या ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया।
“पहले मुझे खुद से मिलना था… इसलिए तुमसे दूर जाना जरूरी था।”
वो मुड़ी और दरवाज़े की तरफ बढ़ गई।
विवान उसे जाते हुए देखता रहा।
बारिश अब तेज़ हो चुकी थी।
अनन्या बाहर भीगते हुए सड़क पार कर रही थी… और विवान को पहली बार समझ आ रहा था—
प्यार किसी को हर पल पकड़कर रखने में नहीं…
बल्कि उसे खुलकर जीने देने में होता है।
कॉफी शॉप में धीमी आवाज़ में पुराना गाना बज रहा था—
“कुछ लोग ज़िंदगी में आते हैं… सिर्फ हमें बेहतर इंसान बनाकर चले जाने के लिए…”

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