जब बहू ने घर के नियमों के आगे झुकने से इनकार कर दिया
“जिस रिश्ते में सम्मान की जगह हिसाब-किताब शुरू हो जाए… वहाँ प्यार धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है…”
डाइनिंग टेबल पर स्टील की प्लेटें करीने से रखी थीं। घर के सभी लोग चुपचाप बैठे थे। लेकिन माहौल में ऐसी खामोशी थी, जैसे किसी तूफान के आने से पहले हवा थम जाती है।
मीरा जैसे ही ऑफिस से घर लौटी, उसने देखा कि उसकी सास शारदा देवी ने सबको हॉल में बुला रखा है। उसके पति विकास, जेठ-जेठानी, देवर और ननद सब वहीं बैठे थे।
मीरा ने बैग सोफे पर रखा और धीरे से विकास के पास बैठते हुए पूछा, “क्या हुआ? सब इतने चुप क्यों हैं?”
विकास ने नजरें झुकाकर धीमी आवाज में कहा, “मम्मी को कुछ बात पसंद नहीं आई है… इसलिए फैमिली मीटिंग रखी है।”
मीरा का दिल हल्का सा घबराया। शादी को अभी सिर्फ चार महीने ही हुए थे। उसने अब तक यही देखा था कि इस घर में शारदा देवी की बात आखिरी मानी जाती है।
शारदा देवी ने गला साफ किया और सबकी तरफ देखते हुए बोलीं, “अब घर में खर्चा बढ़ गया है। पहले जितने लोग थे, उतना ही खर्च था। लेकिन अब मीरा भी इस घर का हिस्सा है, तो जिम्मेदारियाँ भी बढ़ेंगी।”
मीरा चुपचाप सुनती रही।
शारदा देवी आगे बोलीं, “इस घर में जो भी कमाता है, अपनी सैलरी का हिस्सा घर में देता है। इसलिए अगले महीने से मीरा भी अपनी सैलरी का आधा पैसा घर में देगी।”
मीरा एकदम चौंक गई।
“मम्मी जी… मैं आधी सैलरी नहीं दे सकती।”
उसकी बात सुनते ही जेठानी कविता तुरंत बोली, “क्यों नहीं दे सकती? मैं भी देती हूँ।”
मीरा ने शांत रहने की कोशिश करते हुए कहा, “क्योंकि मेरी मम्मी की दवाइयों का खर्च मैं उठाती हूँ। पापा नहीं हैं… और छोटा भाई अभी पढ़ रहा है।”
शारदा देवी का चेहरा सख्त हो गया।
“तो क्या हमने तुम्हारी माँ की जिम्मेदारी ली है? अपने मायके वालों का खर्च उठाना है तो अपने पति से अलग रहो।”
मीरा ने उम्मीद भरी नजरों से विकास की तरफ देखा।
उसे लगा था कि विकास उसका साथ देगा।
लेकिन विकास ने धीरे से कहा, “मीरा… मम्मी जो कह रही हैं, वो घर का नियम है।”
बस इतना सुनना था कि मीरा का दिल टूट गया।
उसे पहली बार एहसास हुआ कि शादी के बाद भी कुछ लड़कियाँ अपने लिए अकेली रह जाती हैं।
मीरा ने कुर्सी से उठते हुए कहा, “मैं अपनी माँ का साथ नहीं छोड़ सकती। और ना ही अपनी मेहनत की कमाई किसी दबाव में दूँगी।”
इतना सुनते ही शारदा देवी गुस्से से बोलीं, “ठीक है। फिर आज से इस घर की कोई सुविधा इस्तेमाल मत करना। ना खाना मिलेगा… ना कोई और चीज।”
पूरा घर चुप हो गया।
मीरा ने अपने ससुर दिनेश जी की तरफ देखा।
“पापा जी… आप कुछ बोलेंगे?”
दिनेश जी ने गहरी सांस ली।
“इस घर के फैसले तुम्हारी सास लेती हैं बेटा… मैं बीच में नहीं पड़ता।”
मीरा की आँखों में पानी आ गया। लेकिन उसने खुद को संभाल लिया।
उस रात उसने कमरे में जाकर विकास से कहा, “तुमने शादी से पहले वादा किया था कि हमेशा साथ दोगे।”
विकास ने थके हुए स्वर में जवाब दिया, “मैं क्या करता? अगर मम्मी नाराज हो जातीं तो घर में रहना मुश्किल हो जाता।”
मीरा कुछ पल उसे देखती रही।
फिर धीरे से बोली, “जिस आदमी को अपनी पत्नी के सम्मान से ज्यादा अपनी सुविधा प्यारी हो… उससे ज्यादा उम्मीद नहीं करनी चाहिए।”
अगले दिन घर में अजीब माहौल था।
सबने नाश्ता किया। लेकिन जैसे ही मीरा खाने बैठी, उसकी ननद पायल ने प्लेट खींच ली।
“मम्मी ने मना किया है।”
मीरा ने बिना गुस्सा किए प्लेट वापस ली और बोली, “खाना खाना मेरा अधिकार है। कोई एहसान नहीं।”
वह खाना लेकर अपने कमरे में चली गई।
शाम को जब वह ऑफिस से लौटी तो रसोई पर ताला लगा हुआ था।
शारदा देवी ने साफ कह दिया, “जब तक पैसे नहीं दोगी, खाना नहीं मिलेगा।”
उस दिन पहली बार मीरा को एहसास हुआ कि कुछ लोग रिश्तों को भी किराए के मकान की तरह चलाते हैं।
लेकिन मीरा चुप नहीं बैठी।
उसने ऑनलाइन खाना ऑर्डर किया और छत पर जाकर खाने लगी।
तभी उसकी जेठानी कविता भी वहाँ आ गई। उसके चेहरे से साफ लग रहा था कि उसने भी सुबह से कुछ नहीं खाया।
मीरा ने पूछा, “आपने खाना क्यों नहीं खाया?”
कविता की आँखें भर आईं।
“क्योंकि मैं थक चुकी हूँ… लेकिन बोलने की हिम्मत नहीं है।”
मीरा ने उसकी तरफ देखते हुए कहा, “अगर हम अपने लिए नहीं बोलेंगे… तो कोई हमारे लिए नहीं बोलेगा।”
कविता कुछ नहीं बोली।
लेकिन उसके चेहरे पर पहली बार सोच दिखाई दी।
अगली सुबह मीरा ने घर का कोई काम नहीं किया।
वह आराम से सोफे पर बैठकर मोबाइल चलाने लगी।
शारदा देवी गुस्से से चिल्लाईं, “आज काम कौन करेगा?”
मीरा ने शांत आवाज में कहा, “जिस तरह आप खाने के बदले पैसे मांग रही हैं… उसी तरह घर के काम की भी कीमत होती है। अगर मैं नौकरानी की तरह काम करूँगी, तो उसकी सैलरी भी मिलेगी।”
घर में सन्नाटा छा गया।
शारदा देवी गुस्से से कांपने लगीं।
लेकिन मीरा अपनी बात पर डटी रही।
धीरे-धीरे घर का माहौल इतना खराब हो गया कि कविता डर गई और उसने चुपचाप अपनी सैलरी का हिस्सा दे दिया।
अब शारदा देवी को लगा कि मीरा को झुकाना जरूरी है।
उसी शाम जब मीरा ऑफिस से लौटी, तो मुख्य दरवाजा अंदर से बंद था।
काफी देर तक बेल बजाने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला।
फिर अंदर से आवाज आई—
“जिसे इस घर के नियम पसंद नहीं… उसका इस घर में कोई हक नहीं।”
मीरा कुछ पल चुप रही।
फिर उसने गहरी सांस ली और जोर से बोली—
“सुनिए सब लोग! इस घर में बहुओं से पैसे लिए जाते हैं, काम कराया जाता है… और अब घर में घुसने तक नहीं दिया जा रहा!”
उसकी आवाज सुनकर पड़ोसी बाहर निकल आए।
कुछ ही देर में गली में भीड़ लग गई।
सामने वाले घर की सीमा आंटी बोलीं, “ये तो गलत बात है।”
किसी ने पुलिस को फोन कर दिया।
करीब बीस मिनट बाद पुलिस वहाँ पहुँच गई।
महिला कांस्टेबल ने सबसे पहले मीरा से पूछा, “क्या हुआ?”
मीरा ने पूरी बात बता दी।
महिला पुलिस अधिकारी ने तुरंत दरवाजा खुलवाया और अंदर जाकर शारदा देवी से कहा—
“किसी भी महिला को उसके घर में घुसने से रोकना अपराध है।”
शारदा देवी सफाई देने लगीं, “ये घर का मामला है।”
लेकिन महिला अधिकारी ने सख्त आवाज में कहा—
“कानून घर के अंदर भी लागू होता है।”
फिर उन्होंने विकास की तरफ देखकर पूछा, “क्या आप अपनी पत्नी के साथ हैं?”
पूरा घर उसकी तरफ देखने लगा।
विकास पहली बार डर नहीं रहा था।
उसने धीरे से मीरा की तरफ देखा।
उसकी आँखों में दर्द साफ दिखाई दे रहा था।
और शायद पहली बार उसे एहसास हुआ कि चुप रहना भी गलत का साथ देना होता है।
विकास ने साफ आवाज में कहा—
“हाँ। मैं अपनी पत्नी के साथ हूँ।”
घर में जैसे बिजली गिर गई।
शारदा देवी चिल्लाने लगीं। पायल ताने मारने लगी।
लेकिन विकास इस बार नहीं रुका।
“पत्नी का सम्मान करना गलत नहीं है। अगर इस घर में उसे रोज अपमान सहना पड़े… तो हमें अलग रहना होगा।”
मीरा की आँखें भर आईं।
लेकिन इस बार उन आँसुओं में कमजोरी नहीं थी।
उस रात दोनों ने फैसला कर लिया।
अगली सुबह उन्होंने चुपचाप अपना सामान पैक किया।
किसी से बहस नहीं की। किसी को सफाई नहीं दी।
बस जाते समय सबके पैर छुए।
शारदा देवी ने गुस्से में पैर पीछे खींच लिए।
मीरा ने एक आखिरी बार उस घर को देखा… जहाँ उसने बहुत कोशिश की थी अपनापन ढूँढने की।
लेकिन हर घर सिर्फ दीवारों से नहीं बनता।
कुछ घर सम्मान से बनते हैं।
और जहाँ सम्मान खत्म हो जाए… वहाँ रुकना सिर्फ समझौता रह जाता है।
मीरा और विकास घर से बाहर निकल गए।
पीछे एक रिश्ता टूट रहा था।
लेकिन आगे एक नई जिंदगी उनका इंतजार कर रही थी… जहाँ फैसले डर से नहीं, बराबरी से लिए जाने वाले थे।

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