बड़ा दिल ही असली अमीरी है

Kind-hearted Indian businessman helping a sick elderly factory worker while employees watch emotionally inside a busy factory.


बरामदे में रखे बड़े से झूले पर बैठी रिद्धिमा अपनी दादी को मोबाइल में तस्वीरें दिखा रही थी। चेहरे पर खुशी साफ झलक रही थी। आखिर पूरे दो साल बाद उसे अपने मामा के घर जाने का मौका मिला था।


मामा जी शहर के बहुत बड़े व्यापारी थे। उनका नाम पूरे इलाके में सम्मान से लिया जाता था। बड़ा सा बंगला, कई गाड़ियां, नौकर-चाकर, फैक्ट्री और लंबा-चौड़ा कारोबार। लेकिन सबसे खास बात यह थी कि इतने बड़े आदमी होने के बावजूद उनके व्यवहार में जरा भी घमंड नहीं था।


रिद्धिमा बचपन से ही उनके घर जाना पसंद करती थी। वहां हर किसी के चेहरे पर अपनापन दिखता था। इस बार कॉलेज की छुट्टियां थीं, इसलिए मां ने उसे पूरे डेढ़ महीने के लिये मामा जी के घर भेज दिया।


जैसे ही वह वहां पहुंची, गेट पर खड़े चौकीदार ने मुस्कुराकर कहा—

“अरे बिटिया आ गईं... साहब सुबह से आपका ही इंतजार कर रहे थे।”


अंदर पहुंचते ही मामी जी ने उसे गले लगा लिया। तभी सीढ़ियों से उतरते हुए मामा जी बोले—

“अरे हमारी रिद्धिमा तो बिल्कुल बड़ी हो गई।”


रिद्धिमा हंस पड़ी।

मामा जी हमेशा उसे ऐसे ही प्यार से बुलाते थे।


घर बहुत बड़ा था। हर चीज आलीशान थी। लेकिन सबसे ज्यादा हैरानी रिद्धिमा को इस बात की होती कि घर का हर नौकर मामा जी को दिल से मानता था। कोई उनसे डरता नहीं था, बल्कि उनका सम्मान करता था।


अगले दिन मामा जी फैक्ट्री जाने लगे तो उन्होंने रिद्धिमा से कहा—

“चलो, आज तुम्हें अपना काम भी दिखा देता हूं।”


रिद्धिमा खुशी से उनके साथ चल दी।


फैक्ट्री पहुंचते ही उसने देखा कि वहां सैकड़ों लोग काम कर रहे थे। कोई मशीन चला रहा था, कोई सामान पैक कर रहा था। मामा जी हर किसी से नाम लेकर बात कर रहे थे।


तभी एक बुजुर्ग कर्मचारी धीरे-धीरे चलते हुए आया। उसके हाथ कांप रहे थे।


मामा जी तुरंत उसके पास पहुंचे और बोले—

“रामू काका, आपकी तबीयत ठीक नहीं लग रही। डॉक्टर को दिखाया कि नहीं?”


वह आदमी झेंपते हुए बोला—

“साहब, बस हल्का बुखार है।”


मामा जी ने तुरंत अपने मैनेजर से कहा—

“इन्हें अभी अस्पताल ले जाओ। और सुनो, जब तक ये ठीक नहीं हो जाते इनकी पूरी तनख्वाह घर पहुंचनी चाहिए।”


रामू काका की आंखें भर आईं।


रिद्धिमा सब देख रही थी।


कुछ देर बाद फैक्ट्री के बाहर एक ठेले वाला फल बेच रहा था। मामा जी उसके पास जाकर बोले—

“आज आम कितने के दिये?”


ठेले वाला बोला—

“साहब, सौ रुपये किलो।”


मामा जी बोले—

“अरे भाई, इतना महंगा क्यों? अस्सी लगा।”


ठेले वाला मुस्कुराकर बोला—

“आप भी ना साहब…”


आखिर बात पचासी में तय हो गई।


रिद्धिमा को बड़ा अजीब लगा। करोड़ों के मालिक होकर भी मामा जी बीस रुपये के लिये मोलभाव कर रहे थे।


लेकिन अगले ही पल मामा जी ने उससे पांच किलो आम खरीदे और जाते-जाते बोले—

“दो किलो अलग रख देना... अपने बच्चों के लिये।”


ठेले वाले की आंखें चमक उठीं।


गाड़ी में बैठते ही रिद्धिमा खुद को रोक नहीं पाई।

“मामा जी, आप इतने अमीर हैं फिर भी पैसे कम क्यों करवा रहे थे?”


मामा जी हल्का सा मुस्कुराये।

“अगर मैं बिना पूछे ज्यादा पैसे दे दूं तो वह हर ग्राहक से वही उम्मीद करेगा। लेकिन बच्चों के लिये फल देना अलग बात है। कमाई अपनी जगह है और इंसानियत अपनी जगह।”


रिद्धिमा चुप हो गई।


कुछ दिनों बाद घर में काम करने वाली मीना रोती हुई आई। उसकी बेटी की शादी तय हुई थी लेकिन पैसों की बहुत परेशानी थी।


मामी जी ने उसे बैठाकर पानी पिलाया। फिर मामा जी से बोलीं—

“कुछ करना पड़ेगा।”


मामा जी तुरंत अंदर गये और एक लिफाफा लाकर मीना को दे दिया।


मीना घबराकर बोली—

“साहब मैं इतना पैसा कैसे लौटा पाऊंगी?”


मामा जी हंस पड़े।

“किसने कहा लौटाने को? बेटी की शादी अच्छे से करना... बस।”


मीना उनके पैर पकड़कर रोने लगी।


रिद्धिमा यह सब देखती रहती और हर दिन कुछ नया सीखती।


एक दिन वह छत पर खड़ी थी। नीचे मामा जी माली को डांट रहे थे।

“इतनी धूप में काम क्यों कर रहे हो? पहले खाना खाओ फिर काम करना।”


माली सिर झुकाकर खड़ा था।


रिद्धिमा नीचे आई और बोली—

“आप हर किसी को डांटते क्यों रहते हैं?”


मामा जी हंस पड़े।

“जिससे अपनापन होता है ना, इंसान उसी पर हक जताता है।”


धीरे-धीरे रिद्धिमा समझने लगी कि बड़े होने का मतलब सिर्फ पैसा नहीं होता। बड़ा इंसान वह होता है जिसके दिल में दूसरों के लिये जगह हो।


एक दिन मामा जी उसे अपने पुराने मोहल्ले में ले गये। वहां छोटे-छोटे मकान थे। तंग गलियां थीं।


एक पुराने घर के सामने रुककर मामा जी बोले—

“यहीं मैं बड़ा हुआ हूं।”


अंदर एक बूढ़ी अम्मा चारपाई पर बैठी थीं। मामा जी ने झुककर उनके पैर छुए।


रिद्धिमा हैरान रह गई।


वापस आते समय उसने पूछा—

“आप इतने बड़े आदमी होकर भी यहां आते हैं?”


मामा जी धीरे से बोले—

“जिस मिट्टी से इंसान जुड़ा हो, उसे कभी नहीं भूलना चाहिए।”


डेढ़ महीना कब बीत गया, रिद्धिमा को पता ही नहीं चला।


जिस दिन उसके पापा उसे लेने आये, मामी जी ने ढेर सारे कपड़े और मिठाइयां रख दीं। लेकिन रिद्धिमा की आंखें सिर्फ मामा जी को देख रही थीं।


जाते-जाते उसने धीरे से कहा—

“मामा जी, यहां आकर मुझे समझ आया कि अमीर होना बड़ी बात नहीं है... बड़ा दिल होना बड़ी बात है।”


मामा जी ने उसके सिर पर हाथ रखा।

“बस यही बात हमेशा याद रखना। जिंदगी में कितनी भी ऊंचाई पर पहुंच जाओ, किसी छोटे इंसान को छोटा मत समझना।”


रिद्धिमा की आंखें भर आईं।


घर लौटते समय वह रास्ते भर खिड़की से बाहर देखती रही।

उसे लग रहा था जैसे वह पहले वाली रिद्धिमा रही ही नहीं।



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