बहू और बेटी में फर्क करने की भूल
घर में शांति का माहौल था। आँगन में दिया जल रहा था और रसोई से पकौड़ों की खुशबू आ रही थी। लेकिन फिर भी शारदा देवी के चेहरे पर हल्की चिंता साफ दिखाई दे रही थी।
उधर रसोई में काम करती रश्मि धीरे-धीरे बड़बड़ा रही थी। उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि वह किसी बात से नाराज़ है।
“पूरे घर की जिम्मेदारी मेरे ऊपर डाल दी है… किसी को मेरी परवाह ही नहीं है। सबको बस अपनी बेटी की चिंता रहती है।”
इतने में उसकी ननद पूजा का फोन आया। रश्मि ने फोन उठाया तो उधर से पूजा खुशी से बोली—
“भाभी, इस बार राखी पर मैं नहीं आ पाऊँगी। बच्चों के एग्जाम हैं। लेकिन मैंने आपके लिए एक साड़ी भेजी है। उम्मीद है आपको पसंद आएगी।”
रश्मि ने हल्के ठंडे स्वर में कहा— “अरे इसकी क्या जरूरत थी? आप तो वैसे भी मम्मी-पापा की लाडली हो। सब कुछ तो आपके लिए ही आता है।”
पूजा कुछ पल चुप रही। फिर मुस्कुराकर बोली— “भाभी, मैं उनकी बेटी जरूर हूँ, लेकिन आप इस घर की बहू नहीं, बेटी जैसी ही हो।”
रश्मि ने बिना जवाब दिए फोन रख दिया।
पास ही बैठे उसके पति अमित ने सारी बातें सुन ली थीं। वह धीरे से बोला— “रश्मि, हर बात में तुलना करना जरूरी है क्या?”
रश्मि झुंझलाकर बोली— “हाँ, क्योंकि इस घर में हमेशा पूजा दीदी की ही बात होती है। कभी किसी ने मेरे लिए क्या किया?”
अमित शांत रहा। वह जानता था कि बहस से बात और बिगड़ जाएगी।
अगले दिन शारदा देवी अपने पति रामप्रसाद जी से कह रही थीं— “सुनिए, पूजा की सास की तबीयत खराब रहती है। मैंने सोचा इस बार अपनी पुरानी सोने की चूड़ियाँ उसे दे दूँ। लड़की को भी तो सहारा लगता है।”
रश्मि वहीं से गुजर रही थी। उसने सारी बात सुन ली।
उसके चेहरे का रंग बदल गया।
रात को कमरे में आते ही वह अमित पर बरस पड़ी— “वाह! आपकी मम्मी ने तो फैसला भी कर लिया। सारे गहने बेटी को दे देंगी। और मैं क्या हूँ इस घर में?”
अमित ने गहरी सांस ली और बोला— “रश्मि, वो उनकी बेटी है।”
“तो मैं क्या पराई हूँ?” रश्मि ने तुरंत जवाब दिया।
अमित बोला— “अगर तुम्हारे मम्मी-पापा तुम्हें कुछ दें तो तुम्हें अच्छा लगेगा ना?”
रश्मि चुप हो गई।
अमित फिर बोला— “फिर मेरी माँ अपनी बेटी के बारे में सोच लें तो गलत कैसे हो गया?”
रश्मि ने बात बदल दी, लेकिन उसके मन में जलन बनी रही।
कुछ दिनों बाद घर में जन्माष्टमी की तैयारी शुरू हुई। पूरे घर में सजावट हो रही थी। पूजा भी बच्चों के साथ मायके आई हुई थी। वह आते ही रसोई में शारदा देवी की मदद करने लगी।
रश्मि को यह बिल्कुल अच्छा नहीं लगा।
दोपहर में पड़ोस की विमला चाची आईं। उन्होंने हँसते हुए कहा— “अरे शारदा, तेरी बेटी तो आज भी तुझे उतना ही संभालती है जितना शादी से पहले संभालती थी।”
शारदा देवी मुस्कुराईं— “बेटियाँ शादी के बाद भी अपने माँ-बाप का दिल नहीं छोड़तीं।”
रश्मि को यह बात ताने जैसी लगी।
उसी रात उसने अमित से कहा— “सच बताइए, क्या पापा जी घर पूजा दीदी के नाम करने वाले हैं?”
अमित चौंक गया। “तुम्हारे मन में ये सब चल क्या रहा है?”
रश्मि बोली— “मैं सब समझती हूँ। धीरे-धीरे सब कुछ बेटी को दे देंगे।”
अमित ने पहली बार थोड़ा सख्त होकर कहा— “रश्मि, रिश्ते भरोसे से चलते हैं, हिसाब-किताब से नहीं।”
लेकिन रश्मि पर कोई असर नहीं हुआ।
कुछ दिन बाद रामप्रसाद जी ने जानबूझकर एक बात ऊँची आवाज में कही— “शारदा, मैंने बैंक के कुछ जरूरी कागज पूजा के पास रखवा दिए हैं। समय का क्या भरोसा।”
रश्मि ने यह सुन लिया।
अब उसकी बेचैनी और बढ़ गई।
अगले कई दिनों तक उसका व्यवहार चिड़चिड़ा बना रहा। वह छोटी-छोटी बातों पर नाराज़ हो जाती।
एक शाम उसकी छोटी बेटी परी स्कूल से रोती हुई घर आई।
रश्मि ने घबराकर पूछा— “क्या हुआ?”
परी रोते हुए बोली— “मम्मी, आज टीचर ने पूछा कि बड़ा होकर क्या बनोगे। मैंने कहा मैं आपके जैसी बनूँगी। तो सब हँसने लगे। उन्होंने कहा आपकी मम्मी तो हमेशा गुस्सा करती रहती हैं।”
बेटी की बात सुनकर रश्मि जैसे अंदर तक हिल गई।
रात को वह देर तक जागती रही।
उसे अमित की बात याद आई— “आज जैसा तुम अपने बड़ों के साथ करोगी, कल बच्चे वही सीखेंगे।”
उसकी आँखों के सामने शारदा देवी का चेहरा घूमने लगा, जो हर बार उसकी कड़वी बात सुनकर भी चुप रह जाती थीं।
अगली सुबह पहली बार रश्मि बिना कहे शारदा देवी के पास गई और बोली— “माँजी, चाय बना दूँ?”
शारदा देवी ने आश्चर्य से उसकी ओर देखा। फिर मुस्कुराकर बोलीं— “हाँ बहू, साथ में बैठकर पिएंगे।”
धीरे-धीरे रश्मि का व्यवहार बदलने लगा।
अब वह पूजा से भी प्यार से बात करने लगी। उसे समझ आने लगा था कि बेटी को कुछ देना बहू से प्यार कम करना नहीं होता।
कुछ महीनों बाद रामप्रसाद जी ने पूरे परिवार को बैठाया और एक फाइल रश्मि के हाथ में देते हुए बोले— “बहू, ये घर हमने अमित और तुम्हारे नाम बहुत पहले ही कर दिया था।”
रश्मि हैरान रह गई।
उसकी आँखों से आँसू निकल पड़े।
वह तुरंत शारदा देवी के पैरों में बैठ गई— “माँजी, मुझे माफ कर दीजिए। मैंने आपको बहुत गलत समझा।”
शारदा देवी ने उसे उठाकर गले लगा लिया।
रामप्रसाद जी मुस्कुराते हुए बोले— “बेटी और बहू में फर्क करने वाले घर कभी खुश नहीं रहते। और जो बहू को बेटी बना लें, वहाँ बरकत अपने आप आ जाती है।”
उस दिन पहली बार रश्मि को एहसास हुआ कि संपत्ति से बड़ा सुख अपनापन होता है… और जिस घर में सम्मान और प्यार हो, वहाँ इंसान सच में अमीर होता है।

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